भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत ने सोमवार को NHRC के स्थापना दिवस समारोह में हिस्सा लिया. उन्होंने मानवाधिकारों के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि जो अधिकार ताकतवर लोगों के नाम आते हैं, लेकिन कमजोरों के लिए बेकार साबित होते हैं, वह असल में अधिकार नहीं बल्कि बेहतर ब्रांडिंग वाला विशेषाधिकार है.
उन्होंने कहा कि मानवाधिकार संस्थाओं की असली ताकत उनके आदेशों को जबरदस्ती लागू कराने की क्षमता में नहीं, बल्कि उनकी विश्वसनीयता में होती है. उन्होंने कहा कि यह विश्वसनीयता धीरे-धीरे बनती है, लेकिन तेजी से खत्म हो सकती है. हर निष्पक्ष जांच, समय पर हस्तक्षेप और ईमानदार रिपोर्ट से संस्थाओं का नैतिक अधिकार मजबूत होता है.
CJI ने यह भी बताया कि कोर्ट को कब हस्तक्षेप करना चाहिए. उन्होंने कहा कि संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन होने पर अदालतों को हस्तक्षेप करना चाहिए. मानवाधिकार आयोगों को शिकायतों की जांच करने, व्यवस्था की कमियों की पहचान करने और उन मुद्दों पर संस्थागत ध्यान सुनिश्चित करने की जरूरत है, जिन्हें बाद में नजरअंदाज किया जा सकता है.
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मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि मानवाधिकार संस्थाओं को सिर्फ उनके द्वारा सुलझाए गए मामलों की संख्या से नहीं आंकना चाहिए. CJI के मुताबिक, आयोग का महत्व उन मुद्दों को सामने लाने और उन लोगों को न्याय दिलाने में है जिनकी आवास अक्सर अनसुनी कर दी जाती है.
उन्होंने संविधान में दिए गए अधिकारों का जिक्र करते हुए कहा कि संविधान हर नागरिक की गरिमा, समानता, स्वतंत्रता और न्याय का वादा करता है. उन्होंने कहा कि प्रस्तावना में लिखे गए सबसे बेहरतरीन हैं और इनका पालन होना चाहिए.
उन्होंने यह भी कहा कि सिविल सोसाइटी जमीनी हकीकत सामने लाने में खास भूमिका निभाती है, जबकि अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं वैज्ञानिक ज्ञान, अनुभव और सहयोग के जरिए मानवाधिकारों की रक्षा के प्रयासों को मजबूत कर सकती है.
अनीषा माथुर