अगर राजनीतिक कार्यक्रमों की तस्वीरें पर्दे के पीछे के सियासी समीकरणों का आईना होती हैं, तो मंगलवार को दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ 'इंडिया' गठबंधन का प्रदर्शन बहुत कुछ बयां कर गया. इस प्रदर्शन ने साफ संकेत दिया कि उत्तर प्रदेश के आगामी चुनावों के लिए सपा और कांग्रेस के गठबंधन का पेंच अभी पूरी तरह से सुलझा नहीं है.
राहुल गांधी की अगुवाई में हुए इस विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के लिए सपा प्रमुख अखिलेश यादव मंगलवार सुबह दिल्ली पहुंचे तो जरूर, लेकिन दोनों नेताओं के बीच पहले जैसी गर्मजोशी न देखकर कैमरामैन और फोटोग्राफर खासे निराश नजर आए.
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग को लेकर विपक्षी दलों के सांसद सड़कों पर उतरे. इस विरोध मार्च के दौरान लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी जहां सबसे आगे नेतृत्व कर रहे थे, वहीं अखिलेश यादव अपने पार्टी सांसदों के साथ उनसे एक कतार पीछे चलना ही बेहतर समझते दिखे.
'यूपी के लड़के' वाली वो गर्मजोशी नदारद
राहुल गांधी और अखिलेश यादव विरोध मार्च में एक साथ तो थे, लेकिन उनकी वो सियासी 'केमिस्ट्री' गायब दिखी, जो इससे पहले 'जेन-जी' (Gen Z) प्रदर्शन, 'भारत जोड़ो न्याय यात्रा' या 2024 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान 'यूपी के दो लड़कों की जोड़ी' में दिखाई देती थी.
सियासी गलियारों में चर्चा सिर्फ मंगलवार के प्रदर्शन तक सीमित नहीं है. 30 सितंबर को दिल्ली में हुई 'इंडिया' गठबंधन की अहम बैठक से भी अखिलेश यादव नदारद रहे थे. वे सपा प्रत्याशी प्रो. रामगोपाल यादव और धनराज नथवानी के राज्यसभा नामांकन के सिलसिले में लखनऊ में ही डटे रहे.
अखिलेश यादव ने इस बड़ी बैठक में सांसद धर्मेंद्र यादव या डिंपल यादव जैसे किसी बेहद वरिष्ठ चेहरे को भेजने के बजाय सांसद हरेंद्र मलिक और मोहिबुल्लाह नदवी को प्रतिनिधि बनाकर भेजा. राजनीतिक जानकार इसे कांग्रेस के लिए एक बड़ा सियासी संदेश मान रहे हैं.
क्या मीडिया की सुर्खियों को लेकर है खींचतान?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस भी शायद अखिलेश और डिंपल यादव को अग्रिम पंक्ति में रखने को लेकर बहुत उत्सुक नहीं थी. दरअसल, जुलाई में नीट (NEET) पेपर लीक को लेकर संसद तक निकाले गए 'जेन-जी' मार्च के दौरान डिंपल और अखिलेश ही सारी सुर्खियों में छा गए थे.
प्रदर्शन में घायल छात्रों की देखभाल करतीं डिंपल यादव और अखिलेश की हिरासत के विरोध में दिल्ली की सड़कों पर लगा लंबा जाम मीडिया की मुख्य खबर बन गया था. माना जा रहा है कि इस बार कांग्रेस पूरे मीडिया कवरेज का केंद्र खुद बनना चाहती थी, इसीलिए इस मार्च की रूपरेखा भी उसी हिसाब से तय की गई थी.
गठबंधन की मजबूरी या वोट बैंक का दबाव?
विशेषज्ञों के मुताबिक, सपा और कांग्रेस दोनों ही खुद को गठबंधन के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध दिखाना चाहते हैं. वे यह संदेश देना चाह रहे हैं कि दोनों मिलकर चुनाव लड़ेंगे. इसके पीछे सबसे बड़ी वजह दोनों दलों का कैडर और वोट बैंक है, जो चाहता है कि दोनों पार्टियां मिलकर 2024 के लोकसभा चुनाव जैसा करिश्मा दोबारा दोहराएं.
ऐसे माहौल में, यदि चुनाव नतीजे भाजपा के पक्ष में जाते हैं तो जिस भी दल की ओर से थोड़ी सी भी ढील दिखेगी, जनता हार का ठीकरा उसी के सिर फोड़ेगी. कोई भी सियासी पार्टी इस बदनामी का जोखिम नहीं लेना चाहती और यही मजबूरी दोनों को एक मंच पर बांधे हुए है. जानकारों की मानें तो अगर मतदाताओं का यह दबाव न होता, तो यह गठबंधन काफी पहले ही बिखर चुका होता.
फिलहाल यूपी की सियासत में राहुल गांधी का फ्रंट फुट पर आना और अखिलेश यादव का थोड़ा पीछे हटना संबंधों में साफ खिंचाव की ओर इशारा कर रहा है. यह तनाव तब और गहराता दिखता है जब कांग्रेस के कई पदाधिकारी गठबंधन को लेकर लगातार बयानबाजी कर रहे हैं, जबकि सपा ने इस पूरे मुद्दे पर सधी हुई खामोशी अख्तियार कर रखी है.
समर्थ श्रीवास्तव