पंजाब में आगामी विधानसभा चुनाव की सियासी सरगर्मी बढ़ने के साथ ही नए राजनीतिक समीकरणों की कवायद तेज हो गई है. शिरोमणि अकाली दल (SAD) और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के बीच दूरियां कम होती दिख रही हैं और गठबंधन की चर्चाएं फिर से परवान चढ़ने लगी हैं. पहले सुखबीर सिंह बादल की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात, फिर सांसद हरसिमरत कौर बादल के संकेत और अब बिक्रम सिंह मजीठिया द्वारा खुले तौर पर भाजपा-अकाली गठबंधन की वकालत करने से इस संभावना को और बल मिला है.
बिक्रम सिंह मजीठिया का कहना है कि पंजाब के लिए अकाली दल और भाजपा का गठबंधन समय की मांग है. पंजाब की जनता भी इस गठबंधन की मांग कर रही है. राज्य के हालात बदले हैं, इसलिए अब राजनीतिक नजरिए बदलना जरूरी हो गया है.
अकाली दल और भाजपा के बीच बढ़ती नजदीकियों के पीछे राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमावर्ती राज्य में सिख-हिंदू भाईचारे को मजबूत करने की जरूरत को मुख्य वजह माना जा रहा है. ऐसे में यह सवाल उठता है कि यदि अकाली दल और भाजपा फिर साथ आते हैं, तो पंजाब का सियासी समीकरण कितना बदल जाएगा?
पटरी पर लौटते अकाली दल और बीजेपी के रिश्ते
किसान आंदोलन के दौरान शिरोमणि अकाली दल और भाजपा का सालों पुराना गठबंधन टूट गया था. हालांकि, 2027 के चुनाव की आहट के साथ ही दोनों दलों के बीच एक बार फिर सकारात्मक संकेत मिलने लगे हैं. सूत्रों के अनुसार, कुछ ताकतें पंजाब के सामाजिक और धार्मिक मतभेदों का फायदा उठाने की कोशिश कर रही थीं. ऐसे में यह प्रस्तावित साझेदारी पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के दौर वाले राजनीतिक फॉर्मूले पर आधारित बताई जा रही है.
इस संभावित गठबंधन के केंद्र में राष्ट्रीय सुरक्षा और सिख-हिंदू समुदाय के बीच सामाजिक सौहार्द को मजबूत करना शामिल है. सूत्रों का कहना है कि दोनों दलों के बीच बातचीत सही दिशा में आगे बढ़ रही है और दोनों पक्ष गठबंधन की जरूरत को समझ रहे हैं. बिक्रम मजीठिया ने इस गठबंधन को कानून-व्यवस्था, सीमा सुरक्षा और सांप्रदायिक सद्भाव के हित में बताया है.
बदले समय में सीट शेयरिंग का क्या होगा फॉर्मूला?
भाजपा और अकाली दल के बीच बातचीत शुरू जरूर हुई है, लेकिन फिलहाल दोनों पार्टियां एक व्यापक राजनीतिक सहमति बनाने पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं. सीट-बंटवारे के संवेदनशील मुद्दे पर बाद में चर्चा होने की संभावना है.
माना जा रहा है कि इस बार भाजपा पिछली व्यवस्था की तुलना में सीटों का बड़ा हिस्सा मांगेगी. पंजाब में 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी के प्रदर्शन के बाद उसकी मोलभाव करने की स्थिति मजबूत हुई है. इससे पहले अकाली दल राज्य में 'बड़े भाई' की भूमिका में रहता था, लेकिन अब राजनीतिक परिस्थितियां बदल चुकी हैं और अकाली दल की स्थिति पहले जैसी मजबूत नहीं रही है.
पंजाब में कैसे बदल गए राजनीतिक हालात?
1997 के बाद से पंजाब विधानसभा चुनाव में भाजपा का वोट शेयर 10 प्रतिशत के आसपास ही रहता था, क्योंकि वह बहुत कम सीटों पर चुनाव लड़ती थी. 2022 का विधानसभा चुनाव दोनों दलों ने अलग-अलग लड़ा, जिसमें भाजपा को लगभग 6.6 प्रतिशत वोट मिले, जबकि अकाली दल का वोट शेयर गिरकर लगभग 18 प्रतिशत रह गया.
2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा का वोट शेयर तेजी से बढ़कर लगभग 18 प्रतिशत हो गया. वहीं, शिरोमणि अकाली दल का वोट शेयर गिरकर लगभग 13.4 प्रतिशत पर आ गया और वह चौथे स्थान पर खिसक गई. दूसरी ओर, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (AAP) दोनों को 26 प्रतिशत से थोड़ा अधिक वोट मिला. ये बदले हुए आंकड़े आगामी सीट-बंटवारे की बातचीत पर सीधा असर डालेंगे.
अकाली दल और भाजपा के साथ आने से क्या बदलेगा?
नब्बे के दशक में दोनों दलों ने हाथ मिलाया था. 1997 में पहली बार भाजपा और अकाली दल ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा और पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आएय. 117 सीटों में से 93 सीटें जीतकर गठबंधन ने सरकार बनाई थी, जिसमें अकाली दल ने 37.64 प्रतिशत वोट के साथ 75 सीटें और भाजपा ने 8.33 प्रतिशत वोट के साथ 18 सीटें जीती थीं.
2002 में गठबंधन को हार का सामना करना पड़ा, लेकिन उनका संयुक्त वोट शेयर 35 प्रतिशत के करीब रहा. 2007 के विधानसभा चुनाव में गठबंधन ने वापसी की, जिसमें अकाली दल ने 37.09 प्रतिशत वोट के साथ 48 सीटें और भाजपा ने 8.29 प्रतिशत वोट के साथ 19 सीटें जीतीं. 2012 के चुनाव में भी यह गठबंधन सफल रहा, लेकिन 2017 में सत्ता कांग्रेस के पास चली गई.
जब तक दोनों दल साथ लड़ते रहे, उनका संयुक्त वोट शेयर अक्सर 37 प्रतिशत से अधिक रहा. गठबंधन टूटने के बाद दोनों का राजनीतिक जनाधार प्रभावित हुआ है. पंजाब की शहरी सीटों पर भाजपा के कारण अकाली दल को समर्थन मिलता था, तो ग्रामीण क्षेत्रों में अकाली दल के दम पर भाजपा मजबूत होती थी. साथ ही, हिंदू मतदाता भी भाजपा की मौजूदगी के कारण गठबंधन के पक्ष में मतदान करते थे.
पंजाब में हिंदू मतदाताओं का रुख सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाता है. राज्य में लगभग 38.49 प्रतिशत हिंदू आबादी है और 31.94 प्रतिशत अनुसूचित जाति (जिसमें हिंदू और सिख दोनों शामिल हैं) की आबादी है. अकाली दल हिंदू वोटबैंक को साधने की कोशिश कर रहा है, लेकिन भाजपा के बिना उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिल पा रही है.
भाजपा परंपरागत रूप से हिंदू बहुल सीटों पर निर्भर रही है और उसकी नजर उन 45 सीटों पर है जहां 60 प्रतिशत से अधिक हिंदू आबादी है. ऐसे में यदि दोनों दल फिर साथ आते हैं, तो पंजाब का चुनावी गणित पूरी तरह बदल सकता है. इतना ही नहीं सूबे की चुनावी त्रिकाणीय बन सकती है.
अमित भारद्वाज / असीम बस्सी