उत्तराखंड में निहंग विवाद खत्म, लेकिन पुलिस की कार्रवाई पर उठे बड़े सवाल

उत्तराखंड के नागरासू गुरुद्वारे से कई दिनों के बाद निहंग सिख हट गए, लेकिन बिना कार्रवाई मामले के खत्म होने पर पुलिस और प्रशासन सवालों के घेरे में है.

Advertisement
रुद्रप्रयाग के नागरासू गुरुद्वारे पर तीन दिनों से कब्जा जमाए हुए हथियारबंद निहंगों का समूह मंगलवार शाम को मोटरसाइकिल से चला गया. (Photo: Social Media) रुद्रप्रयाग के नागरासू गुरुद्वारे पर तीन दिनों से कब्जा जमाए हुए हथियारबंद निहंगों का समूह मंगलवार शाम को मोटरसाइकिल से चला गया. (Photo: Social Media)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 24 जून 2026,
  • अपडेटेड 5:32 PM IST

उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में नागरासू गुरुद्वारे को लेकर पिछले कई दिनों से चला तनाव आखिरकार खत्म हो गया है. निहंग सिखों और गुरुद्वारा प्रबंधन के बीच शुरू हुआ विवाद चार दिन तक सुर्खियों में रहा. पंजाब से पहुंचे निहंग प्रतिनिधियों और प्रशासन की मध्यस्थता के बाद गतिरोध खत्म हुआ और गुरुद्वारा परिसर खाली करा लिया गया. 

मंगलवार शाम को पारंपरिक हथियार लिए हुए कई निहंग सिख मोटरसाइकिल पर सवार होकर उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले के नागरासु गुरुद्वारे से चले गए. निहंगों ने तीन दिनों से ज्यादा वक्त तक गुरुद्वारे के कुछ हिस्सों पर कब्जा कर रखा था. यह उस गतिरोध का समाधान था, जो कर्णप्रयाग में हुई हिंसक झड़प के बाद पुलिस द्वारा चार अन्य निहंगों की गिरफ्तारी के विरोध में शुरू हुआ था.

Advertisement

हालांकि, कई जानकारों और आलोचकों का कहना था कि बिना किसी सजा के निहंगों का गुरुद्वारे से चले जाना 'राज्य के अधिकार को चुनौती' देने जैसा था, जिसे बिना किसी नतीजे के माफ कर दिया गया. भारतीय सेना के एक पूर्व सैनिक ने इसे हथियारबंद निहंगों के सामने 'पूरी तरह से आत्मसमर्पण' बताया.

क्या है पूरा मामला?

निहंग सिखों के एक समूह ने उत्तराखंड में स्थित धार्मिक स्थल की छत और ऊपरी हिस्सों पर कब्जा कर रखा था. यह गतिरोध तब खत्म हुआ, जब पंजाब से आए निहंग प्रतिनिधियों के एक दल ने स्थानीय अधिकारियों और गुरुद्वारा प्रबंधन से मुलाकात की.

उत्तराखंड के प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों ने इसे 'शांतिपूर्ण समाधान' बताया, लेकिन निहंगों के जाने के तुरंत बाद ही ऑनलाइन आलोचनाओं का दौर शुरू हो गया. कमेंटेटर्स, वकीलों, पत्रकारों और सेना के रिटायर्ड अधिकारियों ने इस बात पर सवाल उठाए कि इस मामले को कैसे संभाला गया और क्या इससे राज्य की कमजोरी जाहिर हुई.

Advertisement

उत्तराखंड में कैसे शुरू हुआ निहंग विवाद?

इस विवाद की जड़ें 16 जून को उत्तराखंड के कर्णप्रयाग में हुई एक झड़प में हैं. पुलिस के मुताबिक, एक निहंग ग्रुप के सदस्यों ने बहस के दौरान तलवारें निकालीं. यह मामला तब सामने आया था, जब उनकी मोटरसाइकिलों से कथित तौर पर एक राहगीर घायल हो गया था. झड़प में कई लोग घायल हुए और चार निहंग सिखों को गिरफ्तार किया गया. 

हालांकि, सिख संगठनों ने पुलिस की कार्रवाई में पक्षपात का आरोप लगाया और अधिकारियों पर सिर्फ एक पक्ष को निशाना बनाने का आरोप लगाया. पुलिस के बर्ताव को लेकर की गई शिकायतों को उत्तराखंड पुलिस ने जांच के लिए भेज दिया है.

