हर साल देश के कोने-कोने, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश के छोटे-छोटे कस्बों से हजारों लड़कियां अपने सपनों की गठरी बांधकर दिल्ली-नोएडा की तरफ रुख करती हैं. घर से निकलते वक्त उनकी आंखों में अफसर, डिजाइनर, मॉडल या अपने पैरों पर खड़े होने की चमक होती है, और ठिकाना बनता है, दिल्ली या नोएडा का कोई बेजान पीजी (पेइंग गेस्ट) रूम. हाल ही में सत्यनिकेतन की घटना ने पीजी के लिए दिए जाने वाले ज्यादातर इमारतो की हालत देश के सामने ला दी.
अक्सर पीजी के इन रूम्स मे रहने वालोंं को शहर की चकाचौंध में अपने आशियाने में रहने वाले लोग समझ भी नहीं पाते. उनके क्या दुख हैं, वो क्यों अपने घरों की सुविधाएं और अपनों को छोड़कर यहां रह रहे हैं. समझ की इसी खाईं को पाटने के लिए हमने दिल्ली एनसीआर के अलग-अलग पीजी में रह रही चार लड़कियों के अनुभवों को टटोला, तो जो हकीकत निकलकर सामने आई, वह सिर्फ उनकी नहीं बल्कि मेट्रो शहरों में संघर्ष कर रही हर बेटी की दास्तान है.
बाहर से देखने वालों को ये भी लगता है कि ये लड़कियां बड़े शहर में आकर सिर्फ पढ़ाई कर रही हैं या 'आजाद' हो गई हैं. लेकिन सच यह है कि यह शहर उनसे सिर्फ मेहनत नहीं मांगता, यह उनकी सोच का दायरा बदलता है, उन्हें मन से सख्त बनाता है, उनके पहनावे से लेकर उनकी सोच तक का कायाकल्प कर देता है... और इस पूरी प्रक्रिया के बदले वसूलता है एक भारी कीमत जिसमें अकेलापन, हादसों और असुरक्षा का दर्द सबसे बड़ा है. आइए जानें इन बेटियों की कहानी...
17 साल की उम्र, रूममेट की खुदकुशी का खौफ...
बिहार की श्रेया अपने माता-पिता की इकलौती बेटी है. परिवार का सहारा बनने की चाह में जब वह महज 17 साल की उम्र में दिल्ली आई, तो उसे अंदाजा भी नहीं था कि बड़े शहर का पहला तमाचा कितना खौफनाक होगा. वो नोएडा के एक फ्लैट में रह रही थीं जहां साथ में उसकी रूममेट थी. जिससे हर वक्त कनेक्ट रहना होता था. वो परेशान थी और एक दिन रूममेट ने आत्महत्या कर ली. 17 साल की एक बच्ची, जो कल तक अपने घर की चारदीवारी में महफूज थी, उसके जेहन में अपनी रूमी के लटकते शरीर और सहमी हुई खामोशी का खौफ इस कदर बैठ गया कि हफ्तों तक उसे हर कोने में अपनी उस मासूम की लाश दिखती रही.
इस मानसिक सदमे से जैसे-तैसे उबरकर वह पीजी शिफ्ट हुई तो वहां चोरी हो गई. मकान मालिक ने मदद करने से साफ मना कर दिया. फिर एक रात कॉलेज से लौटते वक्त रास्ते में मनचलों की भद्दी टिप्पणियों और अपनी बिहारी भाषा को लेकर मिले तानों ने उसे तोड़कर रख दिया. यह भयावह दौर श्रेया के लिए जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट बना. जिस लड़की ने कभी अकेलापन नहीं देखा था, उसने इन हादसों से लड़कर खुद को मानसिक रूप से लोहे जैसा मजबूत बनाया. उसने सीखा कि बड़े शहर में अगर सर्वाइव करना है, तो आंसुओं को अपनी कमजोरी नहीं, ढाल बनाना होगा.
'कपड़ों से जज करने वाली सोच' को बदला
इंदौर की दिव्या एक निडर लड़की है. अपने शहर में वह बेझिझक रात के वक्त भी मॉडलिंग किया करती थी. लेकिन वो भी दिल्ली एनसीआर में आकर पढ़ाई और करियर का तालमेल बिठाने के चक्कर में उसे अपना मॉडलिंग का जुनून छोड़ना पड़ा. दिव्या बताती है कि इंदौर में वह खुद को जितना सुरक्षित महसूस करती थी, नोएडा का माहौल उतना ही असहज करने वाला है. यहां की घूरती नजरें, कपड़ों और काम के आधार पर जज करने की लोगों की मानसिकता ने उसे हर पल सतर्क रहना सिखाया.
