1974 की बात है. भारत की खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग के संस्थापक रामेश्वर नाथ काव ढाका में थे. लेकिन तब उनकी पहचान एक इंटेलिजेंस चीफ की नहीं थी. वे पान पत्ता व्यापारी बनकर बांग्लादेश पहुंचे थे. बांग्लादेश की सेना के कुछ लोग उस समय बांग्लादेश के प्रधानमंत्री रहे शेख मुजीबुर रहमान के खिलाफ साजिश रच रहे थे. लेकिन, मुजीब को यकीन नहीं था कि उनके अपने ही लोग उनकी हत्या कर देंगे.
कुछ महीनों बाद 15 अगस्त 1975 की सुबह-सुबह, सैनिक ढाका के धनमंडी रोड 32 पर स्थित मुजीब के घर में घुस गए. बांग्लादेश के फाउंडर की बेरहमी से हत्या कर दी गई; उनके साथ उनकी पत्नी, तीन बेटों और परिवार के कई अन्य सदस्यों को भी मार डाला गया. आर.एन. काव की चेतावनी भी एकदम साफ थी. भारतीय खुफिया एजेंसी को उन सैन्य टुकड़ियों के बारे में जानकारी थी जो इसमें शामिल थीं, और एक रिपोर्ट के मुताबिक काव ने उन अधिकारियों के नाम भी बताए थे जिन पर तख्तापलट की साजिश रचने का शक था. इसके कुछ महीनों बाद एक और चेतावनी दी गई. लेकिन मुजीब फिर भी आश्वस्त नहीं हुए.
भारत की विदेशी खुफिया एजेंसी RAW के 58 साल पूरे होने के मौके पर, इसके शुरुआती दिनों के किस्सों को याद करना दिलचस्प होगा. 21 सितंबर 1968 को बनी इस एजेंसी को इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) के अधिकारी काव ने खड़ा किया था. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें भारत की नई विदेशी खुफिया सेवा का प्रमुख चुना था. काव ने शुरुआती ऑपरेटिव्स की एक टीम खुद चुनी थी, जिन्हें बाद में "काव बॉयज़" के नाम से जाना गया.
1971 की लड़ाई में RAW की गुप्त भूमिका और मुक्ति वाहिनी को दिए गए समर्थन की वजह से, RN काव को बांग्लादेश की आज़ादी के मुख्य सूत्रधारों में से एक माना जाता है.
तो मुजीबुर रहमान को होने वाले खतरों के बारे में काव को असल में क्या पता था? उन्होंने मुजीब को कब आगाह किया? और बांग्लादेश के नेता ने उस जानकारी को क्यों नज़रअंदाज़ कर दिया जो सीधे उस देश की इंटेलिजेंस एजेंसी के प्रमुख से आई थी, जिसने सिर्फ़ तीन साल पहले ही बांग्लादेश को बनाने में मदद की थी?
बांग्लादेश के बारे में वह कागज़ का टुकड़ा जो आर.एन. काव तक पहुंचा
इस घटना का विस्तार से ज़िक्र पत्रकार अशोक रैना की 1981 में आई किताब 'इनसाइड रॉ: द स्टोरी ऑफ़ इंडियाज़ सीक्रेट सर्विस' में मिलता है. रैना की किताब के अनुसार, जून 1974 के आस-पास बांग्लादेशी सेना के कई अफ़सर, जिनमें मेजर सैयद फ़ारूक़ रहमान और मेजर खांडेकर अब्दुर रशीद शामिल थे, तत्कालीन डिप्टी आर्मी चीफ़ ज़ियाउर रहमान के घर पर मिले थे,
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कहा जाता है कि मीटिंग के बाद फेंका गया कागज़ का एक टुकड़ा एक क्लर्क को मिला, जो R&AW के एक ऑपरेटिव तक पहुंचा और आख़िरकार नई दिल्ली में काव के पास पहुंच गया.
अपनी पहचान छिपाकर बांग्लादेश के PM से मिल आए काव
काव को यकीन हो गया कि इस खुफिया जानकारी पर सीधे दखल देने की ज़रूरत है, इसलिए वे प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पास गए. यह जानकारी इतनी संवेदनशील थी कि इस ब्यौरे के अनुसार काव अपनी पहचान ज़ाहिर नहीं करना चाहते थे. लेकिन भारत का खुफिया चीफ बांग्लादेश के प्रधानमंत्री से गुपचुप तरीके से कैसे मिल सकता था?
रैना के ब्यौरे के मुताबिक, काव "पान निर्यातक" (पान एक्सपोर्टर) का भेष बदलकर ढाका पहुंचे और उन्हें पहले से तय मीटिंग की जगह पर ले जाया गया. किताब के अनुसार काव और मुजीब के बीच यह मीटिंग लगभग एक घंटे तक चली.
बगीचे में काव और मुजीब की मुलाकात
काव के ज़ोर देने पर यह मीटिंग बंगभवन के लॉन में हुई. जब वे ऐसी जगह पहुंच गए जहां कोई और उनकी बात न सुन सके, तो काव ने उन्हें बताया कि R&AW के पास ऐसी खुफिया जानकारी है जिससे पता चलता है कि उनकी जान को खतरा है. ढाका के अखबार 'द डेली स्टार' की रिपोर्ट के मुताबिक काव ने उन अधिकारियों के नाम भी बताए जिनके बारे में शक था कि वे तख्तापलट की साजिश रच रहे हैं. हालांकि मुजीब को इस बात पर यकीन नहीं हुआ.
अशोक रैना की 1981 में आई किताब 'इनसाइड RAW: द स्टोरी ऑफ़ इंडियाज़ सीक्रेट सर्विस' में लिखा है, "काव मुजीब को यह समझाने में नाकाम रहे कि तख्तापलट की साजिश रची जा रही है और उनकी जान को खतरा है, जबकि उन्होंने उन लोगों के नाम भी बताए थे जिन पर इसमें शामिल होने का शक था."
रैना ने आगे कहा, "यह सोच कि 'ये मेरे बच्चे हैं और वे मुझे कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकते,' उनके लिए मौत का कारण बनी."
काव ने इस बात पर और बहस नहीं की लेकिन मुजीब से कहा कि खुफिया जानकारी भरोसेमंद है और उन्हें और जानकारी देने का वादा किया. और सबसे अहम बात यह है कि यह आखिरी चेतावनी नहीं थी.
RAW ने मुजीबुर रहमान को और जानकारी दी
मार्च 1975 में, काव ने RAW के एक सीनियर अफ़सर को ढाका भेजा. इस बार खुफिया जानकारी और भी सटीक थी. अफसर ने मुजीब को उन मिलिट्री यूनिट्स और रैंक के बारे में जानकारी दी, जिनमें काम कर रहे और नौकरी से निकाले गए वे सैनिक शामिल थे, जिन पर तख्तापलट की तैयारी में शामिल होने का शक था. रैना के बयान के मुताबिक एक बार फिर मुजीब को इस बात पर यकीन नहीं हुआ.
इस पूरी घटनाक्रम की पुष्टि खुद काव ने भी बहुत मज़बूती से की है.
कलकत्ता से छपने वाली मैगज़ीन 'संडे' के 23-29 अप्रैल, 1989 के अंक में काव ने लिखा कि मुजीब को बताया गया था कि सेना की दो यूनिट्स में "उनकी जान लेने की साज़िश रची जा रही है." उन्होंने इन यूनिट्स की पहचान "आर्टिलरी और कैवेलरी" के तौर पर की थी.
बांग्लादेशी अख़बार 'प्रोथोम आलो' में छपी काव की बात के मुताबिक उन्होंने लिखा, "दुर्भाग्य से, शेख ने इन सभी चेतावनियों को नज़रअंदाज़ कर दिया."
RAW के पूर्व अफ़सर बी. रमन ने बाद में काव की सोच के बारे में और जानकारी दी. अपनी किताब 'द काओबॉयज़ ऑफ़ RAW' में रमन ने बताया कि हत्या के बाद आलोचना हुई थी कि बांग्लादेश में भारतीय खुफिया एजेंसी नाकाम रही. काव ने इस आरोप को खारिज कर दिया.
रमन ने याद करते हुए बताया कि काव ने उनसे पूछा था, "अगर मुजीब हमारी चेतावनियों को गंभीरता से नहीं लेंगे, तो RAW को कैसे ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है?" रमन ने लिखा कि RAW को बांग्लादेश की सेना के कुछ हिस्सों में मुजीब की घटती लोकप्रियता और उनके ख़िलाफ़ रची जा रही साज़िशों के बारे में पता था, और इंदिरा गांधी को भी इसकी जानकारी दी गई थी.
आखिरकार 15 अगस्त, 1975 का दिन आया जब मुजीब और उनके परिवार की हत्या कर दी गई.
सुशीम मुकुल