कर्णप्रयाग में हुई झड़प के कुछ दिनों बाद, 20 जून को निहंगों का एक समूह बद्रीनाथ हाईवे पर स्थित नागरासू गुरुद्वारे पहुंचा. यह जगह कर्णप्रयाग से 15 किलोमीटर दूर है. निहंगों ने गुरुद्वारे की छत और ऊपरी हिस्सों पर कब्जा कर लिया और प्रशासन की बार-बार की अपील के बावजूद वहां से हटने से इनकार कर दिया. तीन दिनों तक गतिरोध बना रहा, जिसके बाद उन्होंने गुरुद्वारे को खाली किया. प्रशासन ने कहा कि स्थिति सामान्य हो गई है.

निहंग सिखों का सदियों पुराना योद्धा समुदाय है, जिसकी शुरुआत 1699 में गुरु गोबिंद सिंह द्वारा खालसा की स्थापना के साथ हुई थी. वे उत्पीड़न और युद्धों के दौर से चली आ रही युद्ध-कला की परंपरा को संजोए हुए हैं. इसके सदस्य अपनी नीली पोशाक, घोड़ों और पारंपरिक हथियारों के लिए जाने जाते हैं. इसके साथ ही, वे सिख संस्थानों और धर्म के रक्षक भी माने जाते हैं.

Advertisement

भले ही उत्तराखंड के गुरुद्वारे और हेमकुंड साहिब गुरुद्वारे तक जाने वाले हाईवे पर हालात सामान्य हो गए हों, लेकिन जिस तरह से निहंगों के साथ गतिरोध हुआ और बाद में उन्हें जाने दिया गया, उसने एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है.

यह भी पढ़ें: रुद्रप्रयाग में छत पर अब भी 5 निहंग! नीचे सब कुछ नॉर्मल, गुरुद्वारे में जारी लंगर और अरदास

निहंगों पर पुलिस की प्रतिक्रिया क्यों बनी बड़ी कहानी?

कई आलोचकों और मामले पर नजर रखने वालों ने गुरुद्वारे पर तीन दिनों तक निहंगों के कब्जे की आलोचना की है, लेकिन जिस तरह से मामला शांत हुआ, उस पर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं.

एक रिटायर्ड भारतीय सेना अधिकारी, मेजर दिग्विजय सिंह रावत (रिटायर्ड), उन लोगों में से थे, जिन्होंने मामले के नतीजे की आलोचना की. इसे 'उत्तराखंड पुलिस द्वारा ग्रेट सरेंडर' बताते हुए, रावत ने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा कि चार दिनों के कब्जे के बाद उन्हें इस तरह छोड़ दिया गया, जैसे उन्होंने कोई महान काम किया हो.  निहंगों ने कथित तौर पर यातायात नियमों का उल्लंघन किया और हथियारों का प्रदर्शन किया. 

2024 में कीर्ति चक्र से सम्मानित मेजर दिग्विजय सिंह रावत (रिटायर्ड) ने इस मामले की तुलना निहंगों से जुड़ी पिछली घटनाओं से की. उन्होंने लिखा कि वे अब वापस जा सकते हैं और लाल किले पर एक और कब्जe करने की योजना बना सकते हैं, पुलिसकर्मियों पर तलवार से हमला कर सकते हैं. उन्होंने 26 जनवरी, 2021 को किसानों के प्रोटेस्ट के दौरान लाल किले के आसपास हुई हिंसा का भी जिक्र किया, जिसमें एक शख्स की मौत हो गई थी.

Advertisement

पूर्व सैनिक ने राजनेताओं पर वोट-बैंक की राजनीति करने का आरोप लगाया और अपने बयान के आखिरी में उन्होंने कहा, "इंदिरा गांधी के लिए बहुत सम्मान है. वे सचमुच 'आयरन लेडी' थीं."

रावत ने अपनी पोस्ट में कहा कि प्रशासन का ध्यान निहंगों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई करने के बजाय बातचीत के जरिए तीन दिन से चल रहे गुरुद्वारे के गतिरोध को शांतिपूर्ण ढंग से खत्म करने पर ज्यादा था. आखिर में पंजाब से आए एक डेलिगेशन के साथ बातचीत के बाद निहंग मोटरसाइकिल से गुरुद्वारा परिसर से चले गए.

