झारखंड में नौकरी और भर्ती परीक्षाओं को लेकर युवा सड़कों पर आंदोलन कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ गांवों में बच्चों की पढ़ाई आज भी बुनियादी सुविधाओं के इंतजार में अटकी हुई है. गढ़वा से सामने आई तस्वीरें बताती हैं कि यहां स्कूल पहुंचना भी बच्चों के लिए किसी परीक्षा से कम नहीं है. किताबें हाथ में हैं, लेकिन स्कूल जाना किसी जंग से कम नहीं है. इसके लिए हर दिन नदी से जंग लड़नी पड़ती है.
रंका प्रखंड के सिरोईकला उत्क्रमित उच्च विद्यालय के करीब 360 छात्र-छात्राओं और शिक्षकों को स्कूल जाने के लिए नदी पार करनी पड़ती है. बारिश में इसका पानी बढ़ते ही स्कूल तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है और कई दिनों तक कक्षाएं बंद करनी पड़ती हैं यानी जहां बच्चों को अपने भविष्य की नींव मजबूत करनी चाहिए, वहां उन्हें पहले रास्ता सुरक्षित होने का इंतजार करना पड़ता है.
नहीं है पुल, थम गई पढ़ाई
जिले के रंका प्रखंड के सिरोईकला उत्क्रमित उच्च विद्यालय में पढ़ने वाले छात्र-छात्राएं आज भी स्कूल आने-जाने के लिए नदी पार करने को मजबूर हैं. आधुनिक दौर में भी विद्यालय तक पहुंचने के लिए कोई सरकारी सड़क या पुल नहीं होने से विद्यार्थियों को रोज जोखिम उठाना पड़ता है. वर्ष 2015 में उत्क्रमित मध्य विद्यालय को उच्च विद्यालय का दर्जा मिला था. वर्तमान में यहां करीब 360 विद्यार्थी अध्ययनरत हैं, लेकिन विद्यालय तक पहुंचने का सुरक्षित रास्ता आज तक उपलब्ध नहीं कराया गया है.
छात्र-छात्राओं ने बताया कि स्कूल पहुंचने के लिए उन्हें नदी पार करनी पड़ती है. बरसात के दिनों में नदी में बाढ़ आने पर कई दिनों तक स्कूल जाना बंद करना पड़ता है. कई बार बाढ़ का पानी अधिक होने पर वे स्कूल पहुंचे बिना ही वापस लौट जाते हैं. नदी पार करते समय स्कूल ड्रेस भी भीग जाती है और हमेशा किसी अनहोनी का डर बना रहता है.
लिखित आवेदन के बाद भी नहीं हुई कोई कार्रवाई
विद्यालय के शिक्षक ने बताया कि कई सालों से वर्षों से इस समस्या के समाधान के लिए विभाग को कई बार लिखित आवेदन दिया गया, लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई. शिक्षकों ने बताया कि वे भी बच्चों की तरह नदी पार कर विद्यालय पहुंचते हैं. कई बार कपड़े उतारकर नदी पार करनी पड़ती है. विद्यालय नदी किनारे स्थित होने के कारण छोटे बच्चों पर विशेष नजर रखनी पड़ती है, ताकि कोई बच्चा नदी की ओर न चला जाये. ग्रामीणों, विद्यार्थियों और शिक्षकों ने सरकार से जल्द नदी पर पुल बनवाने की मांग की है.
चंदन कुमार कश्यप