आजतक पंचायत पंजाब के मंच पर पंजाब में पराली (धान के अवशेष) जलाने और उससे फैलने वाले प्रदूषण के गंभीर मुद्दे पर किसान नेताओं के विचार आपस में टकरा गए. कार्यक्रम के दौरान जब रिपोर्टर ने पराली प्रबंधन और जहरीली हवा को लेकर सवाल किया, तो किसान नेताओं की अलग-अलग राय सामने आई और वे मंच पर ही एक-दूसरे के तर्कों को काटने लगे.
पंजाब में चल रहे किसान आंदोलनों, न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और किसानों पर बढ़ते कर्ज के मुद्दे पर किसान नेताओं ने खुलकर अपनी बात रखी. कार्यक्रम के दौरान जब उनसे सवाल पूछा गया कि क्या बार-बार आंदोलन करना ही एकमात्र रास्ता बचा है, तो किसान नेताओं ने एक सुर में कहा कि जब सरकारें सुनवाई बंद कर देती हैं, तब मजबूरन किसानों को आंदोलन का रास्ता चुनना पड़ता है.
महंगाई 500 गुना बढ़ी, पर फसल का भाव नहीं: लखोवाल
भारतीय किसान यूनियन के महासचिव हरिंदर सिंह लखोवाल ने संगठन के लंबे संघर्ष का जिक्र करते हुए कहा कि उनकी जत्थेबंदी 1970 से किसानों के हक की लड़ाई लड़ रही है. उन्होंने कहा कि 966-67 के दौर से तुलना की जाए, तो आज ईंट, ट्रैक्टर, सोना और मजदूरी के दाम 30 से लेकर 500 गुना तक बढ़ चुके हैं.
उन्होंने कहा कि मंहगाई के इस अनुपात में किसानों की फसलों के भाव नहीं बढ़ाए गए, जिसके चलते किसान कर्ज के भंवर में फंसता चला गया. कांग्रेस हो या बीजेपी, हर सरकार ने किसानों से वादे तो किए लेकिन पूरे नहीं किए. इसी वजह से एमएसपी, कर्ज माफी और भूमि अधिग्रहण जैसे मुद्दों पर बार-बार प्रदर्शन करना पड़ता है.
फूड बाउल भरने वाला किसान खुद घाटे में: पंधेर
किसान मजदूर संघर्ष कमेटी के नेता सरवण सिंह पंधेर ने किसानों की आर्थिक बदहाली पर दुख जताते हुए कहा कि कोई भी किसान अपना काम-धंधा छोड़कर शौक से धरने पर नहीं बैठता. उन्होंने कहा कि 1960 के दशक में जब एमएसपी शुरू हुई, तब पंजाब और हरियाणा के किसानों ने भारी लागत लगाकर अपनी जमीनें तैयार कीं और पूरे देश का 'फूड बाउल' (अन्न भंडार) भरा.
उन्होंने कहा देश का पेट भरने के बावजूद अगर आर्थिक सूचकांक देखें, तो किसान की हालत लगातार गिरती गई और वह हमेशा घाटे में रहा.जब हर तरफ से सारे दरवाजे बंद हो जाते हैं, तब एक लोकतांत्रिक देश में किसान के पास अपनी आवाज बुलंद करने के लिए आंदोलन ही आखिरी विकल्प बचता है.
स्थायी समाधान की जरूरत: सुखवंत सिंह टिल्लू
पंजाब किसान मोर्चा के उपाध्यक्ष सुखवंत सिंह टिल्लू ने कहा कि किसानों की मांगें पूरी तरह जायज हैं. आज पंजाब का किसान घाटे की खेती करने पर मजबूर है. जब तक सरकारें किसान की आय सुरक्षा और एमएसपी को लेकर कोई ठोस व स्थायी नीति नहीं बनातीं, तब तक किसानों का यह संघर्ष जारी रहेगा.
