कैनवास पर भगवान श्रीकृष्ण का मनमोहक स्वरूप है. हाथ में बांसुरी है. पास में जन्माष्टमी से जुड़ी मटकी है. इस पेंटिंग को बनाने वाले कलाकार का नाम है खुंभिया फकरुद्दीन अलीभाई, जिन्हें लोग प्यार से के.एफ. अली कहते हैं. फकरुद्दीन अलीभाई करीब 40 साल से चित्रकला की साधना कर रहे हैं. भगवान कृष्ण से जुड़ी यह पेंटिंग उन्होंने जन्माष्टमी के मौके पर तैयार की है. इसे बनाने में उन्हें करीब 8 से 10 दिन लगे. अब उनकी इच्छा है कि इस कलाकृति को संत और प्रसिद्ध कथाकार मोरारी बापू को भेंट करें और उनका आशीर्वाद लें.
फकरुद्दीन अलीभाई का भगवान कृष्ण से यह रिश्ता अचानक नहीं बना. इसके पीछे द्वारका की गलियां, वहां बिताए साल और उन दिनों की यादें हैं. वह लंबे समय तक द्वारका में रहे हैं. द्वारकाधीश और द्वारका नगरी उनके लिए जीवन का एक बेहद अहम हिस्सा है.
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फकरुद्दीन बताते हैं कि द्वारका में उन्होंने अपनी जिंदगी के कई यादगार दिन बिताए हैं. इसी दौरान भगवान श्रीकृष्ण और द्वारकाधीश के प्रति उनके मन में एक अलग तरह का लगाव पैदा हुआ. और फिर यही लगाव धीरे-धीरे उनकी कला में उतरने लगा. वह बताते हैं कि काफी समय से हर जन्माष्टमी पर श्रीकृष्ण के जीवन से जुड़ी कोई न कोई पेंटिंग बनाने की कोशिश करते हैं. इस बार भी जन्माष्टमी आई तो उनके मन में एक अलग तस्वीर बनने लगी. एक ऐसी तस्वीर, जिसमें भगवान और भक्त के बीच का रिश्ता दिखाई दे.
फकरुद्दीन अलीभाई ने ऑयल कलर उठाए और कैनवास पर काम शुरू किया. करीब 8 से 10 दिनों तक रंगों और ब्रश के साथ उनकी मेहनत चलती रही. धीरे-धीरे कैनवास पर भगवान श्रीकृष्ण का स्वरूप उभरने लगा. हाथ में बांसुरी, चेहरे पर मनमोहक भाव और साथ में जन्माष्टमी की पहचान बनी मटकी. इस पेंटिंग में एक ऐसी कल्पना भी है, जो इसे और खास बना देती है. फकरुद्दीन ने मटकी की डोरी को किसी दीवार या छत से नहीं जोड़ा. उनकी कल्पना में यह डोरी भगवान श्रीकृष्ण के आंचल यानी उनके दिल से जुड़ी हुई है.
उनके लिए यह सिर्फ एक कलात्मक प्रयोग नहीं है. वह इसे भक्त और भगवान के बीच के उस रिश्ते की तरह देखते हैं, जो दिखाई नहीं देता, लेकिन महसूस किया जा सकता है. उनका मानना है कि जन्माष्टमी के दिन जब भक्त मंदिर में भगवान के दर्शन के लिए पहुंचते हैं और सच्चे मन से प्रार्थना करते हैं, तो भक्त और भगवान के बीच एक सीधा भावनात्मक रिश्ता बन जाता है. यही रिश्ता उन्होंने रंगों के जरिए कैनवास पर उतारने की कोशिश की है.
40 साल से रंगों के साथ सफर
फकरुद्दीन अलीभाई की यह पेंटिंग एक-दो दिन की कला नहीं है. इसके पीछे करीब चार दशक की मेहनत है. बचपन से ही उन्हें चित्र बनाने का शौक था. वक्त के साथ यही शौक उनकी जिंदगी का हिस्सा बन गया. ब्रश और रंग उनके साथी बनते गए और करीब 40 साल उन्होंने चित्रकला को दिए.
कभी किसी चेहरे को कैनवास पर उतारा, कभी किसी जगह की खूबसूरती को रंगों में बांधा और कभी अपनी भावनाओं को पेंटिंग का रूप दिया. वहीं भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी उनकी पेंटिंग में एक अलग भाव दिखाई देता है.
जिस तरह एक रंग दूसरे रंग से मिलकर नई तस्वीर बनाता है, उसी तरह इंसानियत, प्रेम और श्रद्धा भी लोगों को जोड़ सकती है. फकरुद्दीन की पेंटिंग सिर्फ जन्माष्टमी की एक कलाकृति नहीं है. इसमें द्वारका के साथ उनका रिश्ता है, करीब 40 साल की कला-साधना है और कृष्ण के प्रति उनकी भावनाएं हैं. और शायद इसीलिए यह पेंटिंग देखने वाले को सिर्फ भगवान कृष्ण का स्वरूप नहीं दिखाती, बल्कि उस कलाकार का दिल भी दिखाती है, जिसने उन्हें कैनवास पर उतारा है.
पेंटिंग तैयार हो चुकी है. अब फकरुद्दीन अलीभाई की इच्छा है कि इसे वह परम पूज्य संत और प्रसिद्ध कथाकार मोरारी बापू को भेंट करें. वह इस पेंटिंग को उनके लिए खास तौर पर तैयार की गई भेंट मानते हैं. उनका कहना है कि वह इसे मोरारी बापू को देना चाहते हैं और उनका आशीर्वाद प्राप्त करना चाहते हैं.
दर्शन ठक्कर