दो मुल्क और 2 आजादी: हमने संविधान की शपथ ली, पाकिस्तान फौजी बूट पॉलिश करता रहा!

भारत-पाकिस्तान को आजादी तो एक साथ मिली, लेकिन इसके बाद के हमारे रास्ते एकदम दीगर रहे. हमने संविधान की शपथ ली, पाकिस्तानी फौजी बूटों को पॉलिश करने लगे. हम बिना झिझक जनमत का सम्मान कर सत्ता ट्रांसफर करते रहे, पाकिस्तान दमन पर आमदा रहा. नतीजा गृह युद्ध. 1971 में पाक का अंग भंग हो गया. जिन्ना की टू-नेशन थ्योरी ढाका की गलियों में सिसक रही थी.

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15 अगस्त 1947 के बाद भारत-पाकिस्तान का सफर असमान रहा है. (Photo: ITG) 15 अगस्त 1947 के बाद भारत-पाकिस्तान का सफर असमान रहा है. (Photo: ITG)

पन्ना लाल

  • नई दिल्ली,
  • 15 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 8:48 AM IST

14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान और 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुए. एक ही उपमहाद्वीप, एक ही इतिहास, भाषा और संस्कृति की एक ही विरासत. एक ब्रितानिया हुकूमत से निकले दो राष्ट्र. भारत सदियों पुरानी सभ्यता का उत्तराधिकारी था. ऋगवैदिक काल से लेकर मुगल साम्राज्य और ब्रिटिश राज तक की निरंतरता भारत की आत्मा में बहती चली आ रही थी.

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लेकिन पाकिस्तान एक नए राष्ट्र के रूप में जन्मा. उसकी बुनियाद दो कौमी नज़रिए पर रखी गई थी. यानी हिन्दू-मुस्लिम दो अलग कौम है ये दोनों साथ नहीं रह सकते. जिन्ना ने पाकिस्तानियों के जेहन में ये जहर इतने सलीके से भरा कि तबाह-बर्बाद पाक कौम इसे आजतक नहीं भूल पाई है. भले ही पूर्वी पाकिस्तान कटकर अलग हो गया. पाकिस्तान का मौजूदा आर्मी चीफ आसिम मुनीर आज भी इस तराने को गाता दिखता है. 

विभाजन की त्रासदी में लाखों जानें गईं, करोड़ों लोग विस्थापित हुए. फिर भी दोनों देशों ने आज़ादी की सुबह को अपनी-अपनी राह चुनकर देखा.  

उस ऐतिहासिक रात को जवाहरलाल नेहरू के शब्दों को जैसे पूरा देश ने सुना. 

'आधी रात के उस क्षण में, जब दुनिया सो रही होगी, भारत जीवन और स्वतंत्रता के लिए जाग उठेगा.'

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इतिहास की स्मृतियों में दर्ज ये वाक्य न केवल भारत की आज़ादी के उद्घोष बन गए, बल्कि दोनों देशों की अलग-अलग यात्राओं की शुरुआत के प्रतीक भी बने. 

लगभग अस्सी वर्षों बाद जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो दो स्पष्ट रूप से अलग कहानियां सामने आती हैं. 

भारत एक प्राचीन सभ्यता से निकला मॉर्डन रिपब्लिक बना, हमने क्रमिक विकास को चुना और धीरे-धीरे दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो गए. पाकिस्तान एक नए राष्ट्र के रूप में पैदा हुआ, लेकिन उसने अपनी राष्ट्रीय पहचान मजहब और कट्टरता के आस पास रखी. उसे लोकतांत्रिक संस्थाओं और सत्ता संतुलन के सवालों से लगातार जूझना पड़ा. लोकतंत्र का लबादा ओढ़े फौजी बूटें सिविलियन सरकारों को कुचलती रहीं.

यह कहानी किसी एक दिन या एक घटना की नहीं है. यह उन फैसलों की कहानी है, जो दोनों देशों ने आज़ादी के बाद लिए और उन रास्तों की भी जिन पर वे चलने से बचे. 

