जातिगत भेदभाव रोकने के UGC नियमों पर टली सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, 4 हफ्ते बाद फिर होगी जिरह

इस पर संज्ञान लेते हुए शीर्ष अदालत ने स्पष्ट आदेश दिया कि UGC पहले अपना जवाब याचिकाकर्ताओं को सौंपे, ताकि वे उसका अध्ययन कर सकें. अब इस मामले की अगली सुनवाई 4 हफ्ते बाद होगी. गौरतलब है कि इससे पहले हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने UGC के इन नए नियमों के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगाते हुए केंद्र और यूजीसी से जवाब तलब किया था.

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उच्च शिक्षा संस्थानों के नए नियमों पर सुनवाई टली, जानिए क्यों लगी है अंतरिम रोक? (File Photo- PTI) उच्च शिक्षा संस्थानों के नए नियमों पर सुनवाई टली, जानिए क्यों लगी है अंतरिम रोक? (File Photo- PTI)

संजय शर्मा

  • नई दिल्ली ,
  • 20 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 3:48 PM IST

देश के उच्च शिक्षण संस्थानों (यूनिवर्सिटी और कॉलेजों) में जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा बनाए गए नए नियमों को लेकर कानूनी जंग जारी है. इन नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर आज देश की सुप्रीम कोर्ट  में होने वाली सुनवाई टल गई है.

सुप्रीम कोर्ट ने अब इस मामले को 4 हफ्ते के लिए स्थगित कर दिया है. अदालत ने यूजीसी को अपना हलफनामा (जवाब) दाखिल करने और उसकी एक-एक प्रति सभी याचिकाकर्ताओं को सौंपने का निर्देश दिया है.

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क्यों टली आज की सुनवाई?
अदालत में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से यह शिकायत दर्ज कराई गई कि केंद्र सरकार और UGC की तरफ से दाखिल किए गए जवाब की कॉपी उन्हें अभी तक मुहैया नहीं कराई गई है.

इस पर संज्ञान लेते हुए शीर्ष अदालत ने स्पष्ट आदेश दिया कि यूजीसी पहले अपना जवाब याचिकाकर्ताओं को सौंपे, ताकि वे उसका अध्ययन कर सकें. अब इस मामले की अगली सुनवाई 4 हफ्ते बाद होगी. गौरतलब है कि इससे पहले हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने UGC के इन नए नियमों के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगाते हुए केंद्र और यूजीसी से जवाब तलब किया था.

क्या है विवाद और नियम 3(C) पर क्यों मचा है बवाल?

यूजीसी ने उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने और भेदभाव को खत्म करने के उद्देश्य से 13 जनवरी 2026 को नए नियम अधिसूचित किए थे. हालांकि, इन नियमों के लागू होते ही इसका विरोध शुरू हो गया. याचिकाओं में सबसे ज्यादा आपत्ति UGC के नियम 2026 के प्रावधान 3(C) पर जताई गई है. याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि यह प्रावधान पूरी तरह से मनमाना और भेदभावपूर्ण है.

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याचिका में दावा किया गया है कि यह नियम संविधान द्वारा नागरिकों को दिए गए समानता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों का हनन करता है. याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह नया प्रावधान विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम, 1956 की मूल भावना के खिलाफ है और इससे कुछ वर्गों के छात्रों को उच्च शिक्षा के समान अवसरों से वंचित होना पड़ सकता है.

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