'मेरी उम्र अब 40 साल होने जा रही है. साल 2011 में बीएड किया था, 20 साल से सिर्फ एक सरकारी नौकरी की आस में तैयारी कर रहा हूं. हाई स्कूल टीजीटी परीक्षा में मेरे 172 नंबर आए, लेकिन 152 नंबर वाले का सिलेक्शन हो गया और मैं आज भी सड़कों पर आंदोलन कर रहा हूं...'
यह किसी एक युवा का गुस्सा नहीं, बल्कि रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में जेपीएससी (JPSC) और जेएसएससी (JSSC) में हुई धांधली के खिलाफ भूख हड़ताल पर बैठे राहुल क्रांति कुमार का वो दर्द है, जो इस पूरे सिस्टम की पोल खोलता है.
किसान का बेटा, 33 में शादी का दबाव... और ट्यूशन के सहारे जिंदगी
अपनी पर्सनल लाइफ पर बात करते हुए राहुल बताते हैं कि वे एक साधारण किसान परिवार से आते हैं. घर में कोई बड़ा आर्थिक सहारा नहीं था. ग्रेजुएशन के बाद 20 साल की उम्र से तैयारी शुरू की थी. आज 40 के हो गए, लेकिन हाथ में एक पक्की नौकरी नहीं है. वो बताते हैं कि परिवार के दबाव में 33 की उम्र में शादी तो कर ली. अब बच्चों को ट्यूशन और कोचिंग पढ़ाकर किसी तरह घर का खर्च चलाता हूं और रात में बैठकर JPSC की तैयारी करता हूं.
कम नंबर वाले को नौकरी?
राहुल का कहना है कि जब कम नंबर वाले का सिलेक्शन हुआ तो मैं हाईकोर्ट गया. कोर्ट ने मेरे पक्ष में फैसला दिया, लेकिन JSSC मुझे नौकरी देने के बजाय डबल बेंच में चली गई. एक आम छात्र सरकार से कैसे लड़े? राहुल ने परीक्षा प्रणाली के एक बड़े पैटर्न पर सवाल उठाया. उन्होंने बताया कि सहायक आचार्य परीक्षा में 26,000 पदों का विज्ञापन आया था, लेकिन किस्तों में नियुक्ति पत्र बांटे जा रहे हैं.
वो कहते हैं कि कभी 2000, कभी 3000 तो कभी 500 लोगों को नियुक्ति दी जाती है. अभी भी 4,000 पद खाली हैं जबकि अभ्यर्थी क्वालीफाई हैं. हमें तो शक है कि जितने लोगों से 'सेटिंग' होती है, उतने ही लोगों को किस्तों में लिफाफा थमा दिया जाता है. राहुल का कहना है कि जब झारखंड के मूलवासी दिन-रात पढ़कर भी फेल हो रहे हैं और बाहरी लोग पास हो रहे हैं, तो साफ है कि OMR शीट का खेल हुआ है. तंग आकर अब वे अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठ चुके हैं.
मानसी मिश्रा