बचपन का घर आखिरी दम तक नहीं भूले नाना पाटेकर, गणपति पर खुद सजाते थे फूल, पड़ोसी बोले- छू नहीं पाया स्टारडम

करोड़ों लोगों के स्टार नाना पाटेकर अपने पुराने घर और पड़ोसियों को कभी नहीं भूले. माहिम की सोसायटी में आज भी गणपति और नाना से जुड़ी उनकी यादें जिंदा हैं.

Advertisement
जहां बीता नाना का बचपन, क्या बोले वहां के लोग (Photo: ITGD) जहां बीता नाना का बचपन, क्या बोले वहां के लोग (Photo: ITGD)

आजतक एंटरटेनमेंट डेस्क

  • नई दिल्ली ,
  • 09 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 7:10 PM IST

पड़ोसी चंद्रेश शाह ने बताया कि वह नाना को करीब 1970 से जानते थे. उनके मुताबिक, नाना लोगों को हमेशा मिल-जुलकर रहने की सलाह देते थे. थिएटर से शुरुआत करने वाला यह लड़का जब बड़ा स्टार बन गया, तब भी उसके व्यवहार में कोई खास बदलाव नहीं आया.

पर्दे पर नाना का गुस्सा और तेवर भले ही लाखों लोगों ने देखे हों, लेकिन अपने मोहल्ले में वह बेहद सहज और आम इंसान की तरह ही रहते थे.

Advertisement

गणपति उत्सव में लौटते थे अपने पुराने घर

नाना का इस सोसायटी से रिश्ता सिर्फ घर तक सीमित नहीं था. गणेशोत्सव के दौरान वह खास तौर पर अपने पुराने घर आते थे. पड़ोसियों के मुताबिक, वह अपने घर पर गणपति लाते और पूरे उत्साह से त्योहार मनाते थे. सबसे खास बात ये थी कि नाना खुद फूलों की सजावट में भी हिस्सा लेते थे. इतनी बड़ी फिल्मी पहचान हासिल करने के बाद भी अपने मोहल्ले के त्योहार में हाथ बंटाने वाला ये अंदाज लोगों को आज भी याद है.

‘अंकुश’ का वो गाना भी इसी घर से जुड़ा?

सोसायटी के एक निवासी ने नाना की फिल्म ‘अंकुश’ से जुड़ा एक दिलचस्प दावा भी किया. उनके मुताबिक, फिल्म का लोकप्रिय गीत ‘इतनी शक्ति हमें देना दाता’ नाना के इसी घर पर रिकॉर्ड किया गया था. हालांकि, इस बात की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है. लेकिन इतना जरूर है कि ‘अंकुश’ नाना के करियर की बेहद खास फिल्मों में रही और इस फिल्म से जुड़ी उनकी कई यादें आज भी उनके पुराने पड़ोस में सुनने को मिलती हैं.

Advertisement

घर में काम करने वाली महिला को भी परिवार जैसा माना

नाना की दरियादिली की एक और कहानी इसी मोहल्ले से सामने आती है. शालूबाई ससाने करीब 35 साल तक नाना के घर में काम करती थीं. कुछ साल पहले उनका निधन हो गया. उनके बेटे दिलीप ससाने ने बताया कि नाना उनकी मां को सिर्फ घरेलू काम करने वाली महिला नहीं मानते थे, बल्कि अपनी मां की तरह सम्मान देते थे. उनका परिवार आर्थिक रूप से कमजोर था और नाना ने कई मौकों पर उनकी मदद की.

दिलीप के मुताबिक, नाना अपने घर के सामने रहने वाले गरीब लोगों के पास भी जाकर बैठते थे और उनसे बातचीत करते थे. यही वजह है कि मोहल्ले के लोगों के लिए नाना सिर्फ पर्दे के अभिनेता नहीं, बल्कि अपने बीच का एक अपना इंसान थे.

अब पुराना घर रह गया, लेकिन नाना की यादें बोलती हैं

कुछ साल पहले नाना पुणे स्थित अपने फार्महाउस चले गए थे. लेकिन माहिम का ये पुराना घर उनकी जिंदगी की जड़ों से जुड़ा रहा. वह समय-समय पर यहां आते रहे और गणेशोत्सव जैसे मौकों पर अपने पुराने लोगों के बीच नजर आते रहे.

आज नाना नहीं हैं, लेकिन नव सहयोग सोसायटी में उनकी कहानियां हैं, उनके पड़ोसी हैं, उनका पुराना घर है और उन गलियों में बसी उनकी यादें हैं. फिल्मों में नाना ने ‘क्रांतिवीर’, ‘परिंदा’, ‘यशवंत’, ‘नटसम्राट’ जैसे किरदारों से इतिहास रचा. लेकिन माहिम के इस छोटे से मोहल्ले के लिए उनकी सबसे बड़ी पहचान शायद यही रहेगी- वो बड़ा स्टार, जो बड़ा बनने के बाद भी कभी अपने लोगों से बड़ा नहीं हुआ.

Advertisement

अब नाना का आखिरी सफर पुणे स्थित उनके फार्महाउस से पूरा होने जा रहा है. लेकिन माहिम की इस सोसायटी में उनका बचपन, उनकी हंसी, उनके गणपति और उनसे जुड़ी छोटी-छोटी कहानियां लंबे वक्त तक जिंदा रहेंगी.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »