नेपाल में आए फ्लैश फ्लड ने हिमालयी इलाकों में प्राकृतिक आपदाओं के खतरे को फिर सामने ला दिया है. इसी को ध्यान में रखते हुए भारत ने भी अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं. केंद्र सरकार ने हिमालयी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) और हिमस्खलन के खतरे की समीक्षा की है. सरकार अब आपदा आने के बाद राहत पहुंचाने के बजाय पहले से खतरे की पहचान पर जोर दे रही है.
गुरुवार को केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन ने नई दिल्ली में एक अहम बैठक की अध्यक्षता की. इसमें हिमालयी राज्यों के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए. उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के मुख्य सचिव भी बैठक में मौजूद रहे.
बैठक में गृह मंत्रालय के अलावा राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, केंद्रीय जल आयोग और मौसम विभाग और रक्षा क्षेत्र की तकनीकी संस्था DGRE के अधिकारी भी बैठक में मौजूद रहे.
सरकार ने संवेदनशील इलाकों की लगातार निगरानी करने के निर्देश दिए हैं. साथ ही खतरे की सूचना लोगों तक जल्द पहुंचाने पर भी जोर दिया गया है.
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क्या है GLOF
GLOF का मतलब ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड है. आसान भाषा में इसे ग्लेशियर की झील फटने से आने वाली अचानक बाढ़ कहा जा सकता है. दरअसल, हिमालय के ऊंचे इलाकों में ग्लेशियर पिघलने से पानी जमा होता है. इससे बड़ी झीलें बन सकती हैं.
इन झीलों को अक्सर बर्फ, चट्टान और मिट्टी से बने प्राकृतिक बांध रोककर रखते हैं. अगर यह बांध टूट जाए तो झील का पानी बहुत तेजी से नीचे की ओर बह सकता है. इससे रास्ते में आने वाले गांव, पुल, सड़कें और बिजली परियोजनाएं प्रभावित हो सकती हैं. कई बार ऐसी बाढ़ के लिए लोगों को तैयारी का बहुत कम समय मिलता है.
सरकार ने संवेदनशील ग्लेशियल झीलों की लगातार निगरानी करने को कहा है. इसका मकसद यह पता लगाना है कि किन झीलों का आकार बढ़ रहा है और कहां खतरा ज्यादा है. अधिकारियों को यह भी पता करना होगा कि किसी झील के फटने पर पानी किस रास्ते से नीचे आएगा. इसके लिए संभावित रास्तों की पहले से मैपिंग की जाएगी.
अगर इस रास्ते में कोई गांव, स्कूल, अस्पताल या सड़क आती है तो वहां पहले से निकासी की योजना बनाई जा सकेगी.
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समय पर चेतावनी सबसे जरूरी
बैठक में अर्ली वार्निंग सिस्टम को मजबूत करने पर खास जोर दिया गया. सरकार चाहती है कि खतरे की जानकारी सिर्फ अधिकारियों तक सीमित न रहे. सूचना गांवों में रहने वाले लोगों तक भी समय पर पहुंचनी चाहिए. इसके लिए स्थानीय प्रशासन, पुलिस, SDRF और ग्राम स्तर की टीमों के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है.
लोगों को पहले से यह जानकारी भी होनी चाहिए कि खतरा होने पर उन्हें कहां जाना है. इसके लिए समय-समय पर मॉक ड्रिल कराने की भी जरूरत बताई गई है.
GLOF के साथ हिमस्खलन (स्नों एवलांच) पर भी बैठक में बातचीत हुई थी. इस दौरान कहा गया कि हिमालय के ऊंचे इलाकों में भारी बर्फबारी के बाद अचानक बर्फ नीचे की ओर खिसक सकती है. इससे स्थानीय लोगों के साथ सेना, सुरक्षा बलों और पर्यटकों को भी खतरा रहता है। इसलिए हिमस्खलन वाले इलाकों की पहचान और निगरानी जरूरी है.
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बैठक में 2024 में मंजूर GLOF से बचाव की परियोजनाओं को तेजी से पूरा करने के निर्देश भी दिए गए. सरकार का जोर सिर्फ चेतावनी देने पर नहीं है. वह खतरे को पहले ही कम करने के इंतजाम भी करना चाहती है.
दरअसल, हिमालयी इलाकों में सड़क, पुल और दूसरी परियोजनाएं तेजी से बन रही हैं. ऐसे में विकास कार्यों के साथ आपदा के खतरे का भी ध्यान रखना जरूरी है. आपदा से बचाव में स्थानीय लोगों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो सकती है. उन्हें खतरे के संकेतों और सुरक्षित स्थानों की जानकारी होनी चाहिए. गांवों में स्वयंसेवकों की टीम बनाई जा सकती है. स्थानीय भाषा में चेतावनी की व्यवस्था भी मजबूत करनी होगी.
जितेंद्र बहादुर सिंह