पाकिस्तान की विदेश नीति में एक पैटर्न बार-बार दिखता है. वह जोश में बड़े वादे करता है, सहयोग की घोषणा करता है लेकिन जब असल में जोखिम सामने आता है तो पीछे हट जाता है. चाहे सऊदी अरब के साथ मक्का समझौता हो, अरब सागर में भारतीय नौसेना के जहाज से टक्कर हो या हूती विद्रोहियों के खिलाफ कार्रवाई की बात हो. आलोचक इसे 'पीठ दिखाकर भागने' की आदत कहते हैं. लेकिन विश्लेषण से पता चलता है कि यह अक्सर घरेलू दबाव, सैन्य सीमाओं और रणनीतिक हितों का नतीजा होता है.
2015 यमन संकट: संसद का तटस्थता वाला फैसला
2015 में सऊदी अरब ने यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ सैन्य गठबंधन बनाया. उसने पाकिस्तान से सैनिक, जहाज और विमान भेजने का अनुरोध किया. पाकिस्तान लंबे समय से सऊदी का करीबी सहयोगी रहा है. आर्थिक मदद भी लेता आया है. शुरू में उम्मीद थी कि पाकिस्तान शामिल होगा. लेकिन पांच दिन की संसदीय बहस के बाद सर्वसम्मति से संकल्प पास हुआ.
संसद ने कहा कि पाकिस्तान यमन संघर्ष में तटस्थ रहेगा ताकि कूटनीतिक भूमिका निभा सके. यह भी कहा गया कि अगर सऊदी की क्षेत्रीय अखंडता या मक्का-मदीना पर खतरा हो तो पाकिस्तान कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा रहेगा. यह फैसला सऊदी के लिए निराशाजनक था. पाकिस्तान ने सैन्य भागीदारी से इनकार कर दिया.
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आलोचक कहते हैं कि यह वादा तोड़ने का उदाहरण है. समर्थक कहते हैं कि पाकिस्तान ने घरेलू मतभेदों और क्षेत्रीय संतुलन को ध्यान में रखा. ईरान के साथ भी संबंध बिगाड़ने से बचा. यह घटना साफ दिखाती है कि पाकिस्तान जोश में सहयोग की बात करता है लेकिन होश आने पर जोखिम भरे युद्ध से दूर रहता है.
मक्का समझौता और हालिया हूती हमले
अगस्त 2026 में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की ने मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए. इसमें कहा गया कि एक पर हमला सभी पर हमला माना जाएगा. इससे पहले 2025 में सऊदी-पाकिस्तान द्विपक्षीय रक्षा समझौता भी हुआ था. पाकिस्तान ने सऊदी में सैनिक और एयर डिफेंस सिस्टम तैनात भी किए.
जब 2026 में हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब पर ड्रोन और मिसाइल हमले बढ़ाए तो पाकिस्तान ने प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई से दूरी बनाए रखी. रक्षा मंत्री ने चेतावनी दी कि अगर संघर्ष सऊदी क्षेत्र में फैला तो समझौता लागू हो सकता है.बाद में विदेश मंत्रालय ने साफ किया कि अभी सैन्य कार्रवाई पर कोई चर्चा नहीं है.
पाकिस्तान ने राजनयिक प्रयास किए और ईरान से हूती को रोकने की अपील की. सऊदी क्षेत्र की रक्षा करने की बात कही गई लेकिन यमन में लड़ाई में शामिल होने से इनकार कर दिया. 2015 वाली हरकत फिर की. समझौते के बावजूद पाकिस्तान ने जोखिम भरे युद्ध में कूदने से परहेज किया.
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आलोचक इसे पीछे हटने की आदत बताते हैं. विश्लेषक कहते हैं कि पाकिस्तान अपनी सीमाएं साफ रखता है-पवित्र स्थलों और सऊदी क्षेत्र की रक्षा तो करेगा लेकिन विदेशी मिट्टी पर लंबे युद्ध में नहीं उलझेगा.
अरब सागर में टक्कर: नौसैनिक मुठभेड़
15 सितंबर 2026 को उत्तर अरब सागर में पाकिस्तानी जहाज पीएनएस हुनैन और भारतीय नौसेना के युद्धपोत के बीच टक्कर हुई. भारतीय नौसेना के अनुसार पाकिस्तानी जहाज तेज गति से करीब आया, असुरक्षित पैंतरेबाजी की और टकराया. पीएनएस हुनैन को नुकसान हुआ और वह बंदरगाह लौट गया.
भारतीय जहाज ने मिशन जारी रखा. भारत ने 1991 के समझौते के आर्टिकल 10 का उल्लंघन बताया जिसमें तीन नॉटिकल मील दूरी रखने का प्रावधान है. पाकिस्तान ने भी विरोध दर्ज कराया और भारतीय जहाज पर आक्रामक व्यवहार का आरोप लगाया.
यह घटना भी 'जोश में आना और फिर पीछे हटना' का उदाहरण बन गई. पाकिस्तानी जहाज करीब आने की कोशिश में नुकसान उठाकर लौट गया. दोनों देशों ने राजनयिक स्तर पर विरोध किया लेकिन स्थिति और नहीं बढ़ी.
अन्य ऐतिहासिक उदाहरण
पाकिस्तान की इतिहास में ऐसी कई घटनाएं हैं. 1999 में लाहौर घोषणा के कुछ महीने बाद कारगिल घुसपैठ हुई जिसे बाद में पीछे हटना पड़ा. भारत के साथ कई समझौतों के बावजूद सीमा पर तनाव और आतंकवाद के आरोप लगे. सऊदी अरब के साथ लंबे सैन्य सहयोग के बावजूद 2015 और 2026 में युद्ध में सीधे शामिल होने से बचा.
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ये घटनाएं दिखाती हैं कि पाकिस्तान अक्सर बड़े वादे करता है- चाहे सैन्य गठबंधन हो या कूटनीतिक समर्थन. लेकिन जब वास्तविक लागत सामने आती है तो घरेलू राजनीति, आर्थिक मजबूरी और रणनीतिक हित उसे पीछे हटने पर मजबूर करते हैं. कुछ इसे चतुराई कहते हैं तो कुछ इसे विश्वसनीयता की कमी.
पैटर्न की समझ
पाकिस्तान की यह आदत उसकी विदेश नीति की जटिलताओं को दर्शाती है. वह सहयोगी देशों से आर्थिक और राजनीतिक लाभ लेना चाहता है लेकिन लंबे सैन्य उलझाव से बचना चाहता है. मक्का समझौता, यमन संकट और नौसैनिक मुठभेड़ इसी पैटर्न के उदाहरण हैं.
भविष्य में भी जब भी जोखिम बढ़ेगा तो पाकिस्तान कूटनीति और सीमित समर्थन का रास्ता चुनने की संभावना ज्यादा है. पाकिस्तान कहता है कि यह 'भागने' से ज्यादा 'रिस्क मैनेजमेंट' है. लेकिन बार-बार पीछे हटने से सहयोगियों का भरोसा प्रभावित हो सकता है.
ऋचीक मिश्रा