आजादी: एक साझा इतिहास का विभाजन

भारत का जेन-जी स्मार्टफोन की स्क्रीन पर जीता है. मीम्स, रील और करियर के सपने. इन्हीं रील्स में कभी नेहरू, झांकते हैं, तो कभी गांधी, कभी सुभाष उसका खून गरम कर जाते हैं तो कभी उसे चंद्रशेखर आजाद के आजादी वाले डायलॉग दिखाई देते हैं.

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देश की जवान पीढ़ी के लिए स्वतंत्रता चंद सेकेंड के रील में सिमट जाती है. यह जेन-जी उस दर्द का सीधा गवाह नहीं है. 

लेकिन 1947 में भारत और पाकिस्तान का जन्म केवल राजनीतिक विभाजन नहीं था. यह एक विशाल मानवीय त्रासदी भी थी. पंजाब और बंगाल के विभाजन ने करोड़ों लोगों को विस्थापित किया. हिंदू, मुस्लिम और सिख समुदायों के बीच हिंसा हुई. लाखों परिवार रातोरात अपने घर, जमीन और कारोबार छोड़ने को मजबूर हुए.

लेकिन विभाजन के बाद दोनों देशों ने अलग-अलग यात्राएं शुरू की.

भारत ने खुद को एक संप्रभु, लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष गणराज्य के रूप में विकसित करने का रास्ता चुना.

पाकिस्तान के सामने सबसे बड़ा सवाल था उसकी राष्ट्रीय पहचान का. क्या वह एक मुस्लिम बहुल आधुनिक राष्ट्र होगा, इस्लामी राज्य होगा या दोनों के बीच कोई रास्ता निकालेगा?

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यही सवाल आने वाले दशकों में पाकिस्तान की राजनीति को प्रभावित करता रहा. 

भारत ने 1950 में संविधान लागू किया और सभी को मतदान का अधिकार देकर डेमोक्रेसी के इतिहास में क्रांति सरीखा उदाहरण पेश कर दिया. 

दुनिया के कई पर्यवेक्षकों को यह प्रयोग जोखिम भरा लगता था. एक बेहद गरीब, विशाल और अशिक्षा से जूझ रहे देश में करोड़ों लोगों को वोट का अधिकार देना उस दौर में असाधारण कदम था. 

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टकले और घोर नस्लवादी ब्रिटिश नेता विंस्टन चर्चिल तो भारत को पहले ही खारिज कर चुका था. वो कहता था, "आजादी के बाद भारत में सत्ता दुष्टों, बदमाशों और लुटेरों के हाथों में चली जाएगी. इस देश के सभी नेता ओछी क्षमता वाले और भूसा किस्म के व्यक्ति होंगे. उनकी भाषा मीठी होगी लेकिन दिल बेवकूफियों से भरा होगा. वे सत्ता के लिए एक दूसरे से लड़ेंगे और इन राजनीतिक लड़ाइयों में भारत पूरी तरह से खत्म हो जाएगा."

लेकिन 'कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी' लिखने वाले अल्लामा इकबाल ही जानते थे कि हजारों साल पुराने इस मुल्क की बुनियाद में कौन सी मिट्टी डाली गई है. 

भारत का लोकतंत्र मामूली अवरोधों के साथ निर्बाध बढ़ता रहा. 

पाकिस्तान ने भी संविधान बनाने की कोशिश की, लेकिन वहां राजनीतिक संस्थाएं शुरुआती वर्षों में ही अस्थिर होने लगीं. 1958 में जनरल अयूब खान ने सत्ता संभाली और पाकिस्तान में सैन्य शासन का पहला बड़ा दौर शुरू हुआ.

यहीं से दोनों यात्राओं के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर दिखाई देने लगा. 

