जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़ी जांच समिति की रिपोर्ट बुधवार को संसद के दोनों सदनों में पेश कर दी गई. यह वही मामला है जिसमें जस्टिस वर्मा के सरकारी घर से बड़ी मात्रा में नकदी मिलने के आरोप लगे थे और उनके खिलाफ हटाने की प्रक्रिया शुरू की गई थी. राज्यसभा और लोकसभा के महासचिवों ने यह रिपोर्ट अपने-अपने सदन में रखी. रिपोर्ट दो खंडों में है और इसके साथ जांच के दौरान दर्ज किए गए मौखिक और दस्तावेजी सबूत भी शामिल हैं. तीन सदस्यीय जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट मई महीने में ही लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को सौंप दी थी.
यह पूरा विवाद 14 मार्च 2025 की रात शुरू हुआ था, जब जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास में आग लग गई थी. आग बुझाने पहुंचे दमकलकर्मियों को स्टोररूम में जली हुई भारी मात्रा में नकदी मिलने की बात सामने आई थी.
इसके बाद जस्टिस वर्मा ने इस्तीफा दे दिया, जिसके चलते उन्हें हटाने की प्रक्रिया लगभग बेमानी हो गई है. हालांकि कानून मंत्रालय ने अब तक उनका इस्तीफा अधिसूचित नहीं किया है. जस्टिस वर्मा दिल्ली हाईकोर्ट के जज थे और विवाद के बाद उन्हें वापस उनके मूल हाईकोर्ट यानी इलाहाबाद हाईकोर्ट भेज दिया गया था.
तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना की बनाई अंदरूनी समिति ने अपनी जांच में पाया था कि जिस स्टोररूम में नकदी छिपी मिली, उस पर जस्टिस वर्मा का सीधा या परोक्ष नियंत्रण था. जुलाई 2025 में 200 से अधिक सांसदों ने जज को हटाने के प्रस्ताव पर दस्तखत किए थे. इसके बाद पिछले साल अगस्त में बिरला ने तीन सदस्यीय जज जांच समिति बनाई थी.
इस पूरी प्रक्रिया की जानकारी रखने वाले लोगों ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए बताया कि जब कोई जज राष्ट्रपति को इस्तीफा भेजकर उसकी प्रति सार्वजनिक कर देता है, तो उसे इस्तीफा दिया हुआ ही माना जाता है. जज का इस्तीफा राष्ट्रपति की मंजूरी पर निर्भर नहीं होता. तय प्रक्रिया के मुताबिक राष्ट्रपति औपचारिक मंजूरी देते हैं, जिसके बाद कानून मंत्रालय का न्याय विभाग इसे अधिसूचित करता है.
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