दिल्ली में चल रही स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) प्रक्रिया को लेकर अब पूर्व राजनयिकों ने भी सवाल उठाए हैं. पूर्वी दिल्ली के मयूर विहार स्थित IFS अपार्टमेंट में रहने वाले कई पूर्व राजनयिक परिवार इस वेरिफिकेशन प्रक्रिया को समझने और पूरा करने में दिक्कत महसूस कर रहे हैं.
पूर्व राजनयिक जी पार्थसारथी ने कहा कि इतनी लंबी वोटिंग हिस्ट्री होने के बावजूद उनका नाम पिछली वोटर लिस्ट से मैच नहीं हुआ, जिसके बाद एक बूथ लेवल अधिकारी (BLO) वेरिफिकेशन के लिए उनके घर पहुंचा. उन्होंने इस पूरी प्रक्रिया को गड़बड़ और सवालों से भरा बताया और कहा कि इसे बनाने वाले अधिकारियों को नौकरी से निकाल देना चाहिए.
जी पार्थसारथी लंबे समय से वोट डालते आए हैं, इसके बावजूद उनका नाम "अनमैप्ड" कैटेगरी में डाल दिया गया. उन्होंने कहा कि ये स्थिति खासतौर पर बुजुर्ग वोटरों के लिए मुश्किल है, क्योंकि वे बार बार चुनाव दफ्तर के चक्कर नहीं लगा सकते और अधिकारियों से मिलकर अपनी पहचान साबित करना उनके लिए आसान नहीं है.
उनकी बेटी रुक्मिणी पार्थसारथी ने इस पूरी प्रक्रिया को "अपवर्जनात्मक" यानी लोगों को बाहर करने वाली बताया, न कि सबको शामिल करने वाली. उनके मुताबिक इस सोसाइटी में करीब 50 से 60 पूर्व IFS अधिकारी रहते हैं और सभी को इस वेरिफिकेशन प्रक्रिया में परेशानी हो रही है. उन्होंने बताया कि कई बुजुर्ग यह समझ ही नहीं पा रहे कि उनसे क्या मांगा जा रहा है, और कुछ लोग शारीरिक रूप से इतने सक्षम नहीं हैं कि खुद जाकर BLO से मिल सकें या पूरी प्रक्रिया अकेले पूरी कर सकें.
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पूर्व राजदूत कैलाश अग्रवाल ने भी इस प्रक्रिया की जटिलता पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया इतनी उलझी हुई और कन्फ्यूजिंग हो गई है कि उनके जैसे पढ़े लिखे और जागरूक लोगों को भी इसे पूरा करने में दिक्कत आ रही है. उन्होंने पूछा कि जब उनके जैसे लोगों को ही इतनी दिक्कत हो रही है, तो आम लाखों लोगों का क्या हाल होगा.
दिल्ली में SIR प्रक्रिया को लेकर विवाद पहले से ही चल रहा है. चुनाव अधिकारियों ने लाखों वोटरों को वेरिफिकेशन के लिए चिन्हित किया है, जिनमें वे लोग भी शामिल हैं जिनके मौजूदा रिकॉर्ड पिछली वोटर लिस्ट से लिंक नहीं हो पाए या जिनमें कोई और गड़बड़ी पाई गई. दिल्ली के चीफ इलेक्टोरल ऑफिसर (CEO) ने साफ किया है कि नोटिस मिलने का मतलब यह नहीं कि नाम लिस्ट से हट जाएगा, बल्कि यह वेरिफिकेशन और दस्तावेज जमा करने का मौका है.
"अनमैप्ड विद लास्ट SIR" कैटेगरी अब इस पूरी प्रक्रिया में एक बड़ा मुद्दा बन गई है. यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंच चुका है, जहां कोर्ट ने पूछा कि क्या नोटिस बिना सोचे समझे यानी मैकेनिकल तरीके से जारी किए जा रहे हैं, और चुनाव आयोग से कहा कि प्रक्रिया को बेहतर बनाने के लिए और फिल्टर लगाए जा सकते हैं या नहीं, इस पर विचार करे.
मयूर विहार के इन पूर्व राजनयिकों के लिए अब यह सवाल सिर्फ वेरिफिकेशन का नहीं, बल्कि इस बात का है कि क्या यह पूरी प्रक्रिया बुजुर्गों और कम चलने फिरने वाले लोगों के लिए आसान बनाई गई है या नहीं.
शिवानी शर्मा