चुनाव आयोग पर उठ रहे सवालों पर क्या बोले पूर्व CEC ओम प्रकाश रावत और पूर्व EC अशोक लवासा

इंडिया टुडे कॉन्क्लेव साउथ 2026 में चुनाव आयोग की विश्वसनीयता और SIR को लेकर अहम चर्चा हुई. पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओम प्रकाश रावत और पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने कई मुद्दों पर बेबाक राय रखी.

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 इंडिया टुडे कॉन्क्लेव साउथ 2026 (Photo-ITG) इंडिया टुडे कॉन्क्लेव साउथ 2026 (Photo-ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली ,
  • 29 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 5:47 PM IST

इंडिया टुडे कॉन्क्लेव साउथ 2026 में चुनाव आयोग की विश्वसनीयता और मौजूदा विवादों को लेकर पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओम प्रकाश रावत और पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने अपने विचार रखे. दोनों से जब पूछा गया कि क्या उन्हें मौजूदा चुनाव आयोग पर भरोसा है, तो रावत ने मौजूदा विवाद पर अंतिम निष्कर्ष निकालने से पहले इंतजार करने की बात कही, जबकि लवासा ने कहा कि इस समय चुनाव आयोग को लेकर भरोसे की कमी का माहौल है.

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ओम प्रकाश रावत ने कहा कि चुनाव आयोग ने पिछले 75 से अधिक वर्षों में स्वतंत्र, निष्पक्ष और विश्वसनीय चुनाव कराने के मामले में एक मानक स्थापित किया है. हालांकि, मौजूदा विवाद को देखते हुए उन्हें लगता है कि स्थिति पहले जैसी नहीं है. उन्होंने कहा कि संवैधानिक संस्थाओं के जीवन में विवाद आते-जाते रहते हैं. इसलिए जब मामला अभी चल रहा हो और स्थिति स्पष्ट न हुई हो, तब बीच में ही कोई अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा. उनके मुताबिक, कुछ समय इंतजार करने के बाद ही पूरी स्थिति पर निष्कर्ष निकालना चाहिए.

रावत ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता भारतीय लोकतंत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. अगर लोगों का चुनाव आयोग पर भरोसा कमजोर होता है तो इसका असर लोकतांत्रिक व्यवस्था पर पड़ सकता है. इसलिए आयोग को उठ रहे सवालों का समाधान करना जरूरी है. रावत से जब पूछा गया कि मौजूदा विवाद से बाहर निकलने का रास्ता क्या हो सकता है, तो उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग को खुले तौर पर सवालों का जवाब देना चाहिए.

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उनके मुताबिक, केवल प्रेस नोट जारी करना पर्याप्त नहीं है. आयोग के सदस्यों को मीडिया के सामने आकर सवालों के जवाब देने चाहिए, ताकि लोगों के सामने पूरी स्थिति स्पष्ट हो सके. उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग केवल तीन चुनाव आयुक्तों तक सीमित संस्था नहीं है. चुनाव कराने में बड़ी संख्या में फील्ड कर्मचारी भी काम करते हैं. अपने अनुभव का जिक्र करते हुए रावत ने बताया कि चुनाव ड्यूटी में लगे कर्मचारियों ने कई बार बाहरी दबाव के बावजूद अपनी जिम्मेदारी निभाई है.

उन्होंने बिहार में अपने चुनावी अनुभव का उदाहरण भी दिया. रावत ने बताया कि एक जिले में उन्होंने विधानसभा क्षेत्रों का दौरा कर मतदाता सूची से नाम हटाए जाने की प्रक्रिया को देखा था. उनके अनुसार, जिन क्षेत्रों में अधिकारियों ने मतदाताओं की मदद के लिए शिविर लगाए, वहां नाम हटने का प्रतिशत कम रहा, जबकि जिन क्षेत्रों में ऐसे शिविर नहीं लगाए गए, वहां यह आंकड़ा ज्यादा था.

अशोक लवासा बोले- 'भरोसे की कमी का माहौल है'

पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने चुनाव आयोग पर भरोसे के सवाल पर कहा कि उन्हें दुख है कि ऐसी परिस्थितियां पैदा हुईं जिनमें इस तरह का सवाल पूछा जा रहा है. उन्होंने कहा कि इस समय चुनाव आयोग को लेकर भरोसे की कमी का माहौल है और उनके अनुसार आयोग के कुछ कदमों ने इस धारणा को मजबूत किया है.

