प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने जीवन के 75 साल का सफर तय कर लिया है. गुजरात के एक साधारण परिवार में जन्मे नरेंद्र मोदी लगातार तीसरी बार केंद्र की सत्ता में हैं. नरेंद्र मोदी के रूप में बीजेपी को एक करिश्माई नेता मिला, जिसे पार्टी ने 1987 में अहमदाबाद नगर निगम का चुनाव जिताने की जिम्मेदारी दी थी. इस जीत के साथ मोदी का एक नया सियासी सफर शुरू हुआ, जो आज उस मुकाम पर है, जिसे 'मोदी युग' के नाम से जाना जाता है.
नरेंद्र मोदी ने सियासत में कदम रखा तो फिर पलटकर नहीं देखा और देश की राजनीति के तौर-तरीके को पूरी तरह से बदलकर रख दिया. नरेंद्र मोदी ने कम उम्र में ही सार्वजनिक जीवन और राजनीति में कदम रखा तथा बूथ कार्यकर्ता से लेकर प्रधानमंत्री तक का सफर तय किया.
नरेंद्र मोदी के केंद्रीय राजनीतिक उदय से बीजेपी को अभूतपूर्व सियासी बुलंदी मिली है. मोदी युग में बीजेपी न केवल सत्ता के शीर्ष पर लगातार बनी हुई है, बल्कि उसने अपने वैचारिक एजेंडे, संगठन संरचना और चुनावी रणनीति में ऐसे क्रांतिकारी बदलाव किए हैं, जिन्होंने देश के सियासी ताने-बाने को बदलकर रख दिया. पिछले 12 सालों में बीजेपी के काम करने का पूरा रंग-ढंग बदल चुका है और पार्टी को अब जीत के सिवाय कुछ मंजूर नहीं है.
पीएम मोदी ने कैसे तोड़ा जातीय पैटर्न?
प्रधानमंत्री मोदी की सियासत पर नज़र डालें तो साफ है कि वे पारंपरिक राजनीति से अलग हटकर अपनी सियासी लकीर खींचते हैं. नरेंद्र मोदी बीजेपी के लिए एक ट्रंप कार्ड हैं, क्योंकि मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने गुजरात में बीजेपी की सियासी जड़ें ऐसी जमाईं कि दोबारा कांग्रेस की सियासी फसल खड़ी नहीं हो पाई. प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने अपनी उसी प्रशासनिक और रणनीतिक क्षमता का विस्तार किया, जिसे उन्होंने मुख्यमंत्री के रूप में निखारा था.
नरेंद्र मोदी की ज़मीन से जुड़े रहने, चुनावी वादों को अमलीजामा पहनाने और सियासी नैरेटिव सेट करने की जो कला है, वह बीजेपी को न सिर्फ सफलता के शिखर पर ले गई, बल्कि खुद प्रधानमंत्री मोदी को लगातार आगे बढ़ाती रही. प्रधानमंत्री मोदी में सियासी असफलताओं से उबरने और अपने रास्ते में खड़ी बाधाओं को ध्वस्त करने की अद्भुत क्षमता है. इसी के बलबूते उन्होंने देश की राजनीति के तौर-तरीके को बदलकर रख दिया और बीजेपी की सियासी राह में बाधा बन रही जातिवादी राजनीति के ढर्रे को, खासकर हिंदी भाषी राज्यों में, ध्वस्त कर दिया। अमित शाह ने एक बार कहा था कि बीजेपी को मिली यह जीत भारत में जातिवादी राजनीति के अंत की घोषणा है.
बीजेपी को 'ब्राह्मण और बनिया' वाली छवि से बाहर निकालकर दलित, ओबीसी और आदिवासी वोटरों को जोड़ने का काम नरेंद्र मोदी ने किया. खुद भी नरेंद्र मोदी गुजरात के ओबीसी समाज से आते हैं, जिसकी राज्य में आबादी बहुत कम है. इसके बावजूद वे गुजरात में 12 साल तक सीएम रहे और अब लगातार तीसरी बार देश के पीएम हैं। नरेंद्र मोदी ने विकास और जनकल्याणकारी योजनाओं (लाभार्थी वर्ग) को अपना मुख्य सियासी एजेंडा बनाया, जिसके दम पर वे कास्ट पॉलिटिक्स को काउंटर करने में सफल रहे. इसके साथ ही वे ओबीसी और दलित समुदायों को अपनी ओर मजबूती से खींचने में कामयाब रहे.
