बॉलीवुड के दिग्गज एक्टर सुरेश ओबेरॉय ने अपनी राजनीतिक पारी को लेकर खुलकर बात की है. उन्होंने बताया कि आखिर वह भारतीय जनता पार्टी (BJP) में कैसे शामिल हुए और कुछ समय बाद राजनीति से उनका मन क्यों उचट गया. सुरेश ने साफ कहा कि राजनीति में उन्हें वो ‘अच्छी एनर्जी’ नहीं मिली, जिसकी वह उम्मीद कर रहे थे.
एक पॉडकास्ट में निधि वासंदानी से बातचीत के दौरान सुरेश ओबेरॉय ने बताया कि उनका राजनीति में आने का फैसला किसी लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक सपने का हिस्सा नहीं था. दरअसल, हैदराबाद कॉलेज के एक दोस्त ने उन्हें BJP जॉइन करने की सलाह दी थी.
सुरेश ने उस किस्से को याद करते हुए कहा- मेरे कॉलेज का एक दोस्त था. एक दिन वो मेरे घर आया और बोला कि BJP जॉइन कर लो. तो मैं उसके साथ चला गया.
जब आडवाणी और अटल जी ने पहनाई माला
सुरेश ओबेरॉय साल 2004 में लोकसभा चुनाव से पहले BJP में शामिल हुए थे. इसके बाद उन्होंने पार्टी के लिए प्रचार भी किया और उसके सांस्कृतिक प्रकोष्ठ से भी जुड़े. पार्टी से जुड़ने के शुरुआती दौर में उनकी मुलाकात BJP के बड़े नेताओं से हुई. सुरेश ने बताया कि लालकृष्ण आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी ने उनके गले में माला भी डाली थी.
लेकिन इसी दौरान उनके गुरु ने उन्हें जमकर डांट दिया. सुरेश के मुताबिक, उनके गुरु ने कहा था- सावधान रहना, इन लोगों से संपर्क भी मत रखना. सुरेश ने बताया कि उनके गुरु ने इससे पहले कभी किसी को इस तरह नहीं डांटा था, लेकिन उस वक्त उन्होंने उन्हें खूब फटकार लगाई.
‘राजनीति से मुझे अच्छी एनर्जी नहीं मिली’
गुरु की चेतावनी के बावजूद सुरेश कुछ समय तक राजनीतिक नेताओं के संपर्क में बने रहे. लेकिन धीरे-धीरे उन्हें अंदर से अच्छा महसूस नहीं होने लगा. उन्होंने कहा- मैं संपर्क में रहा, लेकिन बाद में अंदर से खुश नहीं था. मुझे राजनीति से अच्छी एनर्जी नहीं मिली. सुरेश ने आगे कहा कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह उन्हें ठीक लगे, लेकिन राजनीति में मौजूद कई दूसरे लोगों का व्यवहार उन्हें अजीब लगा. उन्हें कई चीजों में ‘कुछ नकली सा’ महसूस हुआ.
एक्टर ने फिल्मों और राजनीति के बीच तुलना करते हुए कहा कि फिल्म में एक प्रोजेक्ट खत्म होता है और आप आगे बढ़ जाते हैं. लेकिन राजनीति में ऐसा नहीं होता. वहां लोगों के साथ लगातार जुड़े रहना, साथ चलना और उसी सिस्टम का हिस्सा बनना पड़ता है. “मैं उसका हिस्सा नहीं बन पाया,” उन्होंने कहा.
‘मुझे लगा राजनीति का मतलब देश के लिए कुछ करना है’
सुरेश ओबेरॉय ने कहा कि राजनीति को लेकर उनकी सोच काफी आदर्शवादी थी. उन्हें लगता था कि राजनीति का मतलब देश के लिए कुछ अच्छा करना है. लेकिन बाद में उनका अनुभव अलग रहा. उन्होंने कहा- मैं सोचता था कि राजनीति का मतलब अपने देश के लिए कुछ करना है. बाद में मुझे लगा कि ज्यादातर लोग पैसे कमा रहे हैं- झूठ बोलकर और पैसे कमा रहे हैं.
हालांकि, सुरेश ने साफ किया कि वह राजनीति में मौजूद हर व्यक्ति की बात नहीं कर रहे हैं. उन्होंने कुछ नेताओं को इससे अलग भी रखा. उन्होंने कहा कि मोदी जी, उनके आसपास के एक-दो बड़े लोग और योगी जी जैसे कुछ लोगों को वह इस बात में शामिल नहीं कर रहे हैं, लेकिन बाकी ज्यादातर लोगों से वह प्रभावित नहीं हुए.
मोहन भागवत के हैं बड़े फैन
राजनीति से भले ही सुरेश ओबेरॉय का मोहभंग हो गया हो, लेकिन RSS प्रमुख मोहन भागवत को लेकर उनके मन में काफी सम्मान है. सुरेश ने कहा- मैं हमेशा से मोहन भागवत जी का फैन रहा हूं. उन्होंने एक दिलचस्प किस्सा भी सुनाया. सुरेश ने बताया कि उन्होंने एक बार मोहन भागवत को अपने घर आने का न्योता दिया था. तारीख अगले साल की मिली और आखिरकार भागवत उनके घर नाश्ते पर पहुंचे.
सुरेश की पत्नी ने उनके लिए हलवा बनाया. उन्होंने बताया कि भागवत मिठाई नहीं खाते, लेकिन पत्नी ने खास तौर पर हलवा बनाया और उन्हें खिलाया. सुरेश के मुताबिक, भागवत को हलवा काफी पसंद आया और उन्हें वह बात हमेशा याद रही.
सुरेश ने यह भी बताया कि पॉडकास्ट रिकॉर्ड होने से चार-पांच दिन पहले ही उनकी मोहन भागवत से फोन पर बात हुई थी. उन्होंने यह भी याद किया कि अपने बेटे विवेक ओबेरॉय की 2019 में आई फिल्म पीएम नरेंद्र मोदी की रील्स वह नागपुर लेकर गए थे और भागवत को दिखाए थे.
2004 में BJP में शामिल हुए थे सुरेश
सुरेश ओबेरॉय की BJP से राजनीतिक जुड़ाव की शुरुआत फरवरी 2004 में हुई थी. उस दौरान कई फिल्म और टीवी हस्तियों ने पार्टी का दामन थामा था, जिनमें नवजोत सिंह सिद्धू और गजेंद्र चौहान भी शामिल थे. 17 फरवरी 2004 को सुरेश औपचारिक रूप से BJP के सदस्य बने. इसके बाद उन्होंने 2004 के लोकसभा चुनाव में पार्टी के लिए जमकर प्रचार किया. उन्होंने मेघालय समेत कई जगहों पर BJP के लिए कैंपेन किया और तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व का खुलकर समर्थन किया.
दिलचस्प बात यह है कि उस वक्त सुरेश ने कहा था कि BJP में शामिल होने का फैसला उनका अपना था. उन्होंने बताया था कि वह खुद दिल्ली गए और आडवाणी से मिलकर पार्टी में शामिल होने की इच्छा जताई. साथ ही, उन्होंने यह भी साफ किया था कि न तो उनका मंत्री बनने का कोई सपना था और न ही चुनाव लड़ने का इरादा.
यानी सुरेश ओबेरॉय की राजनीतिक कहानी भी कुछ ऐसी रही- दोस्त ने BJP जॉइन करने को कहा, बड़े नेताओं से मुलाकात हुई, पार्टी के लिए प्रचार किया… लेकिन कुछ समय बाद राजनीति का माहौल रास नहीं आया और उन्होंने खुद को उससे अलग कर लिया.
आजतक एंटरटेनमेंट डेस्क