शादीशुदा व्यक्ति का लिव-इन रिलेशनशिप में रहना जायज है या नहीं, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा?

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप पर अहम फैसला देते हुए कहा कि कोई भी विवाहित व्यक्ति, जब तक विधिवत तलाक नहीं लेता, तीसरे व्यक्ति के साथ लिव-इन में नहीं रह सकता. जस्टिस विवेक कुमार सिंह की पीठ ने याचिका खारिज कर दी. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता पूर्ण नहीं है और यह दूसरे के वैधानिक अधिकारों से सीमित होती है. हालांकि, खतरे की स्थिति में सुरक्षा के लिए पुलिस से मदद ली जा सकती है.

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है. (Photo: Representational) इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है. (Photo: Representational)

पंकज श्रीवास्तव

  • प्रयागराज,
  • 28 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 8:31 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है. कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि कोई भी व्यक्ति जो पहले से विवाहित है और उसका जीवनसाथी जीवित है, वह बिना विधिवत तलाक लिए किसी तीसरे व्यक्ति के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में कानूनी रूप से नहीं रह सकता. जस्टिस विवेक कुमार सिंह की एकल पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए याचिका को निस्तारित कर दिया. याचिकाकर्ताओं ने अपने शांतिपूर्ण जीवन में हस्तक्षेप न करने और सुरक्षा देने की मांग की थी. उनका कहना था कि वे पति-पत्नी की तरह साथ रह रहे हैं, लेकिन परिजनों से जान का खतरा है.

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याचियों ने अपने शांतिपूर्ण जीवन में हस्तक्षेप न करने और सुरक्षा प्रदान करने का निर्देश दिए जाने की मांग की थी. याचियों ने दलील दी थी कि वे पति पत्नी की तरह साथ-साथ रह रहे हैं, लेकिन उन्हें परिजनों से जान का खतरा है, हालांकि राज्य सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए दलील दी, कहा याचिकाकर्ता पहले से विवाहित है, उन्होंने न्यायालय से तलाक की डिक्री हासिल नहीं की है, अनु और अन्य की ओर से दाखिल याचिका पर अधिवक्ता रोहित नंदन सिंह ने बहस की, जबकि सरकार की ओर से एडिशनल चीफ स्टैंडिंग काउंसिल योगेश कुमार ने पक्ष रखा.

उन्होंने कहा कि याचियों ने सक्षम न्यायालय से तलाक की डिक्री हासिल नहीं की है, इसलिए उनका लिव-इन रलेशन में रहने का यह कृत्य अवैध है. हाईकोर्ट ने कहा, विवाह या लिव-इन में रहने के लिए सहमति देने वाले दो वयस्क व्यक्तियों का होना जरूरी है, हालांकि कोर्ट ने कहा कि गोत्र जाति और धर्म की अवधारणा बहुत पुरानी है.

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किसी भी दो वयस्कों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है, यहां तक कि दो वयस्कों के माता-पिता भी उनके रिश्ते में हस्तक्षेप नहीं कर सकते, लेकिन स्वतंत्रता का अधिकार या व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार एक पूर्ण या असीमित अधिकार नहीं है.

व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नाम पर अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता
कोर्ट ने कहा, यह कुछ प्रतिबंध सीमित है. कोर्ट ने कहा एक व्यक्ति की स्वतंत्रता वहां समाप्त हो जाती है जहां दूसरे का वैधानिक अधिकार शुरू होता है. कोर्ट ने कहा कि पति और पत्नी को अपने साथी के साथ रहने का वैधानिक अधिकार है, उन्हें व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नाम पर उस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता और दूसरे पति और पत्नी के वैधानिक अधिकार का उल्लंघन करने के लिए ऐसी कोई सुरक्षा प्रदान नहीं की जा सकती है. एक व्यक्ति की स्वतंत्रता दूसरे व्यक्ति के कानूनी अधिकार का अतिक्रमण या उस पर हावी नहीं हो सकती. कोर्ट ने कहा याचिकाकर्ता पहले से विवाहित हैं और उनके पति-पत्नी जीवित हैं.

कोर्ट ने कहा उन्हें पूर्व पति या पत्नी से तलाक लिए बगैर किसी तीसरे व्यक्ति के साथ लिव-इन रिलेशन में रहने की कानूनी इजाजत नहीं दी जा सकती. हालांकि कोर्ट ने कहा है कि याचियों को परेशान किया जाता है या उन पर किसी प्रकार की हिंसा की जाती है, तो संबंधित एसपी या एसएसपी को आवेदन कर सकते हैं. कोर्ट ने कहा है कि आवेदन मिलने पर अधिकारी इसकी सामग्री का सत्यापन करेंगे. याचिकाकर्ताओं के जीवन और सुरक्षा के लिए कानून के मुताबिक आवश्यक कार्रवाई करेंगे. कोर्ट ने इन टिप्पणियों के साथ याचिका निस्तारित कर दी है.

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