उत्तर प्रदेश की सियासत में बसपा प्रमुख मायावती एक बार फिर अपनी खोई जमीन को वापस पाने और पुराने सियासी वजूद को हासिल करने की जुगत में हैं. मायावती ने अपने भतीजे और नेशनल कोऑर्डिनेटर आकाश आनंद को यूपी की कमान सौंप दी है. बसपा में री-एंट्री के बाद उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपी गई है और अब उन्हें चुनावी जनसभाओं के जरिए जनता के बीच पहुंचने का कार्यक्रम दिया गया है.
आकाश आनंद के 28 अक्टूबर से शुरू होने वाले चुनावी दौरों और रैलियों के साथ ही बसपा नए तेवरों के साथ मैदान में उतरने जा रही है. आकाश की यूपी में होने वाली रैलियों की तारीख और जगह तय हो गई हैं, लेकिन उनकी सियासी राह में कांटे ही कांटे हैं.
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या आकाश आनंद पार्टी प्रमुख मायावती के भरोसे पर खरे उतर पाएंगे. क्या वे बसपा के पुराने दिन और राजनीतिक तेवर को वापस लौटा सकेंगे? आइए समझते हैं इस सियासी बदलाव के मायने और उनके सामने खड़ी चुनौतियां क्या हैं?
मायावती का आकाश पर भरोसा
लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान आक्रामक तेवरों के साथ उभरे आकाश आनंद को लेकर पार्टी के भीतर और बाहर काफी उम्मीदें जगी थीं. हालांकि, कुछ समय के लिए उन्हें सांगठनिक जिम्मेदारियों से अलग किया गया था, लेकिन अब मायावती ने एक बार फिर उन पर पूरा भरोसा जताते हुए बसपा के प्रचार अभियान की मुख्य कमान उनके हाथों में सौंप दी है.
आकाश आनंद के जरिए बसपा का मुख्य फोकस उत्तर प्रदेश के उन युवाओं और नए मतदाताओं को अपने पाले में लाना है, जो लंबे समय से पार्टी से छिटककर अन्य दलों की ओर चले गए थे. दलित युवा सांसद चंद्रशेखर आजाद के आक्रामक तेवर भी यूपी के दलित वोटर्स को अपने साथ जोड़ने की कोशिश में हैं.
2027 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले आकाश आनंद का यह अभियान बसपा के काडर में नई ऊर्जा भरने और पार्टी के पारंपरिक दलित-अतिपिछड़े और सर्वसमाज के समीकरण को फिर से मजबूत करने की बड़ी कोशिश है. ऐसे में आकाश आनंद की यूपी में होने वाली रैलियों का प्रोग्राम भी तय हो गया है.
यूपी में आकाश आनंद की रैलियां
मायावती ने आकाश आनंद को यूपी की रणभूमि में फिर उतारने का फैसला किया है. आकाश आनंद अपना प्रचार अभियान पश्चिमी उत्तर प्रदेश से शुरू करेंगे और फिर अलग-अलग क्षेत्रों में जाकर बसपा के संभावित प्रत्याशियों का ऐलान करेंगे. 28 अक्टूबर को बुलंदशहर, 2 नवंबर को सहारनपुर, 20 नवंबर को अयोध्या, 22 नवंबर को आगरा और 29 नवंबर को कानपुर नगर में आकाश आनंद बसपा प्रत्याशियों के नामों का ऐलान करेंगे.
बसपा 2027 के विधानसभा चुनाव में अपने संगठन को सक्रिय करने, उम्मीदवारों को जनता के बीच पहुंचाने और बहुजन समाज के मतदाताओं से संवाद करने के लिए आकाश को यूपी की जमीन पर उतार रही है. आकाश आनंद की जनसभाएं इस दिशा में पार्टी के प्रचार अभियान का हिस्सा हैं, जहां वे बसपा का एजेंडा सेट करते नजर आएंगे.