लोकतंत्र बनाम फौजतंत्र

कांग्रेस भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की स्वाभाविक उत्तराधिकारी थी. लिहाजा आजादी के बाद देश की राजनीति में कांग्रेस का प्रभुत्व रहा. जवाहरलाल नेहरू लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहे. आलोचक इसे सिंगल पार्टी सिस्टम का बोल बाला कहते हैं, लेकिन महत्वपूर्ण बात यह थी कि सत्ता बदलने की संवैधानिक व्यवस्था बनी रही.

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1952 में पहला आम चुनाव हुआ. करोड़ों भारतीयों ने पहली बार वोट डाला. भारत के लोगों के पास अपनी संसद थी, दिल्ली में बैठा अपनों में एक व्यक्ति था. चुनाव आयोग, न्यायपालिका और नौकरशाही जैसी संस्थाओं ने धीरे-धीरे अपनी जगह बनाई. 

हर जिले में अब अपनी कचहरी थी, जहां वे फरियाद कर सकते थे और इंसाफ पा सकते थे. अमूमन ये रास्ता पेचीदा था. लेकिन अंग्रेजों जैसा नहीं. अब माई-बाप वाला सिस्टम कहीं नहीं था. 

पाकिस्तान में इसके उलट राजनीतिक अस्थिरता बढ़ती गई. लोकतंत्र के साथ ट्रायल जारी रहा. 1956 में संविधान बना, लेकिन सिर्फ दो साल बाद उसे खत्म कर दिया गया.  सैन्य शासन ने राजनीति पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली. 

अयूब खान के बाद याह्या खान आए.  1970 में पाकिस्तान में आम चुनाव हुए. पूर्वी पाकिस्तान में शेख मुजीबुर रहमान की अवामी लीग को बहुमत मिला. 

जिन्ना की टू-नेशन थ्योरी ढाका की गलियों में सिसक रही थी

यहीं भारत और पाकिस्तान के लोकतंत्र का अंतर देखने को मिला. पाकिस्तान में सत्ता हस्तांतरण नहीं हुआ. राजनीतिक संकट गृहयुद्ध में बदला और 1971 में पाकिस्तान टूट गया.

बांग्लादेश का जन्म पाकिस्तान की राष्ट्रीय परियोजना के लिए सबसे बड़ा झटका था. जिन्ना की टू-नेशन थ्योरी ढाका की गलियों में सिसक रही थी. 

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जिस देश का निर्माण मुस्लिम बहुल क्षेत्रों को एक राजनीतिक इकाई में जोड़ने के नाम पर हुआ था, वह सिर्फ 24 साल बाद दो हिस्सों में बंट गया. 

भारत ने इसी दौरान एक और चुनौती का सामना किया 1962 का चीन युद्ध, 1965 और 1971 के पाकिस्तान के साथ युद्ध, खाद्य संकट और आर्थिक कठिनाइयां. लेकिन पंडित नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी ने राजनीतिक लचीलापन और नेतृत्व कौशल दिखाया. भारत की राजनीतिक व्यवस्था बनी रही.

1975 में भारत में इमरजेंसी जरूर लगी और नागरिक स्वतंत्रताओं पर गंभीर चोट पहुंची, लेकिन 1977 में चुनाव हुए में जनता ने कोर्स करेक्शन किया.

यह घटना भारतीय लोकतंत्र के लिए निर्णायक थी. इससे यह संदेश गया कि सरकार चुनाव हार सकती है और सत्ता शांतिपूर्वक हस्तांतरित हो सकती है. 

आर्थिक सफर: लाइसेंस राज से टॉप इकोनॉमी तक

आर्थिक मोर्चे पर भारत ने आजादी के बाद मिश्रित अर्थव्यवस्था अपनाई. भारी उद्योग, सार्वजनिक क्षेत्र सरकार के कंट्रोल में थे. रूस से प्रभावित होकर पंचवर्षीय योजनाएं लागू की गईं. 

लेकिन विकास के इस मॉडल में वो करंट नहीं था, जिसकी दरकार सदियों तक गुलाम रहे इस मुल्क को थी. दशकों तक भारत की अर्थव्यवस्था धीमी गति से बढ़ी. लाइसेंस-परमिट सिस्टम ने प्राइवेट सेक्टर पर कई कंट्रोल लगाएं. 

