उत्तराखंड में नीट-यूजी काउंसलिंग के दौरान स्थायी निवास और स्वतंत्रता सेनानी आश्रित प्रमाणपत्रों के कथित दुरुपयोग का मामला हाईकोर्ट पहुंच गया है. नेशनल पब्लिक सर्विस ट्रस्ट ने इस संबंध में जनहित याचिका दायर कर राज्य गठन से अब तक जारी किए गए ऐसे प्रमाणपत्रों और उनके आधार पर लिए गए लाभों की केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) से जांच कराने की मांग की है.
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के एक्टिंग चीफ जस्टिस मनोज तिवारी और जस्टिस सुभाष उपाध्याय ने राज्य सरकार से कड़ी नाराजगी जताते हुए 24 घंटे के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि सरकार निर्धारित समय में जवाब नहीं देती है, तो उसे गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं और अदालत इस मामले में सीधे निर्देश जारी कर सकती है.
कोर्ट ने पूछा- स्वतंत्रता सेनानी कुछ ही बच्चे हैं, बेतहाशा आरक्षण कैसे?
अदालत ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि उत्तराखंड में स्वतंत्रता सेनानियों की सीमित संख्या के बावजूद उनके नाम पर बड़ी संख्या में लोग लाभ उठा रहे हैं. कोर्ट ने सवाल उठाया कि अब तक स्वतंत्रता सेनानी आश्रित प्रमाणपत्रों की जांच और स्क्रीनिंग क्यों नहीं की गई. अदालत ने साफ किया कि केवल वास्तविक आश्रितों को ही यह सुविधा मिलनी चाहिए. ऐसे में राज्य सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि प्रदेश में कुल कितने स्वतंत्रता सेनानी हैं, उनके कितने पात्र आश्रित हैं और अब तक जारी प्रमाणपत्रों के आधार पर किन लोगों ने लाभ प्राप्त किया है. साथ ही, अधिकारियों की भूमिका की पूरी जांच कर 24 घंटे के भीतर जानकारी देने को कहा गया है.
कैसे खुला पूरा केस
इस प्रकरण की शुरुआत नीट-यूजी काउंसलिंग के दौरान आरक्षण संबंधी प्रमाणपत्रों में गड़बड़ियों की शिकायतों से हुई थी. शिकायतकर्ता प्रदीप बहुगुणा ने चिकित्सा शिक्षा मंत्री सुबोध उनियाल को लगभग 350 अभ्यर्थियों की सूची सौंपकर दस्तावेजों की जांच की मांग की थी.
इसके बाद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर जांच का दायरा केवल स्वतंत्रता सेनानी आश्रित प्रमाणपत्रों तक सीमित न रखते हुए स्थायी निवास, जाति और अन्य आरक्षण श्रेणियों के दस्तावेजों तक बढ़ा दिया गया. चिकित्सा शिक्षा मंत्री ने देहरादून के जिलाधिकारी को एक सप्ताह के भीतर रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए थे.
एसआईटी जांच और गिरफ्तारियां
मामले की जांच के लिए देहरादून पुलिस ने एसपी ग्रामीण जया बलूनी के नेतृत्व में सात सदस्यीय विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया. पुलिस ने रायपुर, क्लेमेंट टाउन और वसंत विहार थानों में तीन एफआईआर दर्ज कीं. इनमें कुछ अभ्यर्थियों और उनके परिजनों के खिलाफ फर्जी दस्तावेजों के आधार पर मेडिकल दाखिला लेने के आरोप हैं. सितंबर के अंत तक इस मामले में गिरफ्तार आरोपियों की संख्या पांच तक पहुंच चुकी थी.
जांच के दौरान प्रमाणपत्र जारी करने और सत्यापन की प्रक्रिया पर भी बड़े सवाल उठे. देहरादून और ऊधमसिंह नगर जिलों में चार राजस्व अधिकारियों/उपनिरीक्षकों को कथित लापरवाही के आरोप में निलंबित किया गया. आरोप है कि कई मामलों में आवश्यक दस्तावेजों की समुचित जांच किए बिना ही प्रमाणपत्रों का सत्यापन कर दिया गया. इसके अलावा, देहरादून में अनियमितताएं मिलने पर चार कॉमन सर्विस सेंटर सील कर उनके कंप्यूटर और लैपटॉप भी जब्त किए गए.
मेडिकल दाखिले हुए रद्द
इस पूरी कार्रवाई का सबसे बड़ा असर मेडिकल दाखिलों पर पड़ा. हेमवती नंदन बहुगुणा उत्तराखंड चिकित्सा शिक्षा विश्वविद्यालय ने संदिग्ध प्रमाणपत्रों के सत्यापन के बाद एमबीबीएस सीटों का आवंटन रद्द करना शुरू कर दिया. मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, 30 सितंबर तक 19 दाखिले रद्द किए जा चुके थे, जो 7 अक्टूबर तक बढ़कर 20 हो गए.
अंकित शर्मा