Gen-Z का एक आंदोलन और सियासत का रुख अचानक कॉलेज और यूनिवर्सिटीज की ओर कैसे मुड़ा?

जंतर-मंतर से रांची तक हुए छात्र आंदोलन में युवाओं की बढ़ती सक्रियता ने राजनीतिक दलों को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया है. परीक्षा में धांधली और रोजगार जैसे मुद्दों पर मुखर 'Gen-Z' को साधने के लिए अब भाजपा और कांग्रेस दोनों एक नई राजनीति के साथ मैदान में उतर रहे हैं.

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Gen-Z आंदोलन से बदली देश की सियासत (Photo-Getty) Gen-Z आंदोलन से बदली देश की सियासत (Photo-Getty)

कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली,
  • 20 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 1:51 PM IST

देश की राजनीति का केंद्र इन दिनों Gen-Z यानी युवा पीढ़ी पर केंद्रित हो रहा है. दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर देश के विभिन्न हिस्सों तक परीक्षा में धांवली, पेपर लीक और रोजगार के मुद्दों पर जिस तरह युवा सड़कों पर उतरकर सरकार पर दबाव बनाने और अपनी मांगें मनवाने में कामयाब रहे हैं, उसने एक नया राजनीतिक माहौल तैयार कर दिया है, इस स्थिति को देखते हुए अब युवाओं का भरोसा जीतने के लिए भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों ही चुनावी मैदान में सक्रिय हो गई हैं.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले एक दशक में 'परीक्षा पर चर्चा' जैसे अभियानों के जरिए छात्रों और युवाओं के बीच एक संवाद स्थापित किया था, लेकिन मौजूद परिस्थितियों में यह पकड़ कुछ ढीली पड़ती दिख रही है. वहीं दूसरी ओर, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी युवाओं के बीच अपनी पैठ मजबूत करने का प्रयास कर रहे हैं, जिसके लिए देश के कॉलेज और विश्वविद्यालय नए सियासी अखाड़े बनते नजर आ रहे हैं. 

दिल्ली में हुए छात्र आंदोलनों के बाद देश में Gen-Z एक प्रभावकारी वोटबैंक के रूप में देखा जा रहा है. इसी कारण दोनों प्रमुख दलों ने युवाओं को साधने की विस्तृत रूपरेखा तैयार की है. एक ओर कांग्रेस लगभग 800 शहरों में 'छात्रों की गूंज' अभियान चलाने जा रही है, तो दूसरी ओर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार छात्रों और युवाओं से सीधा संपर्क स्थापित करने के लिए 'वन डे, वन यूनिवर्सिटी' (One Day, One University) अभियान शुरू करने की योजना बना रही है.

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युवाओं को साधने के लिए कांग्रेस का प्लान

राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी छात्रों व उनके परिवारों के बीच अपनी राजनीतिक पहुंच बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं. दिल्ली के इंदिरा भवन में आयोजित कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) की बैठक में पार्टी ने छात्रों व युवाओं से जुड़े मुद्दों को उठाने के लिए देश भर के लगभग 800 छोटे-बड़े शहरों में 'छात्रों की गूंज' अभियान चलाने का निर्णय लिया है. इस अभियान के तहत आयोजित होने वाले कार्यक्रमों में राहुल गांधी स्वयं विभिन्न शहरों का दौरा करेंगे.

इस अभियान के माध्यम से कांग्रेस पेपर लीक, प्रतियोगी परीक्षाओं में अनिमितताओं, बढ़ती फीस और बेरोजगारी जैसे विषयों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने का काम करेगी. इसे केवल तात्कालिक राजनीतिक प्रतिक्रिया न मानकर भविष्य के मतदाता वर्ग तक पहुँच बनाने की एक दीर्घकालिक रणनीति के रूप में देखा जा रहा है.

इसके साथ ही, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कांग्रेस शासित चार राज्यों के मुख्यमंत्रियों को अपने-अपने राज्यों की शिक्षा व्यवस्था, परीक्षाओं की स्थिति और पेपर लीक जैसी समस्याओं की गहन समीक्षा करने के निर्देश दिए हैं. मुख्यमंत्रियों को आवश्यक सुधारों की रिपोर्ट तैयार कर एक महीने के भीतर पार्टी अध्यक्ष को सौंपने और उन्हें लागू करने के लिए कहा गया है.

