एक ही प्रजाति... लेकिन दो बिल्कुल अलग तस्वीरें. पहली तस्वीर छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले के बावा मोहतरा गांव की है. यहां लोग एक मगरमच्छ को उसके असली नाम से नहीं, बल्कि गंगाराम कहकर पुकारते थे. गांव वालों के लिए वह कोई जानवर नहीं, बल्कि परिवार का सदस्य था.
दूसरी तस्वीर उत्तर प्रदेश के बहराइच की है. घाघरा नदी के किनारे 12 साल का सुनील अपने चाचा के साथ खेत गया था. शौच के लिए नदी किनारे पहुंचा ही था कि पानी में छिपे मगरमच्छ ने हमला कर दिया. देखते-देखते वह बच्चे को नदी में खींच ले गया. चाचा ने बचाने की कोशिश की, लेकिन सब कुछ कुछ ही सेकेंड में खत्म हो गया. बाद में उसका शव बरामद हुआ. इस घटना ने पूरे इलाके को दहला दिया. एक कहानी में आंसू हैं, दूसरी में चीखें. लेकिन दोनों के बीच एक ही जीव है- मगरमच्छ...
छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले के बावा मोहतरा गांव के बीचोंबीच एक तालाब है. इसी तालाब में वर्षों तक एक मगरमच्छ रहा. गांव वालों ने उसका नाम रखा- गंगाराम. ग्रामीणों के मुताबिक, गंगाराम करीब 130 साल तक उसी तालाब में रहा. इस दौरान गांव की कई पीढ़ियां बदल गईं. बच्चे बड़े होकर बूढ़े हो गए, लेकिन गंगाराम वहीं रहा.
महिलाएं उसी तालाब से पानी भरती थीं. किसान अपने मवेशियों को पानी पिलाने आते थे. बच्चे किनारे खेलते थे. मगरमच्छ भी वहीं रहता था, लेकिन गांव वालों का दावा है कि उसने कभी किसी इंसान पर हमला नहीं किया. धीरे-धीरे डर की जगह भरोसे ने ले ली. लोग उसे दूर से देखते, उसका जिक्र करते, लेकिन उसके साथ एक बैलेंस भी बनाए रखते. गंगाराम गांव की पहचान बन गया.
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साल 2019 में जब गंगाराम की मौत हुई तो गांव में वैसा ही माहौल था, जैसा किसी इंसान के चले जाने पर होता है. ग्रामीणों ने उसका अंतिम संस्कार किया. उस दिन कई घरों में चूल्हे नहीं जले. लोगों ने शोक मनाया. उसकी अंतिम विदाई की तस्वीरें देशभर में चर्चा का विषय बनीं.
अब यही कहानी नई पीढ़ी तक पहुंचने वाली है. NCERT ने अपने सिलेबस के 'My India! – A Bond Between Humans and Animals' टाइटल के तहत बावा मोहतरा और गंगाराम की कहानी को जगह दी है, ताकि बच्चे ये कहानी पढ़ सकें.
अब दूसरी कहानी जान लीजिए... जहां की तस्वीर से कांप गए लोग
अब दूसरी तस्वीर देखिए. उत्तर प्रदेश के बहराइच में घाघरा नदी के किनारे 12 साल का सुनील अपने चाचा के साथ खेत गया था. दोपहर का वक्त था. वह शौच के लिए नदी किनारे पहुंचा. तभी पानी में छिपे मगरमच्छ ने अचानक हमला कर दिया. चाचा दौड़े. बच्चे को पकड़ने की कोशिश की. लेकिन मगरमच्छ उसे नदी के भीतर खींच ले गया. बाद में वायरल हुए वीडियो में मगरमच्छ बच्चे को पानी में पटकता दिखाई दिया. देर शाम वन विभाग और पुलिस ने जाल डालकर शव बरामद किया.
इस घटना के बाद पूरे इलाके में दहशत फैल गई. लोगों ने नदी किनारे जाने से डरना शुरू कर दिया. जिस जीव को लोग पानी में देखते ही दूर हो जाते थे, उसने एक बार फिर याद दिला दिया कि वह जंगल और नदी का शिकारी है.
अब सवाल है कि क्या गंगाराम शांत स्वभाव वाला मगरमच्छ था? और क्या बहराइच वाला मगरमच्छ 'आदमखोर'? कुछ लोगों का कहना है कि बावा मोहतरा में वर्षों तक इंसानों और मगरमच्छ के बीच एक दूरी और बैलेंस बना रहा. ग्रामीण उसके रहने की जगह को जानते थे. वह भी तालाब के अपने दायरे में रहा. वहीं नदी का परिवेश अलग होता है.
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वहां मगरमच्छ शिकार करता है, अपना इलाका बचाता है और अवसर मिलने पर हमला भी कर सकता है. देश में कुछ जगहें ऐसी भी हैं, जहां लोग प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीना सीख गए हैं. बावा मोहतरा की कहानी उसी की मिसाल है. इसका मतलब यह नहीं कि मगरमच्छ पालतू जानवर है या उसके पास जाना सुरक्षित है. बल्कि प्रकृति को समझना, उसकी सीमाओं को ध्यान में रखना और उसके साथ बैलेंस बनाना संभव है.
एक मगरमच्छ, जिसकी मौत पर गांव रोया. दूसरा मगरमच्छ, जिसकी वजह से एक परिवार हमेशा के लिए बिखर गया. कुछ लोगों का ये भी कहना है कि जंगली जीव न हमारे दोस्त बनने की कोशिश करते हैं, न दुश्मन. वे सिर्फ अपना जीवन जीते हैं. फर्क इस बात से पड़ता है कि इंसान उनके साथ कैसा रिश्ता बनाता है और उनकी दुनिया में कितनी समझदारी से कदम रखता है.
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