बातचीत के लिए पंजाब से आए ज्ञानी गुरजीत सिंह ने कहा, "दमदमी टकसाल के प्रमुख बाबा हरनाम सिंह खालसा ने हालात को शांत करने के लिए नागरासू गुरुद्वारे में पांच सदस्यों का एक डेलिगेशन भेजा था." उन्होंने बताया कि डेलिगेशन ने उत्तराखंड प्रशासन के साथ 'सौहार्दपूर्ण बातचीत की और हंगामा करने वाले तीन-चार लोगों को प्यार से समझाया', जिसके बाद वे शांतिपूर्वक पंजाब लौटने को तैयार हो गए.

निहंगों का गुरुद्वारा छोड़कर जाना 'चौंकाने वाला' क्यों माना जा रहा है?

सुप्रीम कोर्ट के वकील शशांक शेखर झा ने इस घटना को 'कल्पना से परे चौंकाने वाला' बताया है. सोशल मीडिया पोस्ट में शेखर झा ने कहा कि कुछ निहंग सिखों ने चार दिनों तक एक गुरुद्वारे पर कब्ज़ा कर लिया और बाद में पुलिस के सामने सभी ट्रैफिक नियमों को तोड़ते हुए और अपनी बाइकों पर हथियार लहराते हुए वहां से चले गए.

Advertisement

हालांकि, उत्तराखंड पुलिस ने इस हफ्ते की शुरुआत में कहा था कि निहंगों द्वारा गुरुद्वारे पर कब्जा करने का दावा गलत है. 

देहरादून के पत्रकार भूपि पंवार ने ज्यादा संतुलित बात कही. एक्स पर विवाद के समाधान की जानकारी देते हुए उन्होंने बताया कि छत पर मौजूद पांच निहंग पंजाब से आए एक डेलिगेशन के साथ बातचीत के बाद आखिरकार नीचे आने को तैयार हो गए.

भूपि पंवार ने एक्स पर लिखा, "हालांकि, निहंग प्रशासन और सरकार के लिए कई असहज सवाल छोड़ गए हैं."

यह भी पढ़ें: पारंपरिक नीले वस्त्र, बड़ी पगड़ी और गतका... निहंग सिख लोग कौन होते हैं, इनकी परंपरा क्या है?

गुरुद्वारे पर निहंगों का कब्जा 'सिखों का अंदरूनी मामला' था या कुछ और?

रुद्रप्रयाग की एसपी निहारिका तोमर ने मंगलवार को कहा, "यह विवाद नागरासु गुरुद्वारे की मैनेजमेंट कमेटी और निहंग सिख तीर्थयात्रियों के उस समूह के बीच था, जो छत पर चले गए थे और रास्ता रोक दिया था." उन्होंने बताया कि प्रशासन, पुलिस और मैनेजमेंट कमेटी लगातार बातचीत कर रहे थे. आखिर में पंजाब से आए एक डेलिगेशन ने दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता की, जिससे मामला शांतिपूर्ण ढंग से सुलझ गया और सभी निहंग तीर्थयात्री छत से नीचे उतर आए.

लेकिन, आलोचकों ने कहा कि गुरुद्वारे में हुए टकराव को सिर्फ सिख समुदाय के अंदरूनी झगड़े के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए.

Advertisement

'असली पंजाबी' नाम के एक सोशल मीडिया अकाउंट से किए गए पोस्ट में कहा गया कि गुरुद्वारे पर कब्जा सिर्फ सिखों का अंदरूनी मामला नहीं था. पोस्ट के मुताबिक, कब्जे का मकसद उत्तराखंड सरकार पर दबाव डालना और गिरफ्तार किए गए निहंगों की रिहाई करवाना था.

सोशल मीडिया पोस्ट में लगाया गया कि कब्जे का इस्तेमाल 'पॉलिटिकल ब्लैकमेल' करने और 'सजा से बचने' के लिए किया जा रहा था.

हालांकि, इन आरोपों को अधिकारियों ने खुद से साबित नहीं किया है, लेकिन इनसे पता चलता है कि आलोचकों ने इस घटना को सियासी नजरिए से भी देखा.

उत्तराखंड पुलिस ने आधिकारिक रूप से यह नहीं बताया है कि निहंगों ने गुरुद्वारे पर धावा क्यों बोला और उन्हें बिना किसी सजा के जाने क्यों दिया गया. 

कब्जे को लेकर सवाल!