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हालांकि, लवासा ने यह भी स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग को केवल तीन चुनाव आयुक्तों से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए. उनके मुताबिक, चुनाव आयोग पिछले 75 वर्षों में एक संस्थान के रूप में मजबूत हुआ है और कुछ व्यक्तियों के फैसलों के कारण पूरी संस्था को खारिज नहीं किया जा सकता. उन्होंने कहा कि भारत जैसे चुनावी लोकतंत्र में चुनाव आयोग की महत्वपूर्ण संवैधानिक भूमिका है. स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए एक निष्पक्ष संस्था जरूरी है.

'SIR की प्रक्रिया में मतदाता पर डाल दिया गया जिम्मेदारी का बोझ'

अशोक लवासा ने SIR की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि उनकी नजर में SIR की मौजूदा प्रक्रिया की अवधारणा में ही समस्या है. लवासा के अनुसार, पिछले 75 वर्षों से मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया में चुनाव आयोग और उसकी फील्ड मशीनरी की जिम्मेदारी रही है कि पात्र लोगों को मतदाता सूची में शामिल किया जाए. लेकिन SIR में उन्हें लगता है कि पात्रता साबित करने की जिम्मेदारी मतदाता पर अधिक डाल दी गई है.

उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 326 में मतदाता बनने के लिए मूल रूप से नागरिकता, 18 वर्ष या उससे अधिक उम्र और कानून के तहत अयोग्य न होने जैसी शर्तें निर्धारित हैं. ऐसे में यह सवाल उठता है कि मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया में अतिरिक्त दस्तावेज और प्रक्रियाओं की जरूरत किस तरह तय की जा रही है.

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Form 6 में बदलाव को लेकर भी सवाल

लवासा ने चर्चा के दौरान Form 6 में किए गए बदलावों का मुद्दा भी उठाया. उन्होंने सवाल किया कि इन बदलावों का फैसला किस स्तर पर लिया गया और क्या इसके लिए जरूरी मंजूरी ली गई थी. उन्होंने कहा कि मौजूदा विवाद की जड़ में कई ऐसे सवाल हैं जिनका स्पष्ट जवाब सामने आना जरूरी है. उनके अनुसार, चुनाव आयोग को यह बताना चाहिए कि प्रक्रिया में बदलाव कैसे किए गए और उनसे जुड़े फैसले किसने लिए.

हाल में सामने आए विवाद में चुनाव आयोग के भीतर SIR से जुड़े फैसलों और प्रक्रियाओं पर मतभेद की खबरें भी सामने आई हैं. मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, चुनाव आयुक्तों ने कुछ फैसलों पर आपत्तियां दर्ज की थीं.

रावत ने कहा- 1.5 करोड़ से ज्यादा कर्मचारी चुनाव प्रक्रिया का हिस्सा

रावत ने चुनाव आयोग की फील्ड मशीनरी का बचाव करते हुए कहा कि चुनाव कराने की पूरी प्रक्रिया में बड़ी संख्या में कर्मचारी शामिल होते हैं. उनके मुताबिक, करीब डेढ़ करोड़ से अधिक लोग अलग-अलग स्तर पर चुनाव प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं. उन्होंने कहा कि कुछ व्यक्तियों पर सवाल उठने का मतलब यह नहीं है कि पूरी चुनाव मशीनरी पर सवाल खड़ा कर दिया जाए. उनके मुताबिक, फील्ड स्तर पर काम करने वाले कर्मचारियों की भूमिका भी चुनाव आयोग की विश्वसनीयता बनाए रखने में महत्वपूर्ण है.

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'पूरे तथ्य सार्वजनिक करे चुनाव आयोग'

दोनों पूर्व चुनाव आयुक्तों की बातचीत में एक बात पर खास जोर रहा- मौजूदा विवाद का समाधान पारदर्शिता से होना चाहिए. रावत ने कहा कि चुनाव आयोग को सामने आकर सवालों का जवाब देना चाहिए, जबकि लवासा ने पूरी जानकारी सार्वजनिक करने की जरूरत बताई. लवासा के मुताबिक, अगर आयोग से जुड़ी प्रक्रियाओं और फैसलों पर सवाल उठ रहे हैं तो लोगों के सामने तथ्य रखने से स्थिति स्पष्ट हो सकती है.

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