NCERT: क्लास 8 बुक में 'न्यायपालिका में भ्रष्टाचार' लिखने वाले प्रोफेसरों ने मांगी सुनवाई, बताया करियर का संकट

सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी के बाद सार्वजनिक संस्थानों से बाहर किए गए तीन प्रोफेसरों ने रखा अपना पक्ष. कहा- हमें बिना सुने की गई कार्रवाई से करियर पर बुरा असर पड़ रहा है. उन्होंने कोर्ट के सामने अपनी सुनवाई करने की गुहार लगाई है.

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सृष्टि ओझा

  • नई दिल्ली,
  • 07 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 1:14 PM IST

देश की सबसे बड़ी अदालत और NCERT के बीच 'न्यायपालिका में भ्रष्टाचार' अध्याय को लेकर चल रहा विवाद एक बार फिर गर्मा गया है. इस चैप्टर को तैयार करने वाले तीन शिक्षाविदों ने अब सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. इन प्रोफेसरों ने अदालत से अनुरोध किया है कि उन्हें 'ब्लैकलिस्ट' करने या भविष्य के प्रोजेक्ट्स से बाहर करने से पहले उनका पक्ष सुना जाए.

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क्या है पूरा मामला?
इसी साल फरवरी में, सुप्रीम कोर्ट ने कक्षा 8 की NCERT सोशल साइंस की किताब के एक अध्याय पर कड़ी नाराजगी जताई थी. इस चैप्टर में न्यायपालिका के भीतर भ्रष्टाचार का संदर्भ दिया गया था. उस समय कोर्ट ने इसे बेहद गंभीर माना था और इस सामग्री को तैयार करने में शामिल शिक्षाविदों के खिलाफ सख्त टिप्पणी की थी.

अदालत ने आदेश दिया था कि इन शिक्षाविदों को भविष्य में किसी भी सार्वजनिक संस्थान के शैक्षणिक प्रोजेक्ट्स से न जोड़ा जाए. सरल भाषा में कहें तो उन्हें सरकारी शैक्षणिक कार्यों के लिए 'ब्लैकलिस्ट' कर दिया गया था.

शिक्षाविदों का पक्ष: 'करियर पर लगा दाग'
अब इन तीनों शिक्षाविदों ने सुप्रीम कोर्ट में आवेदन दाखिल कर अपना रुख साफ करने की अनुमति मांगी है. उनकी दलीलें निम्नलिखित हैं:

सुनवाई का मौका नहीं: आवेदकों का कहना है कि कोर्ट ने उनके खिलाफ इतनी सख्त टिप्पणी और कार्रवाई बिना उनका पक्ष सुने ही कर दी.

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करियर को नुकसान: उन्होंने अदालत को बताया कि सुप्रीम कोर्ट की उन टिप्पणियों और 'ब्लैकलिस्ट' किए जाने के आदेश से उनके पेशेवर सम्मान और करियर को अपूरणीय क्षति (Prejudice) हुई है.

पक्ष रखने की मांग: शिक्षाविदों ने कोर्ट से आग्रह किया है कि उन्हें अपनी बात रखने का एक मौका दिया जाए ताकि वे स्पष्ट कर सकें कि उक्त अध्याय को लिखने के पीछे उनका शैक्षणिक उद्देश्य क्या था.

सुप्रीम कोर्ट की पिछली नाराजगी
फरवरी में सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने कहा था कि स्कूल की किताबों में इस तरह के संदर्भ बच्चों के मन में न्यायपालिका के प्रति गलत धारणा पैदा कर सकते हैं. कोर्ट ने NCERT की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए थे कि आखिर ऐसी सामग्री बिना उचित जांच-परख के प्रकाशित कैसे हो गई.

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