मार्वल की कहानियां सिर्फ कार्टून बेस्ड या फिर फिक्शन की कहानियां ही नहीं हैं. बल्कि कई ऐसे मौके आते हैं, जहां मार्वल में रीयल लाइफ से प्रेरणा ली जाती है. 2018 में रिलीज हुई ब्लैक पैंथर को मार्वल की सबसे ज्यादा सराही गई फिल्मों में गिना गया. ये मुख्य तौर पर ब्लैक कलाकारों वाली बड़ी बजट की सुपरहीरो फिल्म थी, जिसमें अफ्रोफ्यूचरिस्ट अंदाज, अलग विजुअल्स, परंपरा से जुड़ा तकनीकी रूप से ताकतवर अफ्रीकी देश वकांडा, मजबूत थीम और ऐसे महिला किरदार दिखे जो दुश्मनों के सामने भी बिना पुरुष मदद के डटकर खड़ी रहती हैं.
शुरुआत में इस फिल्म की काफी आलोचना हुई, लेकिन फैन्स ने इसे कल्ट बना दिया. फिल्म की सबसे खास बातों में उसकी भाषा भी रही. वकांडा भले ही एक काल्पनिक अफ्रीकी देश है और उसकी वाइब्रेनियम पर टिकी तकनीक पूरी तरह कल्पना है, लेकिन ब्लैक पैंथर में बोली गई भाषा बनाई हुई नहीं, बल्कि असली है. आपने ब्लैक पैंथर को अपने सैनिकों को इकट्ठा करने और उनमें जोश भरने के लिए Yibambe बोलते हुए सुना होगा… ये वही स्पेशल लैंग्वेज है.
वकांडा की स्पेशल लैंग्वेज की कहानी
इस लैंग्वेज का नाम है इसीखोसा, जिसे वकांडा की आधिकारिक आवाज का आधार बनाया गया. इसी को समझने के लिए फिल्म में इस्तेमाल हुई इस भाषा की तुलना दूसरी फिल्मों की गढ़ी गई भाषाओं से भी की जाती है.
देखिए गढ़ी गई भाषा वो होती है जिसे समय के साथ अपने आप विकसित होने के बजाय डिजाइन किया जाता है. इन्हें कृत्रिम या आविष्कृत भाषा भी कहा जाता है. ऐसी भाषाएं कई वजहों से बनाई जाती हैं. कई गढ़ी गई भाषाएं काल्पनिक दुनिया को ज्यादा असली दिखाने के लिए साहित्य, पर्दे और वीडियो गेम में बनाई गईं.
फिल्मों और किताबों की कुछ गढ़ी गई भाषाएं अपने काल्पनिक संसार जितनी ही मशहूर हो चुकी हैं. द लार्ड ऑफ द रिंग्स के लिए जे. आर. आर. टोल्किन ने कई भाषाएं बनाईं. इनमें हाई एल्विश और लो एल्विश सबसे ज्यादा विकसित मानी जाती हैं. हाई एल्विश, जिसे क्वेन्या भी कहा जाता है, कुछ हद तक फिनिश जैसी बताई गई, जबकि लो एल्विश या सिंदारिन को वेल्श के ज्यादा करीब माना गया. फिल्मों में लेगोलस के इसी भाषा में बोलने की बात कही जाती है. टोल्किन खुद भाषाओं के विद्यार्थी रहे थे, इसलिए इन भाषाओं की पकड़ मजबूत मानी गई और दुनिया भर में सैकड़ों लोग इन्हें बोलते भी हैं.
इसी तरह गेम ऑफ थ्रोन्स की डोथराकी और वैलेरियन भी इसी कड़ी की अहम भाषाएं हैं. जॉर्ज आर. आर. मार्टिन ने किताबों के लिए डोथराकी के केवल कुछ छोटे हिस्से बनाए थे. जब इसे पर्दे पर इस्तेमाल लायक भाषा बनाना पड़ा, तब लैंग्वेज क्रिएशन सोसाइटी और भाषाविद डेविड जे. पीटरसन को बुलाया गया.
पीटरसन ने वैलेरियन के साथ उसकी दो काल्पनिक शाखाएं, अस्तापोरी और मिरीनीज, भी तैयार कीं. द इकॉनमिस्ट ने डोथराकी और वैलेरियन को एल्विश के बाद की सबसे भरोसेमंद काल्पनिक भाषाएं बताया था.
इन्हीं का उदाहरण लेते हुए ब्लैक पैंथर पर आते हैं, उसके सामने भी विकल्प था कि वकांडा के लिए बिल्कुल नई भाषा बनाई जाए. ऐसे उदाहरण पहले से मौजूद थे और इस पर कुछ समय विचार भी हुआ. लेकिन दूसरी तरफ यह मकसद भी था कि कहानी जितनी काल्पनिक हो, उतनी ही जमीन से जुड़ी भी लगे.
नई गढ़ी गई भाषा के साथ यह खतरा था कि वह बनावटी सुनाई दे सकती है और कहानी को उसकी वास्तविकता से दूर कर सकती है. ब्लैक पैंथर के मामले में यह डर भी था कि फिल्म का अफ्रीकी केंद्र कमजोर पड़ सकता है. इसलिए वकांडा के लिए ऐसी आवाज खोजी गई जिसकी अपनी गहरी ऐतिहासिक जड़ें हों.
अफ्रीका के कई हिस्सों में बोली जाती है ये लैंग्वेज
यहीं से इसीखोसा पर सहमति बनी. यह एक असली भाषा है और दक्षिण अफ्रीका की 11 आधिकारिक भाषाओं में शामिल है. 8.2 million लोग इसे अपनी पहली भाषा के तौर पर बोलते हैं और करीब 11 million लोग इसे दूसरी भाषा के रूप में इस्तेमाल करते हैं.
कुछ रिपोर्ट्स में इसे दक्षिण अफ्रीका और जिम्बाब्वे में व्यापक रूप से बोली जाने वाली बांटू भाषा भी बताया गया है. इसे चुनने की एक बड़ी वजह इसके सी, क्यू और एक्स से दिखने वाले क्लिक व्यंजन थे, जिन्हें दक्षिणी अफ्रीका के कई लोगों के लिए पहचान वाला और दुनिया भर के दर्शकों के लिए अलग माना गया.
कहते हैं कि इसीखोसा को वकांडा की भाषा बनाने का सुझाव अभिनेता जॉन कानी ने दिया था. ब्लैक पैंथर में उन्होंने किंग टीचाका का किरदार निभाया, जो चैडविक बोसमैन के किंग टीचाला के पिता हैं. कैप्टन अमेरिका सिविल वॉर में अपने छोटे से शुरुआती प्रदर्शन से पहले ही कानी ने सुझाव दिया था कि वकांडा के किरदारों को इसीखोसा बोलनी चाहिए. कानी खुद ईस्टर्न केप में पले बढ़े थे. इनपुट के मुताबिक निर्देशकों ने उन्हें यह भाषा एक बार बोलते सुना और फिर इस विचार से सहमत हो गए.
कुल मिलाकर, ब्लैक पैंथर ने एक काल्पनिक देश के लिए पूरी तरह नई भाषा गढ़ने के बजाय एक जीवित और ऐतिहासिक भाषा को चुना. इसीखोसा ने फिल्म को अलग ध्वनि, सांस्कृतिक गहराई और विश्वसनीयता दी. यही वजह है कि वकांडा की कहानी में भाषा सिर्फ संवाद का हिस्सा नहीं रही, बल्कि फिल्म की पहचान का अहम आधार बन गई.
मोहित ग्रोवर