स्टैंडऑफ और उसके हल की सबसे डिटेल्ड आलोचना आज तक के एग्जीक्यूटिव एडिटर मंजीत नेगी ने की. यह मानते हुए कि स्टैंडऑफ खत्म हो गया है और अधिकारियों ने नॉर्मल हालात बहाल होने का ऐलान कर दिया है, नेगी ने सोशल मीडिया पर कई सवाल उठाए.

उन्होंने सवाल उठाते हुए लिखा, "उनके (निहंगों) द्वारा आम लोगों और पुलिसवालों पर पत्थरबाजी के बारे में क्या एक्शन लिया गया है?" 

उन्होंने उन रिपोर्ट्स पर भी सवाल उठाया कि स्टैंडऑफ के दौरान सेवादार को गुरुद्वारे के अंदर बंद कर दिया गया था. अगर ऐसे आरोप सच पाए जाते हैं, तो क्या लोगों को जिम्मेदार ठहराया जाएगा? नेगी ने एक्स पर लिखा, "इस पूरे मामले ने उत्तराखंड में कानून-व्यवस्था और कानून के लगातार लागू होने को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं."

Advertisement

कैलिफोर्निया के रहने वाले एम.एस. खंगुरा ने एक्स पर एक और सवाल उठाया कि गतिरोध खत्म होने के बाद भी किसी की गिरफ्तारी क्यों नहीं हुई. उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा, "चार दिनों तक हथियारों से लैस निहंगों ने नागरासु गुरुद्वारे में तोड़-फोड़ की और सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंके, लेकिन फिर वे खुशी-खुशी पंजाब लौट गए और अपनी बाइकों पर गर्व से भाले लहरा रहे थे. कोई गिरफ्तारी नहीं हुई. यह तो बिल्कुल मजाक है."

यह भी पढ़ें: कुल्हाड़ी, चाकू, तलवारें... उत्तराखंड में स्थानीय व्यापारी पर हमला करने वाले 7 निहंग अरेस्ट, मिले खतरनाक हथियार

'हिमालयन हिंदू' नाम के एक एक्स हैंडल से भी ऐसी ही आलोचना की गई. इस हैंडल के द्वारा किए गए पोस्ट में कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक व्यवस्था को लेकर चिंता जताई. उस हैंडल ने पोस्ट में लिखा, "कोई गिरफ्तारी नहीं हुई. यह तो बिल्कुल मजाक है."

वहीं, उत्तराखंड के अधिकारियों का कहना था कि उनका तुरंत मकसद शांतिपूर्ण तरीके से हालात सामान्य करना था. रुद्रप्रयाग के जिला मजिस्ट्रेट विशाल मिश्रा ने कहा कि जिला प्रशासन और गुरुद्वारा मैनेजमेंट की मिली-जुली कोशिशों से यह मामला सुलझा लिया गया है.

जिला प्रशासन ने इस बात पर भी जोर दिया है कि हेमकुंड साहिब और केदारनाथ की तीर्थयात्रा बिना किसी व्यवधान के जारी रहे. उत्तराखंड के डीजीपी दीपम सेठ ने बुधवार को कहा कि पुलिस और प्रशासन ने 'बड़े धैर्य और संयम' के साथ काम करते हुए कई संगठनों के सहयोग से नागरासू गुरुद्वारा गतिरोध को नियंत्रण में लाने में कामयाबी हासिल की.

सेठ ने एएनआई को बताया कि अधिकारियों को 'अशोभनीय भाषा और आपत्तिजनक टिप्पणी' करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया है. सेठ ने तीर्थयात्रियों से उत्तराखंड की स्थानीय परंपराओं, रीति-रिवाजों और धार्मिक मान्यताओं का सम्मान करने की भी गुजारिश की है.

हालांकि, उत्तराखंड के डीजीपी ने इस बारे में कुछ नहीं बताया कि गुरुद्वारे पर कब्जा करने वाले निहंगों के खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गई.

कई दिनों के गतिरोध के बाद निहंगों ने नगरासू गुरुद्वारा छोड़ दिया है लेकिन अपने पीछे कई सवाल छोड़ गए हैं. आलोचकों ने किसी भी सजा की कमी को निहंगों के प्रति 'पूर्ण समर्पण' कहा. वे पूछ रहे हैं कि क्या राज्य ने पहले पलकें झपकाईं

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »