लिव-इन, इंटर-कास्ट और टीनेज लव पर मिसाल बने कोर्ट के फैसले, प्यार को बताया 'आजादी'

भारतीय न्यायपालिका ने हाल ही में शादीशुदा पुरुषों के लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी मान्यता देने जैसे प्रगतिशील फैसले दिए हैं. मेघालय और इलाहाबाद हाईकोर्ट के ये फैसले सामाजिक बदलाव और आजादी के अधिकार को मजबूत करते हैं.

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कोर्ट ने 'प्यार' के आजादी का हिस्सा बताया है. (Photo: Representational) कोर्ट ने 'प्यार' के आजादी का हिस्सा बताया है. (Photo: Representational)

संयम श्रीवास्तव

  • नई दिल्ली,
  • 02 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 5:12 AM IST

आम तौर पर दुनिया भर में न्यायपालिका को रूढ़ीवादी फैसलों को अहमियत देने वाला माना जाता रहा है. भारत में भी कुछ ऐसा ही रहा है. आजादी के कुछ दशकों बाद तक ऐसा रहा पर इधर कुछ सालों से भारतीय न्यायपालिका ने ऐसे फैसले सुनाए हैं, जिन्हें बेशक प्रगतिशील फैसले कहा जा सकता है. जाहिर है कि ऐसे फैसले सामाजिक बदलाव की दिशा में एक अहम कदम साबित होते हैं. 

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इसी हफ्ते मेघालय हाईकोर्ट के एक फैसले में कहा गया कि ‘रोमियो-जूलियट’ कैटेगिरी के मामलों में पॉक्सो एक्ट के तहत दर्ज मुकदमों को रद्द किया जा सकता है. खासकर जब दो किशोरों के बीच सहमति से संबंध हो. इसी तरह, हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ किया कि शादीशुदा शख्स भी किसी एडल्ट के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रह सकता है, बशर्ते वो सहमति के साथ हो. 

इन दोनों फैसलों से साफ झलकता है कि कोर्ट प्यार और रिश्तों को जुर्म की कैटेगिरी से बाहर रखने के पक्ष में है. इससे ये भी साफ होता है कि अदालत व्यक्तिगत गरिमा को प्रोटेक्शन देने के पक्ष में है. ऐसे फैसले समाज की पारंपरिक मानसिकता के लिए किसी चुनौती से कम नहीं हैं.

समय-समय पर न्यायपालिका को ऐसे फैसले नजीर बन जाते हैं. क्योंकि लोकतंत्र में चुनी हुई सरकारें बहुमत की भावनाओं को देखते हुए ऐसे कानून कभी नहीं बना सकतीं, जिन्हें समाज पचा न सके. मेघालय हाईकोर्ट का फैसला इस मामले में ऐतिहासिक है. 

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यह भी पढ़ें: मेघालय हाईकोर्ट ने 'रोमियो-जूलियट' क्लॉज के तहत आने वाले मामलों में POCSO हटाने की दी परमिशन

चीफ जस्टिस रेवती मोहिते डेरे और जस्टिस एचएस थांगखीव की बेंच ने POCSO एक्ट की सख्ती को मंजूर किया. अदालत ने कहा कि किशोरों के बीच ‘रोमियो-जूलियट’ की तरह सहमति वाले संबंधों में मुकदमे को रद्द करने का प्रावधान BNSS की धारा 528 के तहत किया जा सकता है.

टीनेज लव पर दिए बड़े फैसले

कोर्ट ने माना कि POCSO कानून बच्चों की सुरक्षा के लिए है, लेकिन टीनेज में प्यार की भावनाओं को अपराध मानने से एजुकेशन, करियर और जीवन बर्बाद होने का खतरा बढ़ जाता है. सुप्रीम कोर्ट की ‘रोमियो-जूलियट’ न्याय-व्यवस्था का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि उम्र, स्वेच्छा और दोनों पक्षों के भविष्य को ध्यान में रखना जरूरी है. 

ये फैसला उन हजारों मामलों पर लागू हो सकता है, जहां परिवार की शिकायत पर कपल को POCSO के जाल में फंसा दिया जाता है. इससे साफ है कि प्राकृतिक प्रेम को अपराध नहीं माना जाना चाहिए, जब तक कि इसमें जबरदस्ती या शोषण की बात सामने न आए.

इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला भी ऐतिहासिक

पिछले हफ्ते इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी स्वाभाविक प्रेम पर और भी अहम फैसला सुनाया है. जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की बेंच ने कहा कि शादीशुदा मर्द का किसी एडल्ट महिला के साथ सहमति पर लिव-इन में रहना कोई जुर्म नहीं है. कोर्ट ने कहा कि नैतिकता और कानून को अलग रखना चाहिए. अगर कानून के तहत कोई अपराध नहीं बनता, तो सामाजिक राय या नैतिकता अदालत के फैसले को प्रभावित नहीं कर सकती. 

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ये फैसला उन कपल्स के लिए राहत है, जो पारिवारिक दबाव या सामाजिक कलंक से गुजर रहे हैं. दोनों फैसलों से एक बात उभरती है कि कोर्ट अधिकतर मामलों में प्रेम को अपराध की बजाय मानवीय भावना मान रहा है. प्यार को लेकर जज संविधान के आर्टिकल 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) को सही मायने में समझा रहे हैं.

पहले भी अदालतों के फैसले बने 'मिसाल'

इन दोनों फैसलों को देखते हुए न्यायपालिका के दूसरे उदाहरण भी याद आ रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट ने 2010 के खूशबू मामले में साफ कहा था कि लिव-इन रिलेशनशिप न तो अपराध है और न पाप, भले ही सामाजिक रूप से अस्वीकार्य हो. 2013 के इंद्रा शर्मा मामले और डी. वेलुसामी मामले में कोर्ट ने लिव-इन को ‘विवाह जैसी स्थिति’ मानते हुए महिलाओं को घरेलू हिंसा कानून के तहत सुरक्षा दी. 

2006 के लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश मामले में कोर्ट ने अंतरजातीय विवाह को संरक्षण देते हुए कहा कि एडल्ट इंसान अपनी मर्जी से साथी चुन सकता है और परिवार या समाज दखलअंदाजी नहीं कर सकता. इसी तरह, शफीन जहां (हदिया) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इंटर-रिलीजन लव मैरिज को व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा बताया और ‘लव जिहाद’ जैसे आरोपों को खारिज किया.

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2018 में नवतेज सिंह जोहर मामले में समलिंगी संबंधों को भी अपराध नहीं माना, जबकि जोसेफ शाइन मामले में एडल्ट्री को अपराध की कैटेगिरी से बाहर किया गया. इन फैसलों ने ‘संवैधानिक नैतिकता’ को सामाजिक नैतिकता से ऊपर रखा. जाहिर है कि जो फैसले न्यायालयों ने दिए उन्हें कभी कोई सरकार कानून बनाकर आम लोगों के लिए ये रास्ते नहीं बना सकती थी.

दिल्ली हाईकोर्ट, राजस्थान हाईकोर्ट और अन्य अदालतों ने बार-बार इंटर-कास्ट या इंटर-रिलीजन लिव-इन कपल्स को पुलिस सुरक्षा दी है. 2025 में दिल्ली हाईकोर्ट ने अंतरजातीय संघों को ‘राष्ट्रीय हित’ बताया और परिवारों की दखलअंदाजी को असंवैधानिक करार दिया. 

