मेघालय हाईकोर्ट ने 'रोमियो-जूलियट' क्लॉज के तहत आने वाले मामलों में POCSO हटाने की दी परमिशन

मेघालय हाईकोर्ट ने कहा है कि पॉक्सो एक्ट के तहत लंबित मामले रद्द भी किए जा सकते हैं. मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली बेंच ने यह भी बताया है कि ऐसा कब और किन मामलों में किया जा सकता है.

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2019 में दर्ज हुई थी FIR (Photo: ITG) 2019 में दर्ज हुई थी FIR (Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 31 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 7:17 PM IST

'रोमियो-जूलियट' क्लॉज के तहत आने वाले मामलों में प्रिवेंशन ऑफ चाइल्ड सेक्सुअल ऑफेंस यानी पॉक्सो को लेकर मेघालय हाईकोर्ट का अहम फैसला आया है. मेघालय हाईकोर्ट ने कहा है कि पॉक्सो के तहत लंबित केस रद्द भी किए जा सकते हैं. ऐसा फैसला बहुत सावधानी से, कुछ खास परिस्थितियों में और सिर्फ साधारण मामलों में ही लिया जाना चाहिए. ऐसा तब किया जा सकता है, जब किशोर और किशोरी के बीच संबंध आपसी सहमति से हों.

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मेघालय हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रेवती मोहिते डेरे और न्यायमूर्ति एचएस थांगखियू की बेंच ने कहा कि ऐसा स्पष्ट अन्याय से बचने, न्याय सुनिश्चित करने के लिए किया जा सकता है. कोर्ट ने कहा कि पॉक्सो बच्चों की सुरक्षा के लिए कड़ा कानून है, लेकिन कोर्ट किशोरों के बीच वास्तविक रिश्ते को नजरअंदाज नहीं कर सकती. कोर्ट ने रोमियो-जूलियट क्लॉज का हवाला दिया और कहा कि ऐसे मामलों में सख्ती से पॉक्सो लागू किए जाने पर गंभीर अन्याय हो सकता है.

हाईकोर्ट ने कहा कि मेघालय में मातृसत्तात्मक व्यवस्था है, यहां महिलाओं को ज्यादा स्वतंत्रता मिलती है. सामाजिक पहलुओं का ध्यान रखना भी जरूरी है. कोर्ट ने कहा कि अगर दोनों शादी कर चुके हों या पति-पत्नी की तरह साथ रह रहे हों और उनका बच्चा भी हो, ऐसे में लड़के को जेल भेजने से न्याय का उद्देश्य पूरा नहीं होगा. यह पीड़िता और उसके बच्चे के साथ अन्याय होगा.

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हाईकोर्ट ने कहा कि मेघालय में मातृसत्तात्मक व्यवस्था है, यहां महिलाओं को ज्यादा स्वतंत्रता मिलती है. सामाजिक पहलुओं का ध्यान रखना भी जरूरी है. कोर्ट ने कहा कि अगर दोनों शादी कर चुके हों या पति-पत्नी की तरह साथ रह रहे हों और उनका बच्चा भी हो, ऐसे में लड़के को जेल भेजने से न्याय का उद्देश्य पूरा नहीं होगा. यह पीड़िता और उसके बच्चे के साथ अन्याय होगा.

मेघायलय हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली दो जजों की बेंच ने कहा कि इससे सच्चे प्रेम संबंध अपराध बन सकते हैं. युवाओं का भविष्य खराब हो सकता है और अगर ऐसे रिश्ते से बच्चे पैदा होते हैं, तो उन पर भी इसका गलत प्रभाव पड़ सकता है. कोर्ट ने कहा कि हर मामले में उम्र के अंतर समेत कुछ बातों पर ध्यान देना जरूरी होता है. मेघायलय हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी 22 साल के एक युवक के खिलाफ दर्ज पॉक्सो के मामले में सुनवाई करते हुए की.

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गौरतलब है कि युवक का प्रेम संबंध 16 साल की लड़की के साथ था. लड़की गर्भवती हो गई, जिसके बाद 3 मई 2019 को युवक के खिलाफ पॉक्सो के तहत केस दर्ज हुआ था. बाद में दोनों ने हाईकोर्ट में आपसी सहमति से रिश्ते की बात कही और यह भी बताया कि दोनों साल 2018 से साथ रह रहे थे और उनका एक बच्चा भी है. शिकायतकर्ता लड़की और उसकी दादी ने हाईकोर्ट में हलफनामा देकर केस खत्म करने की अपील की थी. 

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क्या है 'रोमियो-जूलियट' क्लॉज

इस क्लॉज की प्रेरणा रोमियो और जूलियट नाटक से ली गई है, जो शेक्सपियर का प्रसिद्ध नाटक है और प्रेम के साथ सामाजिक विरोध को दर्शाता है. इस क्लॉज का उपयोग ऐसे किशोर, ऐसे युवाओं को कानूनी संरक्षण देने के लिए होता है जिनका रिश्ता आपसी सहमति पर आधारित हो. लगभग समान उम्र के किशोर और युवाओं से जुड़े आपसी सहमति पर आधारित संबंध भी इस क्लॉज के तहत आपराधिक श्रेणी से बाहर रखा जाता है.

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'रोमियो-जूलियट' क्लॉज की शुरुआत अमेरिका से हुई. अमेरिका के कई राज्यों में जब यह महसूस किया गया कि सहमति से बने किशोर संबंधों को भी रेप जैसे अपराध में गिना जाने लगा है, तब यह क्लॉज वहां अपनाया गया. बाद में कई अन्य देशों ने भी अपने कानून में ऐसे प्रावधान शामिल किए. इस क्लॉज के तहत आमतौर पर तभी राहत मिलती है, जब उम्र का अंतर दो से पांच-छह साल तक का हो.

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