महाराष्ट्र में जबरन, धोखाधड़ी, लालच या शादी के झांसे से कराए जाने वाले धर्मांतरण पर रोक लगाने के लिए नया कानून लागू हो गया है. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मंजूरी मिलने के बाद राज्य सरकार ने 'महाराष्ट्र धर्म की स्वतंत्रता अधिनियम, 2026' को ऑफिशियल गैजेट में प्रकाशित कर दिया है.
महाराष्ट्र विधानमंडल के दोनों सदनों ने इस साल मार्च में बजट सत्र के दौरान 'महाराष्ट्र धर्म की स्वतंत्रता विधेयक, 2026' पारित किया था. राष्ट्रपति की सहमति मिलने के बाद 30 जुलाई को इसे राज्य के राजपत्र में नोटिफाई कर दिया गया. इसके साथ ही अब राज्य में ये कानून प्रभावी हो गया है.
नए कानून के प्रावधानों के मुताबिक, अगर कोई व्यक्ति अपनी मर्जी से दूसरा धर्म अपनाना चाहता है, तो उसे धर्मांतरण से कम से कम 60 दिन पहले जिला मजिस्ट्रेट को लिखित सूचना देनी होगी. इसके साथ ही धर्मांतरण के बाद की तय प्रक्रियाओं का पालन करना भी अनिवार्य किया गया है.
दोषी पाए जाने पर 10 साल तक की सजा का प्रावधान
अधिनियम के तहत बल, दबाव, धोखाधड़ी, अनुचित प्रभाव, प्रलोभन, गलत बयानी या शादी से जुड़े धोखे के जरिए कराए गए धर्म परिवर्तन को दंडनीय अपराध बनाया गया है. इसके तहत पहली बार अपराध करने पर आरोपी को 7 साल तक की जेल हो सकती है. दोबारा अपराध करने पर सजा को बढ़ाकर 10 साल तक किया जा सकता है.
कानून में ये भी कहा गया है कि पीड़ित व्यक्ति के अलावा उसके माता-पिता, भाई-बहन या करीबी रिश्तेदार भी पुलिस में शिकायत दर्ज करा सकते हैं.
स्वैच्छिक विवाह या धर्म परिवर्तन पर रोक नहीं
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने पहले बताया था कि इस कानून का असल मकसद जबरन और धोखाधड़ी से होने वाले धर्मांतरण पर लगाम लगाना है. राज्य सरकार ने दोहराया है कि ये कानून अपनी मर्जी से किए जाने वाले धर्म परिवर्तन या अंतरधार्मिक विवाहों के खिलाफ नहीं है.
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इस कानून के लागू होने के साथ ही महाराष्ट्र अब उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और हिमाचल प्रदेश जैसे उन राज्यों की लिस्ट में शामिल हो गया है, जहां धर्मांतरण विरोधी कानून पहले से लागू हैं.
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