Nepal Floods : 9 दिनों तक टनल में फंसे रहे दो मजदूर मिले जिंदा, दिमाग और शरीर पर क्या असर पडे़गा?

नेपाल में बाढ़ के कारण हाइड्रोपॉवर टनल में फंसे दो मजदूरों को 9 दिन बाद जीवित बचा लिया गया, वे गंदे पानी, भूख, प्यास और कम ऑक्सीजन की स्थिति में रहे थे. डॉक्टरों के अनुसार इतने लंबे समय तक ऐसी स्थिति में रहने से मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है.

Advertisement
टनल से निकाले गए मजदूर टनल से निकाले गए मजदूर

आजतक हेल्थ डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 04 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 7:22 PM IST

नेपाल में बाढ़ आने के 9 दिन बाद हाइड्रोपॉवर टनल से दो मजदूरों को जिंदा निकाला गया है. दोनों मजदूरों को इलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया है. 9 दिनों तक ये मजदूर गंदे पानी के बीच भूख, प्यास और कम ऑक्सीजन जैसी कठिन स्थितियों में रहे होंगे. दूसरी तरफ, दिमाग में लगातार मौत का डर और ये सवाल भी आता होगा कि क्या कोई हमें बचा पाएगा या नहीं, लेकिन वो बच गए, हालांकि इस घटना ने एक सवाल को सामने ला दिया है. वो ये कि इतने लंबे समय तक ऐसी परिस्थितियों में रहने के बाद उनके शरीर पर अब क्या असर पड़ सकता है.

Advertisement

डॉक्टरों का कहना है कि इतने दिनों तक टनल में रहने के बाद दिमाग में सबसे बड़ा डर यही होगा कि जिंदा बचेंगे या नहीं, यही डर मेंटल हेल्थ को बिगाड़ देता है. इसस बोलने में परेशानी, भ्रम जैसी समस्याएं हो सकती हैं. गंभीर स्थिति दिमाग के काम पर भी असर पड़ सकता है. दूसरी तरफ नो दिन तक ना तो उनको खाना मिला होगा और न ही पीने के लिए साफ पानी. इससे भी सेहत काफी बिगड़ सकती है.  

यह भी पढ़ें: कहीं मलबा, कहीं कीचड़, कहीं बेबसी... नेपाल में बचे हैं बस तबाही के निशान

9 दिन बिना खाना ना मिले तो शरीर में क्या होता है

इस बारे में लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज में मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ. एलएच घोटेकर ने बताया है. वह कहते हैं कि शरीर खाना बंद होते ही पूरी तरह काम करना बंद नहीं करता, शुरुआत में वह शरीर में जमा ग्लूकोज और ग्लाइकोजन का इस्तेमाल करता है. इसके बाद एनर्जी के लिए शरीर धीरे-धीरे जमा फैट का इस्तेमाल बढ़ाता है. एक स्वस्थ व्यक्ति बिना खाए कई दिनों तक जिंदा रह सकता है. हालांकि 9 दिन भी कम नहीं है, लेकिन इतने दिनों में केवल भूख से मौत का खतरा नहीं होता है. लेकिन शरीर में कमजोरी और थकान बहुत अधिक हो जाती है.

Advertisement

डॉ. घोटेकर बताते हैं कि अगर किसी व्यक्ति ने कई दिनों तक बहुत कम खाना खाया है तो बचाव के बाद भी उसे अचानक बहुत ज्यादा खाना देना सही नहीं होता, लंबे समय तक कम खाने के बाद शरीर में भोजन दोबारा शुरू करने पर कुछ गंभीर इलेक्ट्रोलाइट बदलाव हो सकते हैं, इसलिए ऐसे मरीजों की पोषण संबंधी निगरानी जरूरी होती है.

यह भी पढ़ें: कीचड़ में सने कपड़े, कंधे पर ऑक्सीजन सिलेंडर... नेपाल के लोगों का रेस्क्यू करता ये शख्स कौन?

दिमाग के लिए भी आसान नहीं होते ये 9 दिन

डॉ. घोटेकर बताते हैं कि सुरंग में फंसे व्यक्ति के लिए मानसिक संघर्ष भी उतना ही बड़ा हो सकता है. चारों तरफ अंधेरा, अकेलापन, पानी का खतरा और बचाव होगा या नहीं ये डर लगातार मानसिक तनाव पैदा कर सकता है. कुछ लोग ऐसे में जिंदा रहने की उम्मीद तक छोड़ देते हैं और डिप्रेशन में जा सकते हैं. ऐसे में ये जरूरी है कि जो लोग जिंदा बचे हैं उनका मानसिक रोग विशेषज्ञ से जांच और इलाज जरूर कराना चाहिए.

बाहर निकलने के बाद भी निगरानी जरूरी

रेस्क्यू के बाद खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हो जाता. जो मजदूर बचे हैं अब लगातार उनकी मेडिकल निगरानी करने की जरूरत है.उनके ब्लड प्रेशर, इलेक्ट्रोलाइट्स की स्थिति पर ध्यान देना होगा. डॉ. घोटेकर कहते हैं कि नौ दिन तक सुरंग में फंसे रहकर जिंदा बाहर आना साधारण बचाव है, लेकिन यह घटना यह भी दिखाती है कि इंसान का शरीर और दिमाग बेहद कठिन परिस्थितियों में किस तरह संघर्ष करता है, ऐसे हादसों में बचाव जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है कि बाहर आने के बाद शरीर और मन दोनों को धीरे-धीरे सामान्य स्थिति में लाने के लिए सही इलाज मिले.  

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »