पिछले कई सालों से भारत के वैज्ञानिकों और डॉक्टरों के सामने सबसे ड़ा सवाल यही है कि भारत के लोगों में हार्ट की बीमारियां इतनी जल्दी क्यों सामने आ रही हैं? कम उम्र में हार्ट अटैक क्यों हो रहे हैं? इसके पीछे शरीर में होने वाले कौन से बदलाव जिम्मेदार हैं? द लैंसेट रीजनल हेल्थ साउथ ईस्ट एशिया जर्नल में प्रकाशित एक लेख में वैज्ञानिकों ने इसी सवाल का जवाब खोजने की कोशिश की है. वैज्ञानिकों ने भारत में एक खास तरह का कार्डियोथोरेसिक बायोबैंक मॉडल बनाने का प्रस्ताव दिया है. उनका कहना है कि इस मॉडल से हार्ट की बीमारियों के कम उम्र में होने का पता लग जाएगा.
रिसर्चर्स का कहना है कि भारत में हार्ट से जुड़ी बीमारियां कई दूसरे देशों के मुकाबले कम उम्र में दिखाई दे रही हैं. पहला हार्ट अटैक औसतन करीब 53 साल की उम्र में हो रहा है.अभी तक साउथ एशिया की आबादी से जुड़ी बीमारियों के कारण के बारे में जानने के लिए रिसर्च की बड़ी कमी है. जिन आंकड़ों के आधार पर मरीज की बीमारी के हिसाब से इलाज तय किया जाता है उसकी भी कमी है. भारत में भी हार्ट की बीमारी के पीछे मौजूद असली बायोलॉजिकल कारण भी अभी पूरी तरह समझे नहीं गए हैं. ऐसे में केवल ब्लड टेस्ट, सीटी- स्कैन, एमआरआई, एंजियोग्राफी से ही सही जानकारी मिलनी मुश्किल है. इसके लिए ये जरूरी है कि हार्ट के ऑपरेशन के दौरान निकाला गया इन्फेक्शन वाला हिस्सा ( डिसीज्ड सर्जिकल टिश्यू ) पर रिसर्च हो. इसको लंबे समय तक के लिए क्लिनिकल आउटकम से जोड़ने की बात भी लैंसेट में की गई है.
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ऑपरेशन के दौरान निकला टिश्यू क्यों जरूरी है?
रिसर्च में बताया गया है कि हार्ट के ऑपरेशन के दौरान मरीजों में ,एओर्टा, हार्ट वाल्व और बीमारी वाले टिश्यू पर आमतौर पर रिसर्च नहीं की जाती है. इसको बायोमेडिकल वेस्ट मानकर खत्म कर दिया जाता है, हालांकि कुछ मामलों में इनकी जांच भी की जाती है, लेकिन ये मरीज के इलाज का ही हिस्सा होती है. इसका यूज वैज्ञानिक रिसर्च के लिए बड़े लेवल पर नहीं किया जाता है. लेकिन लैंसेट में वैज्ञानिकों ने यह सुझाव दिया गया है कि इन हिस्सों में से बायोप्सी के जरिए टिश्यू को निकालकर वैज्ञानिक उसकी जांच कर सकते हैं. इससे बीमारी के कारण और ज्यादा गहराई से समझने में मदद मिल सकती है.
कार्डियोथोरेसिक बायोबैंक मॉडल बनाने की सलाह
रिसर्च में भारत में कार्डियोथोरेसिक बायोबैंक बनाने की सलाह दी गई है, लेकिन इसके लिए सीधे पूरे देश में व्यवस्था शुरू करने के बजाय धीरे-धीरे मौजूदा सेंटर्स को बढ़ाने की बात की गई है. इसके लिए उन्होंने नीदरलैंड के एक कार्डियोथोरेसिक बायोबैंक मॉडल का उदाहरण भी दिया है, जिसे भारत में जरूरत के मुताबिक अपनाया जा सकता है. हालांकि भारत मे कुछ कार्डियोथोरेसिक बायोबैंक मौजूद हैं, जिनमें सर्जरी के दौरान निकले टिश्यू को जमा किया जाता है, लेकिन देश में बड़े स्तर पर कार्डियोथोरेसिक बायोबैंक इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं है, जो अलग-अलग कार्डियोथोरेसिक बीमारियों के सर्जिकल टिश्यू और ब्लड के डाटा को एक साथ बड़े स्तर पर इकट्ठा करें और वह रिसर्च के लिए उपलब्ध रहे.
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भारत में बढ़ रही हार्ट की ये बीमारियां
रिसर्च में बताया गया है कि भारत में हार्ट की कई बीमारियां बढ़ रही हैं. केवल हार्ट अटैक और कार्डियक अरेस्ट ही नहीं बल्कि हार्ट की एरोटा की अंदरूनी परत में अचानक फटने वाली गंभीर स्थिति के केस भी बढ़ रहे हैं. भारत में पश्चिमी देशों की तुलना में कनेक्टिव टिश्यू डिजीज के मामले भी ज्यादा हैं, लेकिन अभी तक भारत में इन बीमारियो के पीछे मौजूद बायोलॉजिकल बैकग्राउंड को पूरी तरह से समझा नहीं जा सका है.
क्या इससे भविष्य में इलाज बदल सकता है?
रिसर्चर्स का मानना है कि अगर बड़ी संख्या में भारतीय मरीजों का टिश्यू और क्लीनिकल डाटा एक साथ सुरक्षित किया जाए, तो वैज्ञानिक बीमारी के पीछे मौजूद बायोलॉजिकल फैक्टर ही नहीं बल्कि जेनेटिक कारणों को भी बेहतर तरीके से समझ सकते हैं. इससे आगे चलकर इससे यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि अलग-अलग मरीजों में बीमारी किस तरह विकसित होती है और उनके लिए ज्यादा सटीक इलाज कैसे तैयार किया जा सकता है.
अभिषेक पांचाल