AISA अध्यक्ष नेहा बोरा की याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट में सुनवाई चल रही है. नेहा ने स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की तरफ से जारी उस नोटिस को चुनौती दी है, जिसमें उन्हें शांति बनाए रखने के लिए 10,000 रुपये का निजी मुचलका और एक जमानतदार देने का निर्देश दिया गया है. नेहा बोरा के वकील ने अदालत में कहा कि इस मामले का दायरा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 126 और 130 के तहत जारी नोटिस तक सीमित है. उन्होंने बताया कि बोरा सार्वजनिक जीवन में सक्रिय AISA की नेता हैं.
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- कोर्ट ने BNSS की धारा 135(3) के पहले प्रावधान के तहत इस चरण में मुचलका भरने की जरूरत पर सवाल उठाया. बेंच ने राज्य सरकार से पूछा कि क्या धारा 126 के तहत सिर्फ नारे लगाने की जानकारी के आधार पर, बिना किसी जांच के कारण बताओ नोटिस जारी किया जा सकता है. कोर्ट ने यह भी पूछा कि कलंदर के अलावा क्या कोई अन्य सामग्री देखी गई या धारा 130 के तहत नोटिस जारी करने से पहले कोई जांच की गई थी. बेंच ने उदाहरण देते हुए कहा कि अगर मीडिया रिपोर्ट्स से पता चलता है कि संबंधित व्यक्ति घटना के वक्त कहीं और था, तो क्या मजिस्ट्रेट को कार्रवाई से पहले मिली जानकारी की विश्वसनीयता की स्वतंत्र रूप से जांच नहीं करनी चाहिए. कोर्ट ने राज्य सरकार से आगे की दलीलें देने से पहले इन दोनों कानूनी और तथ्यात्मक सवालों पर जवाब देने को कहा.
- नेहा बोरा के मामले में गोपाल शंकरनारायणन ने संविधान पीठ के एक फैसले का हवाला देते हुए दलील दी कि BNSS की धारा 126 के तहत कार्रवाई का आधार बनी जानकारी की जांच संबंधित पूछताछ के दौरान की जानी चाहिए. उन्होंने कहा कि BNSS की धारा 126 और 130 समेत हर चरण में कारणों को लिखित रूप में दर्ज करना जरूरी है. गोपाल शंकरनारायणन ने CrPC, 1898 की धारा 107 का भी जिक्र किया. उन्होंने दलील दी कि कारण बताओ नोटिस जारी करने के चरण में ही मुचलका भरने की मांग करने का कोई सवाल नहीं उठता.
- कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट ने अपने विवेक से संतुष्टि बनाई या नहीं, इसकी जांच करने की अदालत की शक्ति बहुत सीमित है. इस पर नेहा बोरा के वकील गोपाल शंकरनारायणन ने दलील दी कि नोटिस असंवैधानिक है और कानूनी रूप से भी गलत है. कोर्ट ने पूछा कि क्या उनकी तीसरी दलील यह है कि स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) ने स्वतंत्र रूप से कोई राय नहीं बनाई. इस पर गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि SEM ने कोई राय बनाई ही नहीं थी.
- कोर्ट ने कहा कि वह याचिकाकर्ता के पक्ष में यह सवाल पूछ रहा है और मामले की परिस्थितियों में संबंधित प्रावधान की व्याख्या जानना चाहता है. सुनवाई के दौरान बेंच ने कहा, "जैसा कि मैंने कल अभिक से कहा था, क्या आपके लिए बेहतर नहीं होगा कि धारा 135 के तहत जांच पूरी होने दें?" कोर्ट ने आगे कहा कि क्या ज्यादा समझदारी इसी में नहीं होगी कि जांच पूरी होने तक इंतजार किया जाए और फिर शनिवार को अदालत का रुख किया जाए, ताकि उसे रविवार को सुनवाई के लिए परेशान न करना पड़े.
- गोपाल शंकरनारायणन ने दलील दी कि हिरासत में लिए जाने के बाद सबसे पहली सुरक्षा यह है कि व्यक्ति को तुरंत अपने वकील या परिवार से संपर्क करने का अधिकार मिले. उन्होंने बताया कि नेहा बोरा के मामले में अगले दिन स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) के सामने कलंदरा पेश किया गया.
- गोपाल शंकरनारायणन ने दलील दी कि नेहा बोरा 16 अक्टूबर को प्रदर्शन में शामिल होने के लिए मंडी हाउस इलाके में पहुंची थीं, लेकिन महज 10-15 मिनट बाद ही उन्हें हिरासत में ले लिया गया. उन्होंने कहा कि बोरा ने कोई अपराध नहीं किया था और उन्हें सिर्फ नारे लगाने के लिए हिरासत में लिया गया, जो पूरी तरह गैरकानूनी है.
- वकील ने यह भी कहा कि कनॉट प्लेस में प्रदर्शन किसी दूसरे संगठन ने आयोजित किया था, जबकि नेहा बोरा ने मंडी हाउस में जुटने की अपील की थी. उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदर्शनों के दौरान लोगों को हिरासत में लेना और उन्हें अपने वकीलों से संपर्क नहीं करने देना एक चलन बन गया है. शंकरनारायणन के मुताबिक, बोरा को रात में आरके पुरम पुलिस स्टेशन ले जाया गया और सुबह तड़के तक उनके ठिकाने की जानकारी नहीं थी.
- सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने दिल्ली हाई कोर्ट में दलीलें रखते हुए नक्शे पर जंतर-मंतर की जगह दिखाई. उन्होंने बताया कि 15 अक्टूबर को प्रेस क्लब में प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई थी. इसके बाद 16 अक्टूबर को शाम 4 बजे जंतर-मंतर को अचानक प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाए जाने के फैसले के विरोध में एक पोस्ट डाली गई थी.
- गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि उस पोस्ट में मंडी हाउस में बैठक करने की अपील की गई थी, लेकिन उसमें कहीं भी हिंसा करने, कानून तोड़ने, शांति भंग करने या सार्वजनिक व्यवस्था बिगाड़ने की बात नहीं कही गई थी. उन्होंने दलील दी कि पोस्ट में लोगों को किसी अपराध को अंजाम देने के लिए इकट्ठा होने का न्योता भी नहीं दिया गया था.
कौन, किसकी तरफ से कोर्ट में पेश हुए?
सुनवाई के दौरान नेहा बोरा की तरफ से सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन पेश हुए. वहीं, राज्य सरकार की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा और सेंट्रल गवर्नमेंट स्टैंडिंग काउंसिल आशीष दीक्षित अदालत में पेश हुए. वकील ने दलील दी कि संबंधित प्रदर्शन पूरी तरह शांतिपूर्ण थे. उन्होंने कहा कि नेहा बोरा ने न तो हिंसा का आह्वान किया और न ही लोगों को हिंसा के लिए उकसाया.
नेहा बोरा की याचिका में मजिस्ट्रेट के उस नोटिस को चुनौती दी गई है, जिसके तहत उनसे शांति बनाए रखने के लिए निजी मुचलका और एक जमानतदार देने को कहा गया है. हाई कोर्ट में इस नोटिस को लेकर दोनों पक्षों की दलीलें सुनी जा रही हैं.
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