पंजाब में 5 साल में ऐसा क्या बदल गया कि BJP-अकाली के बीच बार्गेनिंग पावर गेम चेंज हो गया?

2024 के लोकसभा चुनाव में बढ़े वोट शेयर के दम पर बीजेपी अब पंजाब में अकाली दल के सामने 'छोटे भाई' की भूमिका से बाहर निकलकर 55 सीटों की मांग कर रही है. दोनों दलों के बीच सीट-शेयरिंग और सीएम चेहरे को लेकर फंसा यह पेच ही 2027 के चुनाव से पहले गठबंधन की राह में सबसे बड़ी रुकावट बना हुआ है.

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पंजाब में अकाली और बीजेपी का गठबंधन (Photo- ITG) पंजाब में अकाली और बीजेपी का गठबंधन (Photo- ITG)

ऐश्वर्या पालीवाल / कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली,
  • 27 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 1:47 PM IST

पंजाब में 25 सालों तक बीजेपी और शिरोमणि अकाली दल मिलकर चुनाव लड़ते रहे हैं, लेकिन किसान आंदोलन के दौरान 2020 में यह ढाई दशक पुरानी दोस्ती टूट गई थी. अब 2027 के विधानसभा चुनाव की सियासी तपिश के साथ फिर से अकाली दल और बीजेपी के गठबंधन की बात तेज हो गई है. बीजेपी गठबंधन की चर्चाओं को सिरे से खारिज कर रही है, जबकि अकाली दल के नेता गठबंधन की वकालत कर रहे हैं.

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1997 से 2017 तक हुए विधानसभा और 1996 से 2019 तक हुए लोकसभा चुनावों में बीजेपी और अकाली दल गठबंधन करके चुनाव लड़ते रहे हैं. इस दौरान पंजाब में अकाली दल हमेशा 'बड़े भाई' तो बीजेपी 'छोटे भाई' की भूमिका में रही, लेकिन 2024 के चुनाव से सियासी हालात बदल गए हैं.

बीजेपी पिछले काफी समय से पंजाब में संगठन के विस्तार में लगी है और पार्टी की संगठनात्मक ताकत भी बढ़ी है. इसलिए अब बीजेपी पंजाब में पहले की तरह अकाली दल के छोटे भाई की भूमिका में गठबंधन नहीं करना चाहती, बल्कि ज्यादा सीटों के साथ हाथ मिलाना चाहती है. इसीलिए बीजेपी और अकाली दल के बीच बार्गेनिंग पावर चेंज हो गई है, जिसके चलते गठबंधन से कोहरे नहीं छट रहे हैं.

पंजाब में बीजेपी की 55 सीटों की डिमांड

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2020 में गठबंधन टूटने के छह साल बाद अकाली दल और बीजेपी पंजाब में फिर से हाथ मिलाने की फिराक में हैं. पंजाब में बीजेपी अकेले दम पर अपनी ताकत को लेकर बढ़ती हुई हिम्मत के साथ सभी 117 सीटों पर चुनाव लड़ने की बात कर रही है. सूत्रों ने बताया कि बीजेपी पंजाब में अब अकाली दल से 55 सीटों की मांग कर रही है, जबकि अकाली दल उसे 45 सीटें देने के लिए तैयार है.

पंजाब में बीजेपी और अकाली दल के बीच यह सीट शेयरिंग का फार्मूला भले ही छोटा लग सकता है, लेकिन राजनीतिक रूप से यह एक बहुत बड़ी खाई है, क्योंकि यह सत्ता के पुराने समीकरण में एक बुनियादी बदलाव का संकेत है. 2022 के चुनाव से पहले तक बीजेपी पंजाब में सिर्फ दो दर्जन (23) सीटों पर ही चुनाव लड़ती रही थी.

