उत्तर प्रदेश की सियासत में दलित-मुस्लिम समीकरण के सहारे आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद 2027 में 'किंगमेकर' बनने की जुगत में हैं. सीएए-एनआरसी आंदोलनों और जामा मस्जिद विरोध प्रदर्शनों के दौरान चंद्रशेखर आजाद मुस्लिम युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय हुए थे. 2024 में वह नगीना से सांसद भी बने, लेकिन 2027 से पहले उनका यह समीकरण बिखरता नजर आ रहा है.
पश्चिमी यूपी के कद्दावर मुस्लिम नेता व पूर्व सांसद अमीर आलम और उनके पूर्व विधायक बेटे नवाजिश आलम ने हाल ही में आजाद समाज पार्टी छोड़ दी है. इसके अलावा गुलफाम चौधरी भी चंद्रशेखर की पार्टी को अलविदा कह चुके हैं.
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव का सियासी तापमान बढ़ने के साथ ही मुस्लिम नेताओं का चंद्रशेखर आजाद से मोहभंग होने लगा है. चंद्रशेखर का साथ छोड़ने वाले ये मुस्लिम नेता अब कांग्रेस का दामन थामने जा रहे हैं. ऐसे में 2027 के चुनाव में चंद्रशेखर के दलित-मुस्लिम समीकरण पर संकट गहराने लगा है.
चंद्रशेखर आजाद के लिए कितना बड़ा झटका?
2024 के लोकसभा चुनाव में चंद्रशेखर आज़ाद के उभार के बाद से माना जा रहा था कि पश्चिमी यूपी में 'दलित-मुस्लिम' गठबंधन की एक नई सियासी धुरी खड़ी हो रही है. लेकिन महज दो साल में ही मुस्लिम नेताओं और समुदाय के बीच चंद्रशेखर को लेकर मोहभंग की स्थितियां बनने लगी हैं. नवाजिश आलम ने 18 सितंबर 2026 को पार्टी को अलविदा कह दिया. साथ ही उनके पिता व पूर्व सांसद अमीर आलम ने भी पार्टी छोड़ दी.
नवाजिश आलम के पिता अमीर आलम क्षेत्र के कद्दावर मुस्लिम नेताओं में गिने जाते हैं (और नवाजिश के दादा स्वर्गीय मीर आलम अपने दौर के दिग्गज नेता थे). नवाजिश खुद बुढ़ाना विधानसभा सीट से सपा के टिकट पर विधायक रह चुके हैं. अमीर आलम कैराना से सांसद और राज्यसभा सदस्य भी रह चुके हैं. ये नेता आरएलडी छोड़कर आजाद समाज पार्टी में आए थे, लेकिन अब चुनाव से ठीक पहले सियासी पाला बदलने जा रहे हैं.
नवाजिश आलम ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर कहा कि आजाद समाज पार्टी को जिस उम्मीद के साथ जॉइन किया था, वह पूरी नहीं हो सकी. साथ ही उन्होंने कहा कि आजाद समाज पार्टी की खुद दलित समुदाय के बीच ही स्वीकार्यता नहीं है; ऐसे में मुस्लिम वोटों के सहारे सिर्फ बीजेपी को लाभ पहुंचाना ही मकसद दिखता है. अमीर आलम ने भी आसपा नेतृत्व पर वादे पूरे न करने और संपर्क में कमी के आरोप लगाए हैं. खुद अमीर आलम ने मीडिया से 23 सितंबर को कांग्रेस में शामिल होने की पुष्टि की है.
नवाजिश और अमीर आलम थामेंगे कांग्रेस का हाथ
पूर्व सांसद अमीर आलम और उनके पूर्व विधायक बेटे नवाजिश आलम का नया सियासी ठिकाना अब कांग्रेस होगा. 2027 में दोनों बाप-बेटे कांग्रेस के टिकट पर चुनावी रण में हुंकार भरते दिख सकते हैं. बुधवार (23 सितंबर) को कांग्रेस मुख्यालय दिल्ली में दोनों कांग्रेस का हाथ थामेंगे, यानी कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर नई सियासी पारी शुरू करेंगे.
करीब डेढ़ साल पहले राष्ट्रीय लोकदल छोड़कर आजाद समाज पार्टी में शामिल हुए पिता-पुत्र की यह नई राजनीतिक पारी पश्चिमी यूपी की सियासत में चर्चा का विषय बन गई है. इस कदम से नए सियासी समीकरण बनने से इनकार नहीं किया जा सकता. नवाजिश आलम और उनके समर्थकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के खिलाफ मुख्य लड़ाई अब कांग्रेस और सपा ही लड़ रही है. ऐसे में किसी क्षेत्रीय या छोटे दल में रहकर मुस्लिम समाज के सियासी हितों की रक्षा नहीं की जा सकती.
पिता-पुत्र की मानी जाती है मजबूत सियासी पकड़
पिता-पुत्र की यह सियासी जोड़ी वेस्ट यूपी में बेहद मजबूत और जनाधार वाली मानी जाती है. आलम परिवार का अपना लंबा राजनीतिक इतिहास रहा है. अमीर आलम के राजनीतिक सफर को देखें तो वह 1985 में पहली बार थानाभवन से विधायक बने; 1989 में मोरना सीट से विधानसभा पहुंचे; 1996 में फिर थानाभवन लौटे और विधायक चुने गए. उसके बाद वह कैराना से सांसद चुने गए और बाद में समाजवादी पार्टी से राज्यसभा सदस्य मनोनीत हुए.
अमीर आलम ने 2018 में रालोद में वापसी की थी और 2025 में आजाद समाज पार्टी में शामिल हुए थे. अमीर आलम का चंद्रशेखर के साथ जाना वेस्ट यूपी का बड़ा सियासी घटनाक्रम माना गया था, लेकिन अब डेढ़ साल बाद 18 सितंबर 2026 को उन्होंने आसपा से इस्तीफा दे दिया और आगे की पारी कांग्रेस के साथ बढ़ाने का फैसला किया है.
नवाजिश आलम भी पिता के नक्शे-कदम पर सियासत में कूदे. वह 2012 में बुढ़ाना से सपा के टिकट पर विधायक बने. 2017 में मीरापुर सीट से बसपा के टिकट पर चुनाव लड़े, लेकिन हार गए. 2018 में रालोद में शामिल हुए, लेकिन वहां टिकट न मिलने के चलते 2025 में पिता के साथ आसपा में शामिल हो गए. अब 18 सितंबर 2026 को उन्होंने पिता के साथ आसपा से इस्तीफा दे दिया और 23 सितंबर को कांग्रेस में शामिल होने जा रहे हैं.
यूपी के 2027 चुनाव पर क्या होगा असर?
नवाजिश आलम और अमीर आलम का कांग्रेस में शामिल होना पश्चिम उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की 'मुस्लिम री-कनेक्ट' नीति का हिस्सा माना जा रहा है. इमरान मसूद और इकरा हसन जैसे युवा मुस्लिम चेहरों के उभार के बाद, क्षेत्र के अन्य प्रभावशाली परिवार भी अब खुद को मुख्यधारा के राजनीतिक गठबंधनों से जोड़ने को तरजीह दे रहे हैं.
नवाजिश आलम और अमीर आलम का यह फैसला न केवल मुजफ्फरनगर की बुढ़ाना और मीरापुर सीटों के समीकरण बदलेगा, बल्कि चंद्रशेखर आज़ाद के लिए अपने कोर 'दलित-मुस्लिम' जनाधार को बचाए रखने की बड़ी चुनौती भी खड़ी कर चुका है.
कुबूल अहमद