बीजेपी जो एक समय मुख्य रूप से सवर्ण-आधारित पार्टी मानी जाती थी, वह अब ओबीसी और दलितों तक अपनी गहरी पैठ बना चुकी है. नरेंद्र मोदी ने पसमांदा और बोहरा मुसलमानों को जोड़ने का मंत्र भी बीजेपी को दिया. मोदी ने सोशल इंजीनियरिंग का नया फॉर्मूला सेट किया है, जिसके तहत उन्होंने अलग-अलग जातीय समूहों को अपने साथ मिलाया और उन्हें पार्टी संगठन से लेकर सरकार तक में समुचित हिस्सेदारी दी.
हिंदुत्व-राष्ट्रवाद के एजेंडे से लिखी नई इबारत
नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद बीजेपी के हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के एजेंडे को जबर्दस्त सियासी धार मिली है. गुजरात का सीएम बनने के बाद से ही नरेंद्र मोदी की 'हिंदू हृदय सम्राट' की छवि बनी और प्रधानमंत्री बनने के बाद उसे और भी मजबूती मिली. अयोध्या में राम मंदिर के भूमि पूजन से लेकर प्राण-प्रतिष्ठा तक नरेंद्र मोदी की मौजूदगी एक बड़ा सियासी संदेश थी.
जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाने के साथ ही राज्य का पुनर्गठन करना, ट्रिपल तलाक को खत्म करना और राम मंदिर का निर्माण, ये सभी मोदी सरकार के मुख्य वैचारिक एजेंडे का हिस्सा रहे. मोदी सरकार की सफलता में सिर्फ हिंदुत्व ही नहीं, बल्कि राष्ट्रवाद का एजेंडा भी बेहद अहम रहा. पीएम मोदी ने अपने भाषणों में अक्सर कहा है कि बीजेपी ने लोगों का दिल जीता है और 'राष्ट्र प्रथम' हमारा संकल्प, हमारे सपनों और हमारी रगों में बसा है.
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मोदी युग में राष्ट्रवाद का एक प्रमुख पहलू 'जीरो टॉलरेंस ऑन टेररिज्म' और राष्ट्रीय सुरक्षा रहा है. उरी और बालाकोट के बाद सर्जिकल स्ट्राइक, एयर स्ट्राइक तथा आतंकवाद के खिलाफ सख्त अभियानों ने इस राष्ट्रवाद को नई परिभाषा दी.
पीएम मोदी ने राष्ट्रवाद को केवल राजनीतिक सीमाओं तक सीमित न रखकर इसे देश की सांस्कृतिक पहचान और स्वाभिमान से जोड़ा. राजपथ का नाम बदलकर 'कर्तव्य पथ' करना, नौसेना के नए ध्वज से ब्रिटिश औपनिवेशिक छाप को हटाकर छत्रपति शिवाजी महाराज की राजमुद्रा को शामिल करना इसी की मिसाल है. इसके अलावा काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर, महाकाल लोक और केदारनाथ-बद्रीनाथ के पुनर्विकास जैसी परियोजनाओं से सांस्कृतिक पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था दोनों को नई ताकत दी गई.
बीजेपी का कैसे बढ़ता गया सियासी कारवां?
भारतीय राजनीति में पिछले 12 सालों के दौरान सबसे बड़ा बदलाव अगर किसी पार्टी के भौगोलिक और संगठनात्मक विस्तार को लेकर देखा गया है, तो वह बीजेपी है. एक समय था जब बीजेपी को मुख्य रूप से उत्तर और पश्चिम भारत के कुछ राज्यों तक सीमित पार्टी माना जाता था, लेकिन 2014 के बाद पार्टी ने जिस तेजी से देशभर में अपनी मौजूदगी बढ़ाई, उसने भारतीय राजनीति का पूरा नक्शा बदल दिया. 2014 से 2026 आते-आते गंगा में बहुत पानी बह चुका है और देश की राजनीति ने ऐसा मोड़ लिया है, जिसमें बीजेपी देश की सबसे मजबूत और धुरी पार्टी के रूप में स्थापित हो गई है.
2014 में जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा केंद्र की सत्ता में आई, तब कई राज्यों में उसकी अपनी सरकारें नहीं थीं. उस समय कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों का प्रभाव देश के बड़े हिस्से में मजबूत माना जाता था, लेकिन धीरे-धीरे बीजेपी ने न सिर्फ लोकसभा चुनावों में, बल्कि राज्यों की राजनीति में भी अपनी पकड़ मजबूत करनी शुरू की। 2014 में बीजेपी और उसके सहयोगियों की सरकारें काफी सीमित राज्यों में थीं.