पराली जलाने पर कैसे भिड़ गए किसान नेता
पंजाब किसान मोर्चा के उपाध्यक्ष सुखवंत सिंह टिल्लू ने पराली जलाने को लेकर किसानों और किसान यूनियनों की कार्यशैली पर सवाल उठाए. टिल्लू ने कहा कि आज का किसान लेबर पर पूरी तरह निर्भर हो गया है और मेहनत से बचकर 'आसानी' (इजी वे) से काम निपटाने के लिए खेतों में आग लगा देता है.
उन्होंने कहा कि किसान यूनियनों को सिर्फ आंदोलन करने के बजाय गांवों में जाकर किसानों और युवाओं को जागरूक करना चाहिए. उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार की किसान सम्मान निधि जैसी योजनाओं का लाभ किसान लेते हैं. अब तो पराली उठाने के पैसे भी मिल रहे हैं और मशीनों पर सब्सिडी भी उपलब्ध है, ऐसे में आग लगाना तर्कसंगत नहीं है.
वहीं, सुखवंत सिंह टिल्लू के बयानों पर पलटवार करते हुए भारतीय किसान यूनियन के महासचिव हरिंदर सिंह लखोवाल ने सारा दोष एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी और मशीनों की लागत पर मढ़ दिया. लखोवाल ने कहा कि 1990 के दशक में कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी और पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी (PAU) ने ही कटर से धान काटकर फंगस खत्म करने के लिए आग लगाने की सलाह दी थी. किसानों ने वही तरीका अपनाया, लेकिन अब वही संस्थान उल्टा बोल रहे हैं.
उन्होंने तर्क दिया कि 50% सब्सिडी के बाद भी पराली प्रबंधन के उपकरण इतने महंगे हैं कि छोटे किसान उन्हें नहीं खरीद सकते. जो मशीन साल में सिर्फ 20 दिन चलती है, उसका सालभर ब्याज चुकाना पड़ता है. उन्होंने दावा किया कि पंजाब में आग लगाने की घटनाओं में 80% तक कमी आई है, फिर भी दिल्ली और एनसीआर के प्रदूषण का ठीकरा पंजाब के किसानों पर ही फोड़ा जाता है.
पराली के लिए सरकार सब्सिडी दे- सरवण सिंह पंधेर
किसान मजदूर संघर्ष कमेटी के नेता सरवण सिंह पंधेर ने पराली न जलाने के लिए सीधे आर्थिक मदद (कैश सब्सिडी) की मांग रखी. पंधेर ने कहा कि पंजाब के छोटे किसानों के पास भारी-भरकम ट्रैक्टर या साधन नहीं हैं. सरकार को पराली प्रबंधन के लिए प्रति एकड़ 3,000 रुपये की डायरेक्ट सब्सिडी देनी चाहिए.
उन्होंने कहा कि जब बाढ़ या अन्य वजहों से फसलें खराब हुईं, तब किसी सरकार ने मदद नहीं की. जब तक किसानों को सीधा वित्तीय सहयोग नहीं मिलेगा, तब तक मजबूरी में आग लगाने की घटनाएं पूरी तरह बंद नहीं हो सकतीं.
गिरते भूजल और ग्लोबल वार्मिंग पर भी चिंता जताई
मंच पर किसान नेताओं ने फसलों के विविधीकरण (Crop Diversification) और घटते भूजल पर भी बात की. पंधेर और लखोवाल ने कहा कि इस बार पड़ रही भीषण गर्मी और ग्लोबल वार्मिंग के कारण धान की पैदावार प्रति एकड़ 33 क्विंटल से घटकर 30 क्विंटल से भी कम रह गई है. उन्होंने कहा कि धरती के पानी और पंजाब के भविष्य को बचाने के लिए एग्रो-इंडस्ट्री और नई तकनीकों को बढ़ावा देना ही एकमात्र स्थायी विकल्प है.
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