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अगर आप जेन-जी हैं या आपकी उम्र 30 साल से कम है तो आप अपने किसी बुजुर्ग से पूछिए, मोबाइल तो तब था नहीं, लेकिन लैंडलाइन फोन के लिए आपको सरकार से लाइसेंस लेना पड़ता था. सीमेंट, स्कूटर, छोटी कार खरीदने के लिए भी सरकार की परमिशन की जरूरत थी. 

शुरुआत में पाकिस्तान भारत से आगे था

पाकिस्तान ने शुरुआती वर्षों में औद्योगिक विकास के मामले में भारत से बेहतर प्रदर्शन किया. दरअसल आजादी मिलते ही पाकिस्तान अमेरिका और पश्चिमी देशों की गोद में बिछ गया था. 1950 और 1960 के दशक में उसे पश्चिमी देशों से आर्थिक और सैन्य सहायता मिली. अयूब खान के दौर में औद्योगिक विकास हुआ और पाकिस्तान को उस समय विकासशील दुनिया में एक उभरती अर्थव्यवस्था के रूप में देखा गया.

लेकिन उधार के इस मॉडल की सीमाएं थीं. पाकिस्तान में सामंती व्यव्यस्था भारत से भी ज्यादा जड़ें जमाए हुए थी. आर्थिक विकास का लाभ व्यापक सामाजिक ढांचे तक समान रूप से नहीं पहुंचा. वहां की जनता क्रांति तो नहीं कर सकी, लेकिन फौजी जनरलों ने सत्ता हथियाकर जनता को क्रांति के सपने खूब दिखाएं.

1991 का संकट और भारत के टर्न अराउंड की कहानी

भुगतान संतुलन के गंभीर संकट के बीच पी.वी.नरसिंह राव सरकार और वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत की. लाइसेंस राज कमजोर हुआ, विदेशी निवेश के लिए रास्ते खुले और निजी क्षेत्र की भूमिका बढ़ी.

इसके बाद भारतीय अर्थव्यवस्था का चरित्र बदलने लगा. आईटी, टेलीकॉम, ऑटोमोबाइल, फार्मा, वित्तीय सेवाओं और स्टार्टअप जैसे क्षेत्रों ने भारत को वैश्विक अर्थव्यवस्था से जोड़ दिया.

इससे विदेशी निवेश को बढ़ावा मिला, सूचना प्रौद्योगिकी, सेवा क्षेत्र और बाद में विनिर्माण को प्रोत्साहन मिला. आज भारत की जीडीपी लगभग 4 से 4.5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के आसपास है. 

यह दुनिया की चौथी या पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है.  क्रय शक्ति (PPP) के आधार पर हम दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था हैं. 

 प्रति व्यक्ति आय लगभग 2700-3000 डॉलर के आसपास है. हालांकि यूरोप और पश्चिम के मानकों पर बहुत पीछे हैं, लेकिन पाकिस्तान से बहुत आगे. महाराष्ट्र जैसा एक राज्य अकेले पाकिस्तान की पूरी अर्थव्यवस्था से बड़ा है. 

औसत वार्षिक विकास दर पिछले दो दशकों में 6-7 प्रतिशत के आसपास रही है.  डिजिटल भुगतान प्रणाली (UPI), स्टार्टअप इको सिस्टम और बुनियादी ढांचे में निवेश ने अर्थव्यवस्था को नई ऊर्जा दी है. विदेशी मुद्रा भंडार 600 अरब डॉलर से अधिक है.

पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था आज लगभग 370-410 अरब डॉलर के आसपास है. भारत की तुलना में लगभग दसवें हिस्से के बराबर. प्रति व्यक्ति आय लगभग 1500-1700 डॉलर है. विकास दर अक्सर 2-3 प्रतिशत के आसपास रही है. 