बसपा के सामने खड़ी बड़ी चुनौतियां
आकाश आनंद के लिए राह इतनी आसान नहीं है. 2012 के बाद से बसपा का जनाधार लगातार कम होता जा रहा है. इतना ही नहीं, बसपा के तमाम बड़े नेता पार्टी छोड़कर चले गए हैं. पिछले कुछ चुनावों में बसपा के वोटबैंक में भारी सेंध लगी है. बसपा का जो 'कैडर वोट' कभी पार्टी की सबसे बड़ी ताकत हुआ करता था, वह सपा और बीजेपी के पाले में खिसका है. उस समर्पित काडर को वापस बूथ स्तर तक जोड़ना सबसे बड़ी चुनौती है.
सपा 'PDA' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के जरिए दलितों और पिछड़ों को साधने में जुटी है, जबकि बीजेपी लगातार गैर-जाटव दलितों और अन्य जातियों में अपनी पैठ बना रही है. बसपा के मूल सामाजिक समीकरण को बचाए रखना कठिन कार्य है. एक दलित चेहरे के तौर पर चंद्रशेखर आजाद का उभार हुआ है, जो खुद को बसपा के विकल्प के रूप में पेश कर रहे हैं.
यूपी विधानसभा में बसपा का एक भी विधायक या एमएलसी नहीं है. लोकसभा में भी बसपा का कोई सांसद नहीं है. राज्यसभा में बसपा के इकलौते सांसद रामजी गौतम का कार्यकाल समाप्त हो रहा है, जिसके बाद संसद में पार्टी का प्रतिनिधित्व शून्य हो जाएगा. ऐसे में बसपा को फिर से खड़ा करना और सत्ता में वापसी कराने की चुनौती आकाश आनंद के पास होगी.
क्या लौट पाएंगे बसपा के पुराने तेवर?
बसपा के 'पुराने तेवरों' का मतलब उस समय की राजनीति से है जब पार्टी बिना किसी बड़े गठबंधन के अपने दम पर दलितों, पिछड़ों और सवर्णों के गठजोड़ से सत्ता के सिंहासन तक पहुंची थी. आकाश आनंद की जनसभाएं इस दिशा में पार्टी के प्रचार अभियान का अहम हिस्सा हैं.
आकाश की सभाओं में तीन बातें खास तौर पर देखने लायक होंगी, आकाश का बीजेपी और सरकार पर हमला कितना तीखा रहता है, वे दलितों और दूसरे वंचित वर्गों के मुद्दों को किस तरह उठाते हैं और मायावती की राजनीतिक रणनीति को जनता तक पहुंचाने में उनकी भूमिका कितनी बढ़ती है.
आकाश आनंद के भाषणों में आक्रामकता और जोश तो दिखता है, लेकिन जमीनी स्तर पर पार्टी की सांगठनिक कमियों को दूर करना और रूठे हुए स्थानीय नेताओं को मनाना उनके लिए एक बड़ी परीक्षा होगी.
आकाश आनंद पुरानी पारंपरिक शैली से हटकर आक्रामक सोशल मीडिया कैंपेन, नुक्कड़ सभाओं और तीखे भाषणों के जरिए युवाओं को कितना अपने साथ जोड़ पाते हैं, यह देखना होगा. बसपा के पुराने तेवर अब तभी लौट सकते हैं, जब सिर्फ रैलियों तक सीमित न रहकर सेक्टर और बूथ स्तर पर कमेटियों को दोबारा सक्रिय किया जाए.
आकाश आनंद के कंधों पर केवल एक राजनीतिक पार्टी के चुनाव प्रचार की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह बहुजन समाज पार्टी के अस्तित्व और उसके भविष्य की लड़ाई है. 28 अक्टूबर से शुरू होने वाली उनकी रैलियां यह तय करेंगी कि बसपा आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यूपी की राजनीति में किंगमेकर की भूमिका में वापसी कर पाती है या नहीं. मायावती का भरोसा कितना रंग लाता है, यह आने वाला वक्त ही बताएगा.
कुबूल अहमद