'भारत-PAK के बीच शांति की इच्छा जताना देशद्रोह नहीं', हिमाचल हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

न्यायमूर्ति राकेश कैंथला की पीठ ने फेसबुक पर प्रतिबंधित हथियारों और पाकिस्तानी झंडे की तस्वीरें अपलोड करने के आरोपी अभिषेक सिंह भारद्वाज को जमानत देते हुए यह टिप्पणी की.

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कोर्ट ने कहा कि सरकार के प्रति असंतोष या विद्रोह की मंशा का कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया है. (Photo- Representational) कोर्ट ने कहा कि सरकार के प्रति असंतोष या विद्रोह की मंशा का कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया है. (Photo- Representational)

अमन भारद्वाज

  • शिमला,
  • 06 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 9:30 PM IST

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया है कि भारत और पाकिस्तान के बीच दुश्मनी खत्म करने और शांति की इच्छा प्रकट करना देशद्रोह के दायरे में नहीं आता है. न्यायमूर्ति राकेश कैंथला की पीठ ने फेसबुक पर प्रतिबंधित हथियारों और पाकिस्तानी झंडे की तस्वीरें अपलोड करने के आरोपी अभिषेक सिंह भारद्वाज को जमानत देते हुए यह टिप्पणी की.

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दरअसल, अभिषेक सिंह भारद्वाज को एक मुखबिर की सूचना के आधार पर गिरफ्तार किया गया था. आरोप था कि उसने अपने फेसबुक अकाउंट पर पाकिस्तानी झंडे और प्रतिबंधित हथियारों के फोटो-वीडियो साझा किए थे. साथ ही उस पर एक पाकिस्तानी नागरिक से संपर्क करने, 'ऑपरेशन सिंदूर' की आलोचना करने और खालिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाने का भी आरोप था. हालांकि, गिरफ्तारी के दौरान उसके पास से कोई आपत्तिजनक वस्तु बरामद नहीं हुई थी.

अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणियां

अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में मौजूद पेन ड्राइव के अवलोकन से प्रथम दृष्टया यह सामने आता है कि आरोपी ने भारत-पाक के बीच जारी तनाव की आलोचना की और यह राय रखी कि युद्ध से कोई लाभ नहीं होता. उसने सभी धर्मों के लोगों को मिल-जुलकर रहने की बात कही. जस्टिस कैंथला ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि शांति की कामना और युद्ध के विरोध को देशद्रोह नहीं ठहराया जा सकता.

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कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकार के प्रति असंतोष या विद्रोह की मंशा का कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया है. वहीं ‘खालिस्तान जिंदाबाद’ का नारा पोस्ट करने के आरोप पर अदालत ने कहा कि केवल नारा पोस्ट करना, जब तक उससे असंतोष या विद्रोह की भावना साबित न हो, अपने-आप में अपराध नहीं माना जा सकता.

जमानत देते हुए अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि जमानत के प्रावधानों का इस्तेमाल किसी व्यक्ति को दोष सिद्ध होने से पहले सजा देने के लिए नहीं किया जा सकता.

जमानत की सख्त शर्तें

हालांकि अदालत ने आरोपी पर सख्त शर्तें भी लगाई हैं. जमानत की शर्तों के तहत आरोपी गवाहों को डराने या सबूतों से छेड़छाड़ नहीं करेगा, हर सुनवाई में उपस्थित रहेगा और बिना कारण अदालत से तारीख नहीं मांगेगा. वह सात दिनों से अधिक समय तक अपना पता बदले बिना कोर्ट और पुलिस को सूचना दिए नहीं जा सकेगा. उसे पासपोर्ट, यदि है, तो जमा करना होगा और अपना मोबाइल नंबर व सोशल मीडिया विवरण पुलिस व अदालत को देना होगा. किसी भी बदलाव की सूचना पांच दिन के भीतर देना अनिवार्य होगा.

अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि जमानत की किसी भी शर्त का उल्लंघन किया गया, तो अभियोजन पक्ष जमानत रद्द कराने की अर्जी दे सकता है.

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