दिव्या की कहानी दिखाती है कि कैसे एक छोटा शहर किसी लड़की को उड़ने के लिए पंख देता है, लेकिन बड़ा महानगर उसे यथार्थ की जमीन पर उतारकर परिस्थितियों के हिसाब से ढलना सिखाता है. दिव्या ने अपने लुक्स और एटीट्यूड को अब एक ऐसी सुरक्षा परत बना लिया है, जिसे कोई आसानी से भेद नहीं सकता.
'जब बीमारी में पानी देने वाला भी कोई न हो'
इंदौर की ही शताक्षी घर की इकलौती बेटी हैं. परिवार चाहता था कि वह डॉक्टर या इंजीनियर बने, लेकिन उसकी जिद थी फैशन डिजाइनर बनने की. घरवालों को मनाकर जब वह पहली बार अकेली घर से बाहर निकली, तो बड़े शहर ने उसकी पूरी पर्सनैलिटी ही बदल दी. जो शताक्षी कभी बेहद साधारण और कम बोलने वाली थी, नोएडा आकर उसने खुद को प्रेजेंट करना सीखा, मेकअप और ड्रेसिंग सेंस सीखा और उसका आत्मविश्वास बढ़ा. लेकिन इस 'ग्लैमरस आजादी' की काली सच्चाई तब सामने आई जब वह पहली बार पीजी में गंभीर रूप से बीमार पड़ी.
जब तेज बुखार में उठकर दवा लेने की हिम्मत न हो और पूछने वाला कोई न रहे, तब शताक्षी को समझ आया कि घर पर मां-बाप की जिन बातों को वह 'रोक-टोक' समझती थी, वह असल में उनका कवच था. इस अकेलेपन ने उसे मैच्योर बनाया और सिखाया कि जब कोई आपके साथ खड़ा न हो, तब आपको खुद अपने पैर टिकाने होते हैं.
सोचने का नजरिया ही बदल गया
झारखंड के जमशेदपुर में एक बड़े संयुक्त परिवार की लाडली रही अनन्या के लिए नोएडा का पहला दिन कल्चरल शॉक जैसा था. तेज गाड़ियां, ऊंची इमारतें और अपनों की कमी.
वो बाताती है कि कैसे जमशेदपुर में रहते हुए किसी लड़की को अगर सिगरेट या शराब पीते देखती थी, तो अनजाने में उसे 'जज' करने लगती थी. लेकिन दिल्ली एनसीआर के पीजी और कॉलेज कल्चर ने उसकी सोच की खिड़कियां खोल दीं. आज उसने दूसरों को जज करना पूरी तरह बंद कर दिया है. उसने सीखा कि हर किसी की अपनी पसंद और जिंदगी जीने का तरीका होता है हालांकि, उसने खुद को इन चीजों से दूर रखकर अपनी हेल्थ और परिवार के वैल्यूज के मुताबिक सीमा भी तय कर रखी है.
अनन्या की कहानी यह साबित करती है कि बड़े शहर सिर्फ आपको अकेला नहीं करते, बल्कि आपकी सोच को उदार बनाते हैं. वह आज भी जमशेदपुर के अपने परिवार से बेहद प्यार करती है, लेकिन अब वह एक सीधी-सादी बच्ची नहीं, बल्कि दुनिया को समझने वाली एक समझदार युवा बन चुकी है.
सपनों की कीमत और एक नए वजूद का जन्म
श्रेया के भयावह हादसों से लेकर शताक्षी के बदलते लुक्स, दिव्या के करियर समझौते और अनन्या की बदलती सोच तक, इससे साफ है कि नोएडा जैसे शहर में देश भर से आने वाली बेटियां सिर्फ डिग्री या नौकरी हासिल नहीं कर रहीं.
वे रोज सुबह अपने-अपने पीजी के छोटे कमरों से निकलती हैं, अपने-अपने डर का सामना करती हैं और हर दिन एक नया अनुभव हासिल करके खुद को गढ़ती हैं. यह सफर आसान भले न हो, लेकिन ये ही वे कड़वे अनुभव हैं जो छोटे शहरों की सीधी-सादी लड़कियों को आज की निडर, आत्मनिर्भर और सशक्त महिलाएं बनाते हैं.
आजतक एजुकेशन डेस्क