झारखंड की राजनीति में 'सोरेन परिवार' और 'गुरुजी' (शिबू सोरेन) का नाम केवल एक नेता का नहीं, बल्कि जल-जंगल-जमीन और स्वाभिमान के उस लंबे संघर्ष का प्रतीक है, जिसे देखकर इस राज्य की पीढ़ियां बड़ी हुई हैं. लेकिन आज वही झारखंड एक अजीब और ऐतिहासिक दोराहे पर खड़ा है.
रांची की सड़कों पर उतरा युवाओं का सैलाब एक तरफ मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के ढुलमुल रवैये के खिलाफ सीधी जंग लड़ रहा है, तो दूसरी तरफ वही छात्र दिशोम गुरु शिबू सोरेन के कटआउट पर फूल चढ़ाकर और महात्मा गांधी के नारों की तख्तियां लेकर अपना सत्याग्रह चला रहे हैं. आखिर यह कैसा विरोधाभास है? क्यों छात्र मुख्यमंत्री से पंगा लेते-लेते उनके ही पिता का नाम लेकर न्याय की गुहार लगा रहे हैं?
पिता का 'आदर्श' बनाम बेटे की 'सत्ता'
रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम से लेकर धुर्वा तक, छात्रों ने गुरुजी शिबू सोरेन के बड़े-बड़े कटआउट लगा रखे हैं. प्रदर्शनकारी छात्र कटआउट के आगे नतमस्तक होकर गुहार लगा रहे हैं कि गुरुजी, आपने जिस झारखंड को शोषण और धांधली के खिलाफ लड़कर बनाया था, आज उसी राज्य में आपके बेटे के राज में युवाओं के सपनों का सौदा हो रहा है. छात्रों का यह कदम कोई याददाश्त का हिस्सा नहीं, बल्कि एक बेहद सोचा-समझा भावनात्मक और नैतिक दबाव है.
'दिशोम गुरु' का सिद्धांत, समझिए इतिहास
शिबू सोरेन ने महाजनों और व्यवस्था के भ्रष्टाचार के खिलाफ जीवन भर लड़ाई लड़ी. छात्र हेमंत सोरेन को यह याद दिलाना चाहते हैं कि वे जिस विरासत की कुर्सी पर बैठे हैं, उसका मूल तत्व 'अन्याय के खिलाफ खड़ा होना' था. वहीं बेटे (सीएम हेमंत) को सीधे कटघरे में खड़ा करने के बजाय उनके पिता की तस्वीर आगे करके छात्र संदेश दे रहे हैं कि हम आपकी सोरेन विरासत के खिलाफ नहीं हैं, हम उस तंत्र के खिलाफ हैं जिसे आप शह दे रहे हैं.
गांधीवादी सत्याग्रह: हिंसा के ठप्पे से खुद को बचाने की रणनीति
जब-जब कोई बड़ा युवा आंदोलन होता है, तो सत्ताधारी पक्ष अक्सर उस पर 'अराजक', 'उपद्रवी' या 'राजनीतिक रूप से प्रायोजित' होने का ठप्पा लगा देता है. इसी टैग से बचने के लिए छात्रों ने पूरी तरह से महात्मा गांधी के 'अहिंसा' और 'सत्याग्रह' के रास्ते को अपनाया है. धरना स्थल पर छात्रों ने गांधीवादी नियमों का बोर्ड लगा रखा है, न गाली-गलौज, न पत्थरबाज़ी, न किसी राजनीतिक दल का झंडा.
बता दें कि 17 दिनों के धरने, भूख हड़ताल और आज वाटर कैनन की बौछारों के बीच भी छात्रों ने जब हिंसक रुख नहीं अपनाया, तो प्रशासन के पास लाठीचार्ज या बल प्रयोग का कोई नैतिक आधार नहीं बचा. छात्र जानते हैं कि जैसे ही एक पत्थर चलेगा, उनका 4-4 साल की मेहनत का मुद्दा 'लॉ एंड ऑर्डर' की डिबेट में दब जाएगा. इसीलिए वे गांधी के सिद्धांतों का ढाल की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं.
जानिए अभी जमीन पर क्या हो रहा है?
एक तरफ जहां छात्र 'दिशोम गुरु' के सिद्धांतों का आइना दिखाकर सत्ता को चेता रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ विधानसभा की ओर बढ़ रहा यह 'सत्याग्रह मार्च' इस वक्त धुर्वा मोड़ पर बेहद नाजुक और निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है:
पुराने विधानसभा चौक और जगन्नाथपुर मंदिर मार्ग पर लगाई गई 3-लेयर बैरिकेडिंग और कटीले तारों के पास हजारों छात्र पहुंच चुके हैं. छात्रों ने आपस में हाथ मिलाकर एक विशाल मानव श्रृंखला बना ली है और शांतिपूर्ण तरीके से वहीं सड़क पर बैठ गए हैं. सरकार की ओर से जेपीएससी के तीनों सदस्यों के इस्तीफे और सीआईडी/ईडी जांच के बड़े-बड़े दावों के बावजूद छात्रों की मांग बिल्कुल साफ है. रवींद्र पासवान और पीयूष कुमार जैसे छात्र नेताओं का लाइव बयान आया है कि JSSC-CGL परीक्षा तुरंत रद्द हो और पूरी धांधली की सीबीआई (CBI) जाँच हो, इससे कम पर हम एक कदम पीछे नहीं हटेंगे.
वहीं विधानसभा परिसर के 750 मीटर के दायरे में बीएनएसएस (BNSS) की धारा 163 लागू है. भारी संख्या में झारखंड सशस्त्र पुलिस (JAP) और पैरामिलिट्री की तैनाती है. लेकिन छात्र नेताओं के 300-400 वॉलंटियर्स खुद भीड़ को अनुशासित रखे हुए हैं, ताकि कोई उपद्रवी या बाहरी तत्व आंदोलन की गरिमा को नुकसान न पहुंचा सके.
साफ है कि दिशोम गुरु शिबू सोरेन के स्वाभिमान की कसम खाकर घर से निकले ये युवा आज सड़कों पर बैठकर अपनी आखिरी लड़ाई लड़ रहे हैं जहां न कोई लाठी का डर है, न वाटर कैनन का खौफ, सिर्फ और सिर्फ 'पारदर्शी भविष्य' का अटूट ज़िद है.
मानसी मिश्रा