गाजीपुर हिंसा से सुर्खियों में आई निषाद पार्टी के बारे में ये नहीं जानते होंगे

NISHAD PARTY संजय निषाद ने साल 2013 में निषाद पार्टी का गठन किया था. निषाद पार्टी का पूरा नाम निर्बल इंडियन शोषित हमारा आम दल है. वह सूबे में निषाद समुदाय को एकजुट कर अपनी सियासी जमीन को मजबूत करना चाहते हैं.

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डॉ. संजय निषाद (फोटो-facebook) डॉ. संजय निषाद (फोटो-facebook)

कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली,
  • 31 दिसंबर 2018,
  • अपडेटेड 4:03 PM IST

उत्तर प्रदेश की गोरखपुर लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में समाजवादी पार्टी को मिली जीत के बाद पहली बार सुर्खियों में आई निषाद पार्टी गाजीपुर की घटना के बाद एक बार चर्चा के केंद्र में है. शनिवार को निषाद पार्टी से जुड़े कार्यकर्ताओं की उग्र भीड़ की पिटाई से सिपाही सुरेंद्र वत्स की मौत हो गई थी. इस मामले में निषाद पार्टी के महासचिव अर्जुन कश्यप को मुख्य आरोपी बनाया गया है. जबकि इस संबंध में अभी तक 11 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है.

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दरअसल, निषाद पार्टी के लोग काफी दिनों से अनुसूचित जाति के तहत आरक्षण की मांग कर रहे हैं. शनिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली आयोजित थी, इसी दिन निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद के नेतृत्व में आरक्षण की मांग को लेकर पार्टी कार्यकर्ताओं ने रोड जाम कर दिया. पीएम की सभा के लिए पुलिस ने निषाद पार्टी के कार्यकर्ताओं को सड़क से हटाना चाहा तो उनका गुस्सा फूट पड़ा और उन्होंने पुलिस पर ही पथराव शुरू कर दिया. इसमें हेड कान्स्टेबल सुरेंद्र वत्स की मौत हो गई.

सूबे में निषाद पार्टी की बुनियाद संजय निषाद ने साल 2013 में रखी थी. निषाद पार्टी का पूरा नाम, 'निर्बल इंडियन शोषित हमारा आम दल' है. दरअसल, किसी जाति से कोई राजनीतिक दल पंजीकृत नहीं हो सकता है. यही वजह है कि पार्टी का नाम 'निर्बल इंडियन शोषित हमारा आम दल' रखा गया जिसका शॉर्ट में नाम 'NISHAD'  यानी 'निषाद' होता है.

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'निषाद' पार्टी का नाम रखने के पीछे संजय निषाद का सोचा समझा राजनीतिक उद्देश्य था. देश के 14 राज्यों में निषाद वंशीय अनुसूचित जाति में शामिल भी हैं. उत्तर प्रदेश में निषाद वंश से जुड़ी 7 जातियां- मंझवार, गौड़, तुरहा, खरोट, खरवार, बेलदार, कोली अनुसूचित जाति में शामिल हैं, लेकिन अन्य उपजातियों को ओबीसी में रखा गया है. इनमें केवट, मल्लाह, बिंद, मांझी, कश्यप और निषाद उपजातियां शामिल हैं.

संजय निषाद इन्हीं जातियों को संगठित कर अपनी सियासी जमीन को मजबूत करने की कोशिशों में जुटे हैं. वे सबसे पहले सुर्खियों में तब आए जब 7 जून, 2015 को गोरखपुर से सटे सहजनवा क्षेत्र के कसरावल गांव के पास निषादों को अनुसूचित जाति में शामिल किए जाने की मांग को लेकर रेलवे ट्रैक को जाम कर दिया था.

संजय निषाद के साथ सैकड़ों की संख्या में निषाद समाज के लोग थे, जिनमें बड़ी संख्या युवा शामिल थे. पुलिस ने जब उन्हें हटाने की कोशिश की तो हिंसक झड़प हुई. पुलिस फायरिंग में अखिलेश निषाद नाम का युवक मारा गया. भीड़ ने कई वाहनों में तोड़-फोड़ की और उसे आग के हवाले कर दिया. इसके बाद संजय निषाद गायब हो गए. हालांकि बाद में उन्होंने सरेंडर किया और जमानत पर रिहा हुए.

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इसके बाद निषाद पार्टी ने अपनी ताकत का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन गोरखपुर में जुलाई, 2016 में किया. इसके बाद 2017 के विधानसभा चुनाव में कई उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें से विजय मिश्रा ने भदोही की ज्ञानपुर सीट से जीत हासिल की. 

हालांकि, निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद राजनीति में दो दशक से सक्रिय रहे हैं. लेकिन कभी भी चुनाव नहीं जीत सके हैं. गोरखपुर लोकसभा के उपचुनाव में उनके बेटे प्रवीण निषाद को सपा ने उम्मीदवार बनाया और वे जीत हासिल करने में कामयाब रहे.

संजय निषाद ने अपना सियासी सफर बामसेफ से शुरू किया. इसके बाद कैम्पियरगंज विधानसभा से एक बार चुनाव भी लड़ चुके हैं. लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली. इसी के बाद से अपनी जाति की राजनीति से जुट गए. साल 2008 में उन्होंने ऑल इंडिया बैकवर्ड एंड माइनॉरिटी वेलफेयर मिशन और शक्ति मुक्ति महासंग्राम नाम के दो संगठन बनाए. उन्होंने निषाद पार्टी से पहले राष्ट्रीय निषाद एकता परिषद बनाई और बतौर राष्ट्रीय अध्यक्ष निषादों की विभिन्न उपजातियों को एक करने का प्रयास किया.

उन्होंने 'मछुआ समुदाय की 553 जातियों को एक मंच' पर लाने की मुहिम शुरू की. उन्होंने निषादों को बताया कि निषाद वंशीय समुदाय से जुड़ी सभी जातियों को एक मानते हुए अनुसूचित जाति में शामिल करने पर समाज का फायदा होगा. इसी के बाद 2013 में उन्होंने निषाद पार्टी बनाई.

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