दो दिन पहले उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में हेमकुंड साहिब की पवित्र यात्रा के दौरान नगरासू गुरुद्वारे में सेवादारों और निहंग श्रद्धालुओं के बीच विवाद हो गया. इसके बाद कुछ निहंग यात्री गुरुद्वारा के छत पर चढ़ गए और कब्जा कर लिया. यह पहली बार नहीं है, जब निहंगों का नाम ऐसे विवाद में सामने आया है. ऐसे में समझते हैं कि निहंग सिख कौन होते हैं?
निहंग सिखों का एक संप्रदाय है, जिनकी पहचान उनकी अलग वेश-भूषा होती है. वह अपने नीले रंग के कपड़े की वजह से भीड़ में भी अलग से पहचान में आ जाते हैं. घुटने तक लंबा नीले रंग का एक चोला पहनते हैं. सिर पर नीले या पीले रंग की पगड़ी रहती है और उसमें लोहे का एक छल्ला लगा रहता है. वे आमतौर पर हमेशा अपने साथ भाला, तलवार, कटार और ढाल रखते हैं. इसलिए निहंगों को दूर से ही पहचाना जा सकता है.
कौन होते हैं निहंग
निहंग कौन होते हैं, यह समझने से पहले निहंग का शब्दिक अर्थ जानना जरूरी है. शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी श्री अमृतसर की आधिकारिक वेबसाइट पर निहंग के बारे में दी गई जानकारी के मुताबिक, निहंग का शाब्दिक अर्थ मगरमच्छ होता है, जो जल में सर्वोच्च स्थान रखता है, ठीक वैसे ही जैसे शेर जंगल के जीवों में सर्वोच्च होता है. माना जाता है कि निहंग शब्द फारसी भाषा से लिया गया है, जिसका अर्थ मगरमच्छ होता है.
सिख शब्दावली में निहंग अकाली का पर्यायवाची है. माना जाता है कि गुरु गोविंद सिंह जी के एक पुत्र से निहंगों की उत्पत्ति हुई है, जिन्हें खुद गुरु गोविंद सिंह जी ने अपने हाथो से नीले रंग का युद्ध वस्त्र पहनाया था. इसलिए निहंग हमेशा इसी रंग का चोला पहनते हैं.
दरअसल, निहंग सिखों का एक सैन्य समुदाय है, जिनके बारे में कहा जाता है कि वे मृत्यु के भय को त्यागकर, शहादत के लिए हमेशा तैयार रहते हैं. सांसारिक संपत्ति से अछूते रहते हैं. निहंग के पास कुछ भी नहीं होता है. वेलोग चिंता से मुक्त रहते हैं. निहंगों को अकाली भी कहा जाता है.
निहंगों का बाणा क्या है?
निहंग सिखों के समूह एक समय देश के सबसे खतरनाक सैन्य शक्तियों में से एक माने जाते थे. आज भी इनका 'बाणा' इन्हें बाकियों से अलग खड़ा करता है. निहंगों का बाणा ही इनकी असली पहचान है. चलिए समझते हैं कि यह बाणा क्या होता है? निहंग के बाणे के तहत जो नीले रंग का ये चोला धारण करते हैं. उसके साथ भाला, तलवार, ढाल और अन्य शस्त्र होते हैं. साथ ही सिर पर बड़ी सी नीली और पीली पगड़ी भी पहने रहते हैं.
मीडिया रिपोर्ट में एक इंटरव्यू के हवाले से, खालसा कॉलेज, अमृतसर के सिख हिस्ट्री डिपार्टमेंट के प्रोफेसर डॉक्टर कुलदीप सिंह बताते हैं कि सिर्फ युद्ध के मैदान में लड़ना ही इनका काम नहीं था. कुछ नियम-कानून ऐसे हैं, जिनसे निहंग खुद को बांधे रखते हैं. उनकी अवहेलना नहीं की जा सकती. गुरबानी का पाठ करना और 'बाणे' में रहना. रोज ये गुरबानी का पाठ तो करते ही हैं, साथ ही साथ औरों को भी उसके बारे में बताते चलते हैं. बाणे में रहने का मतलब हमेशा अपना चोला और उसके साथ आने वाले सभी शस्त्र धारण करना.
कमजोरों की रक्षा करते हैं, उन पर हाथ नहीं उठाते
साथ ही सभी निहंग शस्त्र विद्या में निपुण होते हैं. बाणा धारण करने का मतलब है किसी मजबूर, गरीब, या कमजोर पर हाथ न उठाना, उसकी रक्षा करना. सभी निहंग हथियार चलाने में पारंगत होते हैं. शस्त्र विद्या में पांच महत्वपूर्ण चीजें सिखाई जाती हैं. इसमें विरोधी पर लपकना, उसकी रक्षा पंक्ति को कमजोर करना, हमले को रोकना, वार करने के लिए सबसे सही जगह चुनना, और आखिर में वार करना.
निहंग छोटे-छोटे समूहों में घूमते रहते हैं. सिख गुरुओं के जीवन से जुड़ी महत्वपूर्ण घटनाएं जहां-जहां घटी थीं, वहां का चक्कर लगाते हैं. जैसे 'माघी' के दिन ये मुक्तसर साहिब जाते हैं. जहां गुरु गोबिंद सिंह ने 'चाली मुक्ते' को आशीर्वाद दिया था. इसके बाद आनंदपुर साहिब में होली खेलने जाते हैं, जिसे 'होला मोहल्ला' कहा जाता है. इसी तरह इनके जत्थे बाकी जगहों पर जाते हैं.
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इस तरह निहंग सिख संप्रदाय का एक सैन्य समुदाय है, जो अपने पंथ की रक्षा के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं. सांसारिक मोह- माया से इनका कोई लेना-देना नहीं होता है. इनकी अपनी अलग पहचान होती है और यह अपनी इसी अलग वेश-भूषा से पहचाने जाते हैं.
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