डिलीवरी पार्टनर हो या फिर बाइक राइडर एक सवाल हर किसी के मन में रहता है. अगर हम अपनी बाइक की बजाय किराये की बाइक का इस्तेमाल करें, तो खर्च ज्यादा होगा या कम. डिलीवरी के लिए अपनी बाइक का इस्तेमाल करना या किराये की बाइक लेना, दोनों के अपने फायदे और खर्च हैं.
लंबी अवधि में आमतौर पर अपनी बाइक से ज्यादा बचत होती है, लेकिन अगर आपके पास एक साथ बाइक खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं, तो शुरुआत के लिए किराये की बाइक भी एक अच्छा विकल्प हो सकती है.
असल फैसला इस बात पर निर्भर करता है कि आपके पास पहले से गाड़ी है या नहीं, आप फुल-टाइम काम करना चाहते हैं या कुछ समय के लिए, और आप हर महीने तय किराया देना चाहते हैं या पेट्रोल, चार्जिंग और मेंटेनेंस का खर्च खुद उठाना चाहते हैं.
क्लिक करें: डिलीवरी बॉय बनकर बदली फैमिली की किस्मत, खोला बिजनेस, हज़ारों में कमाई
अपनी बाइक में लॉन्ग टर्म फायदा
इसे इस तरह से समझिए कि अगर आपके पास पहले से खुद की पेट्रोल या इलेक्ट्रिक बाइक है, तो उसका सबसे बड़ा फायदा ये है कि आपको हर महीने या हर हफ्ते किसी को किराया नहीं देना पड़ता. पेट्रोल, चार्जिंग और मेंटेनेंस का खर्च निकालने के बाद जो कमाई बचेगी, वह पूरी आपकी होगी. गाड़ी आपकी ही रहती है. लेकिन इसके साथ सर्विस, तेल बदलना, टायर और रिपेयरिंग का खर्च आपको ही उठाना होगा. पेट्रोल बाइक में माइलेज कम होने पर ईंधन का खर्च बढ़ सकता है. इंश्योरेंस, पीयूसी और आरसी की जिम्मेदारी भी आपकी होगी.
किराये की बाइक में देनी होती है फीस
वहीं किराये की बाइक या ई-बाइक का विकल्प भी कई डिलीवरी पार्टनर्स के लिए उपयोगी हो सकता है. स्विगी, जोमैटो और जेप्टो जैसी कंपनियां अक्सर डिलीवरी पार्टनर्स को किराए पर बाइक या ई-बाइक लेने का विकल्प या थर्ड-पार्टी वेंडर्स से कनेक्शन देती हैं. इसका फायदा यह है कि बिना भारी निवेश के काम शुरू किया जा सकता है.
अगर आपके पास खुद की गाड़ी या ड्राइविंग लाइसेंस नहीं है, जैसे साइकिल या इलेक्ट्रिक साइकिल के मामले में, तब भी काम शुरू किया जा सकता है. ज्यादातर किराए की ई-बाइक में कंपनी ही मेंटेनेंस, बैटरी स्वाइपिंग और सर्विसिंग की जिम्मेदारी लेती है. अगर किराए पर इलेक्ट्रिक बाइक ली जाए, तो पेट्रोल का खर्च बहुत कम या शून्य हो जाता है.
हालांकि किराये की बाइक के साथ तय खर्च जुड़ा रहता है. आपको ₹2,500 से ₹4,500 प्रति महीना, या साप्ताहिक किराया, देना ही पड़ता है, चाहे आप काम करें या न करें. हर महीने का एक निश्चित हिस्सा किराए में चला जाता है, जिससे कुल बचत सीमित हो जाती है.
पेट्रोल बनाम ईवी बाइक का भी चक्कर
दोनों विकल्पों की तुलना में अपनी बाइक के लिए शुरुआती लागत ज्यादा होती है, क्योंकि खरीदने या ईएमआई के लिए ज्यादा पैसे चाहिए. वहीं किराये की बाइक में शुरुआती लागत बहुत कम होती है और कई मामलों में केवल सिक्योरिटी डिपॉजिट देना पड़ता है. अपनी बाइक में नियमित खर्च पेट्रोल, चार्जिंग और मेंटेनेंस का होता है, जबकि किराये की बाइक में तय हफ्ता या महीना किराया देना होता है.
ईंधन या चार्जिंग के मामले में पेट्रोल बाइक पर खर्च ज्यादा हो सकता है, जबकि ईवी में यह कम रहता है. किराये की ईवी होने पर यह खर्च बहुत कम हो जाता है. मेंटेनेंस की जिम्मेदारी अपनी बाइक में पूरी तरह आपकी होती है, जबकि किराये की ई-बाइक में ज्यादातर कंपनी की होती है. कुल बचत के मामले में अपनी बाइक लंबी अवधि में ज्यादा फायदेमंद मानी गई है, जबकि किराये की बाइक शुरुआती समय के लिए ठीक है, लेकिन बचत कम रहती है.
उदाहरण के लिए दिल्ली-एनसीआर जैसे इलाके में किराये की बाइक मिलना आसान तो है, लेकिन ये आपके लिए महंगा भी साबित हो सकता है. क्यूंकि एक दिन का किराया 150 से 250 रुपये तक हो सकता है. ऐसे में फिर आपका गोल चेंज हो जाता है, क्यूंकि सिर्फ बाइक का किराया ही नहीं बल्कि प्लेटफॉर्म भी अपनी ओर से कुछ पेआउट काटता है. ऐसे में आपकी जेब में काफी कम ही पैसा बचेगा, जो आपके लिए फायदेमंद नहीं है.
aajtak.in