यह भी पढ़ें: 'शादीशुदा पुरुष का लिव-इन रिलेशनशिप में रहना कोई अपराध नहीं', मैरिड कपल की याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला

चुनौती से कम नहीं ऐसे फैसले

इन उदाहरणों से पता चलता है कि न्यायपालिका लगातार प्यार की आजादी को संवैधानिक मूल्यों, समानता, गरिमा और गोपनीयता के आधार पर मजबूत कर रही है. ये फैसले समाज के लिए चुनौती से भरे क्यों हैं? क्योंकि भारतीय समाज अभी भी पारंपरिक परिवार व्यवस्था, जाति, धर्म और नैतिकता के घेरे में बंधा है. 

लिव-इन, इंटर-कास्ट लव या टीनेज लव को ‘संस्कृति के खिलाफ’ माना जाता है. खाप पंचायतें, परिवार और कुछ राजनीतिक ताकतें ऐसे संबंधों को ‘समाज की नींव हिलाने वाला’ बताती हैं. लेकिन इतिहास गवाह है कि समाज बदलाव को हमेशा धीरे-धीरे अपनाता है. सती प्रथा, बाल विवाह, विधवा विवाह निषेध आदि ये सब कानून पहले बने, फिर समाज ने इन्हें अपनाया. 

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आज की पीढ़ी लिव-इन को सामान्य मान रही है, लेकिन 20 साल पहले ये सोचना भी मुश्किल था.  लोकतंत्र में विधायिका बहुमत की भावनाओं को दिखाती है. कोई भी सरकार POCSO में ‘रोमियो-जूलियट’ क्लॉज लाने या लिव-इन को पूरी तरह कानूनी मान्यता देने का जोखिम नहीं उठा सकती, क्योंकि विपक्ष इसे ‘संस्कृति का अपमान’ बता देगा. 

2012 के POCSO कानून के बाद भी सरकार ने टीनेज लव के मुद्दे पर साफ रुख नहीं अपनाया, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने 2026 में ही ‘रोमियो-जूलियट’ क्लॉज पर विचार करने को कहा था. इसी तरह, समलिंगी विवाह या लिव-इन पर कोई समग्र कानून नहीं बना. यहां न्यायपालिका का रोल अहम हो जाता है.

कोर्ट संविधान की व्याख्या करते हुए ‘जीवन का अधिकार’ को ‘गोपनीयता का अधिकार’ (पुट्टास्वामी मामले) और ‘साथी चुनने का अधिकार’ तक विस्तारित करते हैं. वो सामाजिक दबाव से ऊपर उठकर इंसाफ करते हैं. 

यह भी पढ़ें: शादीशुदा व्यक्ति का लिव-इन रिलेशनशिप में रहना जायज है या नहीं, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा?

समाज को आईना दिखाता है कोर्ट

हालांकि, कुछ आलोचक इसे ‘न्यायिक अतिक्रमण’ कहते हैं. लेकिन असल में ये न्यायपालिका का संवैधानिक कर्तव्य है. जब कार्यपालिका और विधायिका सामाजिक बदलाव में हिचकिचाती हैं, तो अदालतें पुल का काम करती हैं. वो समाज को आईना दिखाती हैं और कहती हैं कि प्यार अपराध नहीं, स्वतंत्रता का हिस्सा है. समाज की निरंतरता यही है कि हर पीढ़ी पुरानी बेड़ियों को तोड़े. 

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मेघालय और इलाहाबाद के फैसले इसी निरंतरता का हिस्सा हैं. इन फैसलों का प्रभाव दूरगामी होंगे. टीनेज लव अपराधीकरण से बचेंगे, तो युवा पीढ़ी बिना कलंक के आगे बढ़ेगी. लिव-इन में सुरक्षा मिलने से महिलाओं को शोषण से बचाव होगा और पुरुषों को नैतिकता के नाम पर दोषी नहीं ठहराया जाएगा. 

समाज धीरे-धीरे स्वीकार करेगा कि प्यार की परिभाषा बदल रही है. जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दो सहमति वाले एडल्ट का चुनाव परिवार या समुदाय नहीं रोक सकता.

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