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दक्षिण भारत, पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत के कई हिस्सों में पार्टी की मौजूदगी काफी कमजोर मानी जाती थी, जबकि कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों का दबदबा ज्यादा था। मोदी लहर, मजबूत संगठन और आक्रामक चुनावी रणनीति ने बीजेपी को तेजी से आगे बढ़ाया. पार्टी ने खुद को सिर्फ 'हिंदी पट्टी' तक सीमित नहीं रखा, बल्कि नए राज्यों में भी संगठन खड़ा किया.
2018 आते-आते उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, हरियाणा, असम और पूर्वोत्तर के कई राज्यों में पार्टी या उसके सहयोगियों की सरकारें बन चुकी थीं. बीजेपी ने सिर्फ चुनाव जीतने पर ध्यान नहीं दिया, बल्कि बूथ और 'पन्ना' स्तर तक संगठन को मजबूत किया. 2026 तक आते-आते देश का राजनीतिक नक्शा काफी हद तक बदलता दिखाई देता है.
बंगाल और ओडिशा में भी बीजेपी सत्ता में है. भाजपा और उसके सहयोगियों का प्रभाव देश के बड़े हिस्से में फैल चुका है और फिलहाल 21 राज्यों में एनडीए की सरकारें हैं. कई ऐसे राज्य, जहां कभी भाजपा की उपस्थिति बेहद कम थी, वहां भी पार्टी आज चुनावी मुकाबले में मुख्य खिलाड़ी बन चुकी है.
नरेंद्र मोदी ने कैसे बदली देश की राजनीति?
2014 के चुनाव से पहले नरेंद्र मोदी को जब पार्टी की चुनाव प्रचार समिति का कमान सौंपी गई, तो उन्होंने प्रचार अभियान को हाईटेक बनाने में एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। नरेंद्र मोदी ने 3D होलोग्राम कैंपेन लॉन्च किया, जिससे चुनावी माहौल पूरी तरह आधुनिक और हाईटेक हो गया. इतना ही नहीं, उन्होंने देश की राजनीतिक दशा और दिशा को भी बुनियादी तौर पर बदलकर रख दिया.
2014 से पहले ज्यादातर सियासी दलों का मुख्य फोकस अल्पसंख्यक वोट बैंक पर हुआ करता था, कांग्रेस से लेकर तमाम क्षेत्रीय दल अल्पसंख्यक केंद्रित सियासत किया करते थे, लेकिन 2014 के बाद पूरी राजनीति ही बदल गई. नरेंद्र मोदी ने अलग-अलग जातियों में बंटे समाज को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की छतरी के नीचे एकजुट कर पूरा सियासी खेल ही पलट दिया.
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प्रधानमंत्री मोदी से लेकर बीजेपी के तमाम नेताओं ने खुलकर हिंदुत्व और सांस्कृतिक गौरव की राजनीति करने का दांव चला. इसका असर यह हुआ कि अल्पसंख्यक केंद्रित रहने वाली राजनीतिक दलों की पारंपरिक सियासत हाशिए पर चली गई और देश का राजनीतिक विमर्श बहुसंख्यक आबादी की चिंताओं और सांस्कृतिक एजेंडे की ओर शिफ्ट हो गया. इसका नतीजा यह हुआ कि खुद को सेकुलर कहने वाले नेता भी अब मंदिरों में माथा टेकते नज़र आते हैं और अपनी धार्मिक पहचान जाहिर करने से नहीं झिझकते.
प्रधानमंत्री मोदी के इस नए सियासी ढर्रे के चलते विपक्ष को भी अपनी शैली बदलने पर मजबूर होना पड़ा. 2014 और 2019 में मिली हार के बाद राहुल गांधी को भी अपनी राजनीतिक कार्यशैली में बदलाव लाना पड़ा और उन्हें सड़क पर उतरकर जनता से सीधा संवाद कायम करना पड़ा. राहुल गांधी ने संघर्ष कर अपनी नई सियासी पहचान बनाने की कवायद शुरू की, जिससे उनकी छवि में बदलाव आया. कन्याकुमारी से कश्मीर तक 'भारत जोड़ो यात्रा' निकाली, उसके बाद पूर्वोत्तर से मुंबई तक की यात्रा की और हाल ही में बिहार में 'वोट अधिकार यात्रा' के जरिए अपनी उपस्थिति दर्ज कराई.
कुबूल अहमद