उसे कर्जे चुकाने के लिए बार-बार वर्ल्ड बैंक और IMF के पास जाना पड़ता है. 

इसका अर्थ यह नहीं कि पाकिस्तान के पास आर्थिक उपलब्धियां नहीं रहीं. कपड़ा उद्योग, कृषि, प्रवासी श्रमिकों से आने वाला पैसा और कुछ औद्योगिक क्षेत्र उसकी अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण आधार रहे हैं. लेकिन वह स्थायी और व्यापक आर्थिक विकास का ऐसा मॉडल नहीं बना सका, जो उसकी तेजी से बढ़ती आबादी को पर्याप्त अवसर दे सके. 

भारत का आत्मविश्वास, पाकिस्तान की पहचान का संकट

1971 के युद्ध में भारत की जीत और बांग्लादेश का निर्माण दक्षिण एशिया की शक्ति-समीकरण को बदल गया.

भारत ने खुद को क्षेत्रीय शक्ति के रूप में देखना शुरू किया. 1974 में भारत ने पोखरण में पहला परमाणु परीक्षण किया. 1998 में भारत ने दोबारा परमाणु परीक्षण किए और खुद को परमाणु शक्ति के रूप में स्थापित किया.

पाकिस्तान ने भी 1998 में परमाणु परीक्षण करके परमाणु संतुलन कायम किया.

भारत-पाकिस्तान के बीच कश्मीर विवाद बना रहा. 1947-48, 1965, 1971 और 1999 के करगिल संघर्ष ने दोनों देशों के रिश्तों को लगातार तनावपूर्ण बनाए रखा. 

मिडिल क्लास का उभार 

आजादी के बाद भारत ने शिक्षा,स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में धीरे-धीरे संस्थागत ढांचा बनाया. आईआईीटी, आईआईएम बने. जिसने क्रीम टैलेंट को आकर्षित किया और धार और रफ्तार दी.

 हरित क्रांति ने भारत को खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बनाया.  बाद में सार्वजनिक वितरण प्रणाली और ग्रामीण रोजगार, मनरेगा, पेंशन, कैश ट्रांसफर, आयुष्मान भारत, सूचना का अधिकार जैसी योजनाओं ने सामाजिक सुरक्षा के दायरे को बढ़ाया.

भारत का मध्यम वर्ग भी धीरे-धीरे बड़ा हुआ. उदारीकरण के बाद इसकी गति तेज हुई. 

अब भारत के पास अंग्रेजी बोलने वाला एक बड़ा वर्ग था. जिसकी महात्वाकांक्षाएं भारत की सीमाओं से परे थी. 

भारत शहरों का विस्तार हुआ. करोड़ों लोगों ने कृषि से बाहर निकलकर उद्योग, सेवा क्षेत्र और शहरी अर्थव्यवस्था में जगह बनाई.

पाकिस्तान में भी शहरीकरण और मध्यम वर्ग बढ़ा. कराची, लाहौर, इस्लामाबाद और रावलपिंडी जैसे शहर आर्थिक केंद्र बने. पाकिस्तान की प्रवासी आबादी ने अर्थव्यवस्था को महत्वपूर्ण विदेशी मुद्रा दी.

लेकिन शिक्षा, चिकित्सा और मानव विकास में दोनों देशों की चुनौतियां बनी रहीं. खासकर लड़कियों की शिक्षा, स्वास्थ्य, कुपोषण, रोजगार और जनसंख्या वृद्धि दोनों के लिए लंबे समय से समस्या रहे हैं. 

धर्म और राष्ट्रवाद की बदलती राजनीति

भारत के संविधान ने धर्म की स्वतंत्रता और सभी नागरिकों की समानता का अधिकार दिया है. बावजूद इसके भारतीय राजनीति में धर्म और पहचान का सवाल कभी खत्म नहीं हुआ.

1990 के दशक में राम जन्मभूमि आंदोलन ने भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी. इसके बाद भारतीय जनता पार्टी राष्ट्रीय राजनीति की केंद्रीय ताकतों में शामिल हो गई.