ढाई दशक तक रहा 23-94 का फार्मूला

पंजाब में 1997 के विधानसभा चुनाव में पहली बार भाजपा और अकाली दल ने मिलकर चुनाव लड़ा था. उस समय से लेकर 2017 तक पंजाब में होने वाले सभी विधानसभा चुनावों में बीजेपी 23 सीटों पर चुनाव लड़ती रही, जबकि अकाली दल 94 सीटों पर किस्मत आजमाता रहा. 1997 चुनाव के नतीजे देखें तो 117 सीटों में से 93 सीटें जीतकर गठबंधन ने सरकार बनाई थी, जिसमें अकाली दल ने 37.64 प्रतिशत वोट के साथ 75 सीटें और भाजपा ने 8.33 प्रतिशत वोट के साथ 18 सीटें जीती थीं.

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बीजेपी और अकाली 1997, 2002, 2007, 2012 और 2017 में पंजाब विधानसभा चुनाव साथ मिलकर लड़े. यह गठबंधन 1997 में सत्ता में आया, 2007 में फिर से सरकार बनाई और 2012 में लगातार दूसरी बार जीतकर इतिहास रचा, लेकिन 2017 में चुनाव हार गया. अकाली और बीजेपी के बीच 94-23 सीट का फार्मूला रहा, लेकिन अब यह बात पुराने दौर की हो गई है. अब बीजेपी पंजाब में पहले जैसी नहीं रह गई है, उसकी महत्वाकांक्षा बढ़ गई है.

पंजाब में कैसे बदल गया बार्गेनिंग पावर?

2022 के चुनाव में बीजेपी पहली बार राज्य की सभी 117 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ी. इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में अकेले किस्मत आजमाया, जिससे स्थिति बदल गई. 1997 के बाद से 2017 तक पंजाब विधानसभा चुनाव में अकाली दल के साथ मिलकर लड़ने के दौरान बीजेपी का वोट शेयर 10 प्रतिशत के आसपास ही रहता था, क्योंकि वह बहुत कम सीटों पर चुनाव लड़ती थी.

2022 का विधानसभा चुनाव दोनों दलों ने अलग-अलग लड़ा, जिसमें भाजपा को लगभग 6.6 प्रतिशत वोट मिले, जबकि अकाली दल का वोट शेयर गिरकर लगभग 18 प्रतिशत रह गया. 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा का वोट शेयर तेजी से बढ़कर लगभग 18 प्रतिशत हो गया. वहीं, शिरोमणि अकाली दल का वोट शेयर गिरकर लगभग 13.4 प्रतिशत पर आ गया और वह चौथे स्थान पर खिसक गई. इसके चलते बीजेपी ने पंजाब में अपनी डिमांड बढ़ा दी है.

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पंजाब में 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के प्रदर्शन के बाद उसकी मोलभाव करने की स्थिति मजबूत हुई है. पहले अकाली दल राज्य में 'बड़े भाई' की भूमिका में रहता था, लेकिन अब राजनीतिक परिस्थितियां बदल चुकी हैं और अकाली दल की सियासी स्थिति पहले जैसी मजबूत नहीं रह गई है.

सीट शेयरिंग से सीएम तक पर सस्पेंस

बीजेपी का मानना ​​है कि पंजाब में उसकी पैठ बढ़ी है और वह चाहती है कि सीट-बंटवारे की व्यवस्था में यह बात झलकनी चाहिए. वहीं, SAD का अपना हिसाब-किताब है और वह दशकों से बनी अपनी मजबूत स्थिति को छोड़ने को तैयार नहीं है. इसमें सबसे बड़ी अड़चन आती है कि मुख्यमंत्री पद का चेहरा कौन होगा.

बीजेपी चाहती है कि चुनाव के बाद तक इस सवाल को खुला रखा जाए, जबकि SAD चाहती है कि चुनाव से पहले ही पार्टी अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल को गठबंधन के नेता के तौर पर पेश किया जाए. यह मतभेद सीट-बंटवारे की बातचीत जितना ही बड़ा मुद्दा बन सकता है. बीजेपी अकाली दल के साथ गठबंधन में 117 में से 23 सीटों पर चुनाव लड़ती थी, मगर इस बार यह चर्चा है कि बीजेपी कम से कम 55 सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती है ताकि पार्टी कार्यकर्ताओं में भी यह संदेश जाए कि पार्टी सम्मानजनक सीटों के साथ गठबंधन कर रही है.

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