देश के सबसे होनहार और टॉप-रैंक वाले युवा डॉक्टरों के बीच अपने पीजी (पोस्ट ग्रेजुएट) करियर को लेकर सोच में एक गहरा और बड़ा बदलाव देखा जा रहा है. भारत के सबसे होनहार मेडिकल ग्रेजुएट्स के बीच जनरल मेडिसिन ने रेडियोडायग्नोसिस या रेडियोलॉजी को बड़े अंतर से पछाड़कर पहली पसंद के रूप में अपनी जगह बना ली है.
राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा-स्नातकोत्तर (NEET-PG) 2026 के ऑलॉटमेंट के पहले चरण में, टॉप 100 रैंक लाने वाले 51 डॉक्टरों ने जनरल मेडिसin को चुना, जबकि रेडियोलॉजी को चुनने वाले अभ्यर्थियों की संख्या घटकर सिर्फ 28 रह गई.
यह बदलाव न तो अचानक हुआ है और न ही यह रेडियोलॉजी को सिरे से खारिज करने जैसा है. यह इस बात का संकेत है कि देश के सबसे प्रतिभावान युवा डॉक्टर अपने करियर से क्या चाहते हैं, सुपर-स्पेशलाइजेशन की राह, व्यापक नैदानिक (Clinical) जिम्मेदारियां, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के झटके से सुरक्षा और मरीजों का सीधे इलाज करने का मौका.
पिछले कुछ काउंसलिंग साइकिलों से दिख रही बढ़त
2024 में: अंतर काफी कम था, 48 टोपर्स ने मेडिसिन और 45 ने रेडियोलॉजी चुनी थी.
2025 में: 46 ने मेडिसिन और 40 ने रेडियोलॉजी चुनी.
2026 में: यह अंतर बढ़कर बहुत बड़ा हो गया (51 बनाम 28).
करियर का 'लॉन्चपैड' बनी मेडिसिन
मेडिकल एजुकेशन ट्रेंड्स पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि यह बदलाव उस पुरानी धारणा को चुनौती देता है जिसमें माना जाता था कि सबसे ज्यादा डिमांड वाली सीटें वही होती हैं जहां काम के घंटे तय हों या कमाई ज्यादा हो.
सर गंगा राम अस्पताल के एसोसिएट कंसल्टेंट और FORDA के पूर्व अध्यक्ष डॉ. अविरल माथुर के अनुसार, मेडिसिन अब सिर्फ एक मंजिल नहीं, बल्कि करियर का 'लॉन्चपैड' बन गई है. एमडी (MD) मेडिसिन करने के बाद कार्डियोलॉजी, न्यूरोलॉजी, नेफ्रोलॉजी, गैस्ट्रोएंटरोलॉजी और क्रिटिकल केयर जैसी सुपर-स्पेशलाइजेशन (DM) की राहें खुली रहती हैं. यानी डॉक्टर खुद को एक संकीर्ण दायरे में सीमित नहीं करता.
रेडियोलॉजी के सामने खड़े हो रहे बड़े सवाल
रेडियोलॉजी अभी भी एक प्रतिष्ठित ब्रांच है, लेकिन अब कई नई चुनौतियों के कारण छात्र इसको लेकर सतर्क हो रहे हैं. उनमें से कुछ इस तरह से हैं.
AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) का खौफ: मेडिकल इमेजिंग में तेजी से विकसित हो रहे एआई टूल्स ने छात्रों के मन में यह सवाल खड़ा कर दिया है कि अगले 10 सालों में रेडियोलॉजिस्ट का काम कितना बदल जाएगा या प्रभावित होगा.
महंगा इंफ्रास्ट्रक्चर: यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ मेडिकल साइंसेज (UCMS) के डॉ. सत्येंद्र सिंह बताते हैं कि रेडियोलॉजी का सेटअप और उपकरण लगाना बेहद खर्चीला है. साथ ही लंबे समय तक रेडिएशन एक्सपोजर का जोखिम भी एक कारक है.
सीटों की सीमित संख्या: भारत में एमडी रेडियोलॉजी की लगभग 1,200 सीटें हैं, जबकि जनरल मेडिसिन की 4,000 से अधिक सीटें हैं. कई बार छात्र पसंदीदा कॉलेज न मिलने पर भी रेडियोलॉजी की जगह मेडिसिन चुन लेते हैं.
असली डॉक्टर वाली 'फील' और मरीजों से सीधा जुड़ाव
सीताराम भारतीय अस्पताल के गेरियाट्रिशियन और AIIMS RDA के पूर्व अध्यक्ष डॉ. हरजीत सिंह भट्टी का कहना है कि लाइफस्टाइल बीमारियों का बढ़ता बोझ, बुजुर्ग आबादी और जटिल होती स्वास्थ्य जरूरतों ने फिजिशियन की भूमिका को और अहम बना दिया है.
वे कहते हैं, 'मेडिसिन से एक 'असली डॉक्टर' होने का एहसास आता है.' इसमें लक्षण, टेस्ट रिपोर्ट और क्लिनिकल हिस्ट्री को मिलाकर मरीज का लंबे समय तक इलाज करने का मौका मिलता है. कोविड-19 महामारी के दौरान गंभीर मरीजों को संभालते फिजिशियनों की केंद्रीय भूमिका ने भी इस आकर्षण को बढ़ाया है.
विशेषज्ञों का निष्कर्ष साफ है कि आज का युवा डॉक्टर सिर्फ आसान लाइफस्टाइल या शुरुआती कमाई के आधार पर अपनी ब्रांच नहीं चुन रहा, बल्कि वह एक ऐसे व्यापक क्लिनिकल बेस (व्यावहारिक आधार) में निवेश कर रहा है जो भविष्य में उसके लिए करियर के दर्जनों दरवाजे खुले रखे.
सुमी सुकन्या दत्ता