छात्रों के असंतोष पर कांग्रेस की रणनीति

कांग्रेस की रणनीति का एक मुख्य पहलू यह है कि राहुल गांधी परीक्षा देने वाले अभ्यर्थियों को व्यक्तिगत संदेश भेजने की योजना पर कार्य कर रहे हैं. इस संदेश में डॉ. भीमराव आंबेडकर और भारतीय संविधान का उल्लेख करते हुए युवाओं को अपने अधिकारों की रक्षा करने और अपने भविष्य के प्रति जागरूक रहने के लिए प्रेरित किया गया है. पूर्व में छात्र आंदोलनों के दौरान घायल हुए युवाओं से राहुल गांधी ने व्यक्तिगत रूप से मुलाकात की थी और वे संसद से सड़क तक छात्रों के मुद्दों को लगातार उठाते रहे हैं.

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देहरादून, प्रयागराज और कोटा जैसे स्थानों पर 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रमों के माध्यम से राहुल गांधी ने केंद्र सरकार को शिक्षा और रोजगार के मोर्चे पर घेरने का प्रयास किया है. इस रणनीति के जरिए कांग्रेस युवाओं को अपने पक्ष में जोड़कर राजनीतिक बढ़त बनाने का प्रयास कर रही है,

भाजपा का 'वन डे, वन यूनिवर्सिटी' कार्यक्रम

राहुल गांधी और कांग्रेस की इस सक्रियता को देखते हुए केंद्र सरकार ने भी अपनी जवाबी रणनीति तैयार की है. केंद्र सरकार छात्रों और युवाओं से सीधा संवाद स्थापित करने के उद्देश्य से 'वन डे, वन यूनिवर्सिटी' नामक देशव्यापी कार्यक्रम शुरू करने की तैयारी में है. इस योजना के तहत प्रत्येक दिन एक केंद्रीय मंत्री देश के किसी विश्वविद्यालय का दौरा करेंगे और छात्रों के साथ आमने-सामने संवाद करेंगे.

भाजपा और सरकार का उद्देश्य केवल सरकारी योजनाओं की जानकारी देना नहीं, बल्कि छात्रों की समस्याओं, चिंताओं और सुझावों को प्रत्यक्ष रूप से सुनना है. केंद्रीय मंत्री कैंपस में जाकर शिक्षा, रोजगार, स्किल डेवलपमेंट, परीक्षा प्रणाली और अन्य युवाओं से जुड़े विषयों पर खुले मंच से चर्चा करेंगे.

छात्रों के मुद्दों पर बिछती सियासी बिसात

छात्रों का यह विषय केवल कुछ प्रतियोगी परीक्षाओं के विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके केंद्र में वह युवा वर्ग है जो नया मतदाता बन रहा है. पारंपरिक राजनीतिक ढर्रे से अलग, Gen-Z पीढ़ी के छात्र आंदोलनों ने एक नई कार्यशैली दिखाई है. इनका विरोध केवल भाषणों तक सीमित न रहकर सोशल मीडिया, डिजिटल अभियानों और विभिन्न संचार माध्यमों के जरिए सीधा व असरदार रहा है.

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भारत की विशाल युवा आबादी को देखते हुए पहली बार मतदान करने वाले मतदाता (First-time Voters) अक्सर किसी भी चुनाव के परिणाम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. ऐसे में कॉलेज और विश्वविद्यालय अब केवल शैक्षणिक संस्थान न रहकर उस जनमत की नर्सरी बन रहे हैं जहाँ से भावी मतदाताओं की राजनीतिक सोच आकार लेती है.

Gen-Z के इस रुख ने राजनीतिक दलों को स्पष्ट संदेश दिया है कि केवल आश्वासनों से काम नहीं चलेगा. जो भी दल युवाओं की शिक्षा, रोजगार और पारदर्शी व्यवस्था की मांग का समाधान प्रस्तुत करेगा, देश के कैंपस और सत्ता में उसी की स्वीकार्यता बढ़ेगी. एक ओर प्रधानमंत्री मोदी का स्वरूप है जो संवाद और योजनाओं के माध्यम से युवाओं से जुड़ने का प्रयास कर रहा है, तो दूसरी ओर राहुल गांधी का उभार है जो जवाबदेही और अधिकारों के प्रश्नों के जरिए युवाओं तक अपनी पहुंच बना रहे हैं.

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