दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का 75 साल की उम्र में निधन हो गया. गोवा में उन्होंने अंतिम सांस ली. नाना पाटेकर को फिल्मों में उनके दमदार अभिनय और बेबाक अंदाज के लिए जाना जाता है. लेकिन उनकी जिंदगी का एक दूसरा पहलू किसानों से जुड़ा रहा है. महाराष्ट्र के किसान परिवारों की मुश्किलों ने नाना को अंदर तक प्रभावित किया था. उन्होंने सिर्फ आर्थिक मदद ही नहीं की, बल्कि किसानों के बीच जाकर उनकी परेशानियां समझीं. बाद में किसान परिवारों की मदद के लिए 'नाम फाउंडेशन' भी शुरू किया.
नाना पाटेकर की पहचान सिर्फ एक शानदार अभिनेता के तौर पर नहीं रही. किसानों और ग्रामीणों के मुद्दों से भी उनका गहरा जुड़ाव रहा. वह कई मौकों पर किसानों की हालत और उनकी परेशानियों पर खुलकर बोलते थे.
द लल्लनटॉप से बातचीत में भी नाना पाटेकर ने किसान आंदोलन और किसानों के हक को लेकर अपनी बात रखी थी. उन्होंने कहा था कि किसान ज्यादा कुछ नहीं मांग रहा. वह सिर्फ अपनी मेहनत की सही कीमत चाहता है. किसान खेत में मेहनत करके पूरे देश के लिए अनाज पैदा करता है, लेकिन उसकी फसल की कीमत को लेकर सवाल बना रहता है.
'किसान की फसल का मिलना चाहिए सही दाम'
नाना पाटेकर का मानना था कि किसान को उसकी फसल की सही कीमत मिलना चाहिए. लल्लनटॉप से बातचीत में उन्होंने किसानों की आर्थिक स्थिति का जिक्र करते हुए कहा था कि देश में बड़ी आबादी खेती पर निर्भर है. किसान खुले आसमान के नीचे अपनी फसल तैयार करता है. उसे मौसम और जानवरों से अपनी फसल बचानी पड़ती है. इसके बाद वही अनाज आम लोगों तक पहुंचता है.
नाना का कहना था कि किसान को उसकी मेहनत के मुताबिक कीमत मिल जाए तो वह सरकार से बहुत ज्यादा कुछ नहीं मांग रहा है. उन्होंने किसानों की आमदनी और फसल के दाम के बीच के अंतर को लेकर भी सवाल उठाया था.
लग्जरी कार खरीदने के लिए रखे पैसों से की किसानों की मदद
किसानों के लिए नाना की चिंता सिर्फ उनके बयानों तक सीमित नहीं थी. हाल ही में लेखक रणबीर पुष्प ने नाना से जुड़ा एक पुराना किस्सा शेयर किया. रणबीर पुष्प ने नाना के साथ फिल्म अग्निसाक्षी में काम किया था.
सिद्धार्थ कन्नन से बातचीत में रणबीर पुष्प ने बताया कि एक बार नाना ने करीब डेढ़ करोड़ रुपये की कार खरीदने का फैसला किया था. इसी दौरान उन्होंने टीवी पर किसान आत्महत्या से प्रभावित परिवारों को देखा. परिवारों की हालत देखकर नाना का मन बदल गया. उन्होंने कार खरीदने के बजाय उस पैसे से किसान परिवारों की मदद करने का फैसला किया.
नाना पाटेकर ने अपने इंटरव्यू में भी इस बात का जिक्र किया था. उन्होंने बताया था कि कार खरीदने के लिए रखे गए पैसों से अपने एक कलाकार दोस्त से 15-15 हजार रुपये के चेक बनवाए. इन्हें किसान परिवारों में बांट दिया. नाना ने महसूस किया कि सिर्फ एक-दो परिवारों की मदद करने से समस्या खत्म नहीं होगी. इसके बाद किसानों के लिए बड़े स्तर पर काम करने की कोशिश शुरू हुई.
किसानों और उनके परिवारों की मदद के इसी प्रयास से आगे चलकर 'नाम फाउंडेशन' की शुरुआत हुई. नाना पाटेकर और अभिनेता मकरंद अनासपुरे इससे जुड़े. संस्था ने महाराष्ट्र के ग्रामीण और किसान परिवारों के लिए काम शुरू किया.
नाना खुद भी किसानों के बीच जाते रहे. उन्होंने सूखे से प्रभावित इलाकों का दौरा किया. किसान परिवारों की परेशानियों को करीब से देखा. पुराने इंटरव्यू में नाना ने बताया था कि वह किसान परिवारों को सिर्फ आर्थिक मदद देकर समस्या खत्म नहीं करना चाहते थे. उनका जोर ऐसी मदद पर था जिससे परिवार आगे अपने पैरों पर खड़े हो सकें.
किसानों के बढ़ते सुसाइड मामले पर जताई थी चिंता
नाना पाटेकर किसान आत्महत्याओं को लेकर बेहद चिंतित रहते थे. उन्होंने कई बार किसानों से ऐसा कदम नहीं उठाने की अपील की. उनका मानना था कि आर्थिक परेशानी के दौर में परिवारों को सहारे की जरूरत होती है.
रणबीर पुष्प ने भी नाना के किसान प्रेम का जिक्र करते हुए कहा कि वह किसानों की मदद के लिए सिर्फ पैसे नहीं देते थे, बल्कि उनके दर्द को समझने की कोशिश करते थे. उन्होंने यह भी बताया कि नाना खुद एक फार्म पर रहते हैं.
नाना पाटेकर का किसानों से कनेक्शन इसलिए अलग रहा क्योंकि उन्होंने इस मुद्दे को सिर्फ भाषणों तक सीमित नहीं रखा. किसानों की आर्थिक परेशानी पर बात करने के साथ उन्होंने परिवारों की मदद भी की. बाद में इसी काम को संस्थागत रूप देने की कोशिश की गई.
'फॉर्म पर आलू-बैंगन उगाते थे नाना'
आजतक से बातचीत करते हुए फिल्ममेकर, एंकर शेखर सुमन ने बताया कि नाना पाटेकर अपने फॉर्म पर आलू-बैंगन उगाते थे. कई बार उन्होंने सुमन को वहां आने और समय बिताने के लिए भी कहा.
दरअसल, नाना पाटेकर का पुणे के पास खडकवासला इलाके के डोणजे गांव में उनका फार्महाउस बताया जाता है. यहां वह शूटिंग और फिल्मी दुनिया की भागदौड़ से दूर समय बिताते थे. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, फार्महाउस पर धान, गेहूं और चने की खेती होती थी. नाना खेती में खुद भी दिलचस्पी लेते थे. यहां गाय, बैल, बकरियां और मुर्गियां भी पाली जाती थीं. खेत में उगाई गई सब्जियों का इस्तेमाल उनके खाने में भी होता था. उनका रहन-सहन भी काफी सादा था. फार्महाउस का माहौल शहर की चकाचौंध से बिल्कुल अलग था.
खेती से नाना का रिश्ता सिर्फ शौक तक सीमित नहीं था. वह किसानों की मुश्किलों को करीब से समझते थे. एक रिपोर्ट के मुताबिक, खेत की उपज से होने वाली कमाई को वह अपने साथ काम करने वाले किसानों के साथ भी साझा करते थे. नाना कई बार खुद को किसान कहने में गर्व महसूस करने की बात कर चुके थे. यही वजह थी कि किसान परिवारों की परेशानियों को लेकर वह लगातार आवाज उठाते रहे. उनके लिए खेती और किसान सिर्फ चर्चा का विषय नहीं थे, बल्कि उनकी जिंदगी का अहम हिस्सा थे.
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