2014,  2019 के आम चुनावों में बीजेपी के नेतृत्व में नरेंद्र मोदी की सरकार को तगड़ा बहुमत मिला. 2024 में भी बीजेपी सहयोगियों के दम पर सत्ता में आई. 

इसके साथ ही भारतीय राजनीति में राष्ट्रवाद, हिंदुत्व, विकास और कल्याणकारी योजनाओं का नया मिश्रण सामने आया. राम मंदिर का निर्माण, अनुच्छेद-370 की समाप्ति इतिहास के अहम मोड़ रहे.

पाकिस्तान में धर्म का राजनीतिक इस्तेमाल उससे भी पहले शुरू हो चुका था. जिया-उल-हक के शासन ने इस्लामीकरण की प्रक्रिया को तेज किया. इसके बाद धर्म, राजनीति और सुरक्षा के बीच संबंध पाकिस्तान के सामाजिक जीवन में गहरे होते गए. 

तालिबान और अफगानिस्तान में सोवियत सेना के प्रवेश ने पाकिस्तान की सुरक्षा नीति और समाज पर भी गहरा प्रभाव डाला. इस घटना से पाकिस्तान में मुजाहिद्दीनों का उदय हुआ, जो बाद में पाकिस्तान के लिए जंजाल बन गए. कट्टरवाद और आतंकवाद ने पाकिस्तान को लंबे समय तक प्रभावित किया. आतंकवाद पाकिस्तान की स्टेट पॉलिसी बन गई. पाकिस्तान ने अमेरिका और अरब राष्ट्रों के सामने इसका इस्तेमाल खूब किया. 

कामयाबी और चुनौतियां

80 साल की यात्रा में भारत ने कई बड़ी उपलब्धियां हासिल कीं.  भारत एक गरीब उपनिवेश से निकलकर लोकतांत्रिक रूप से चुनी जाने वाली सरकारों वाला विशाल गणराज्य बना. ऐसा उदाहरण कही नहीं है. 

इंडिया की सीवी में आज परमाणु शक्ति, अंतरिक्ष शक्ति और बड़ी अर्थव्यवस्था का दर्जा है. हमने नक्सलवाद का सफाया किया. भाषा विवाद को खत्म किया. 

लेकिन कहानी पूरी तरह सफलता की नहीं है. हमारी असफलताएं हमारा मुंह चिढाती हैं. 

भारत की सबसे बड़ी चुनौती अब विकास की गति को समावेशी बनाना है.  दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने के बावजूद भारत के सामने रोजगार, क्वालिटी एजुकेशन, स्वास्थ्य सेवा, बेतहाशा माइग्रेशन कृषि संकट और क्षेत्रीय आर्थिक असमानता जैसी समस्याएं हैं. 

तेज शहरीकरण के साथ शहरों में आवास, प्रदूषण और बुनियादी ढांचे का दबाव बढ़ रहा है. भारत का तकरीबन हर शहर ट्रैफिक से चोक हुआ पड़ा है. मॉनसून की एक बारिश हमारे विकास के पाउडर को धो डालती है. 

भारत को अपनी विशाल युवा आबादी को प्रोडक्टिव रोजगार देना होगा. साथ ही लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता, सामाजिक सौहार्द और भारत को एक सूत्र में बांधे रखते हुए विविधता के बीच संतुलन बनाए रखना भी बड़ी चुनौती है. 

पाकिस्तान की बड़ी कामयाबी उसकी निरंतरता है. पाकिस्तान ने पहचान की राजनीति को हर पैरामीटर से ऊपर रखा. इसलिए उसके लिए डेमोक्रेसी, गरीबी, समावेशी विकास उतने बड़े मुद्दे नहीं रहे, जितना बड़ा मुद्दा उसका वजूद रहा. 

लेकिन पाकिस्तान दुनिया की हकीकतों को और अपनी जनता की आकांक्षाओं को लंबे समय तक नकार नहीं सकता.

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