क्या बिना अमेरिका के सर्वाइव कर सकता है इजरायल? ट्रंप और नेतन्याहू में खिंची तलवार

अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते को लेकर ट्रंप और नेतान्याहू में विवाद गहरा हुआ है. अमेरिकी सैन्य और कूटनीतिक मदद के बिना इजरायल का संकट बढ़ सकता है.

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अमेरिका-ईरान की शांति डील को लेकर नेतन्याहू नाराज हैं. इससे ट्रंप भी उनसे खफा हो गए हैं. (Photo: ITG) अमेरिका-ईरान की शांति डील को लेकर नेतन्याहू नाराज हैं. इससे ट्रंप भी उनसे खफा हो गए हैं. (Photo: ITG)

ऋचीक मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 19 जून 2026,
  • अपडेटेड 11:51 AM IST

मिडिल-ईस्ट की जियो-पॉलिटिक्स इस समय अपने सबसे संवेदनशील और ऐतिहासिक मोड़ पर है. कल तक एक-दूसरे को 'सबसे पक्का दोस्त' बताने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच अब तलवारें खिंच चुकी हैं. 

अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध को समाप्त करने के लिए पर्दे के पीछे चल रही एक बड़ी शांति डील ने वॉशिंगटन और तेल अवीव के बीच के दशकों पुराने रणनीतिक रिश्तों में दरार पैदा कर दी है. ट्रंप द्वारा नेतन्याहू को सार्वजनिक रूप से क्रेजी कहना और यहां तक दावा करना कि- मेरे बिना इजरायल का कोई वजूद ही नहीं होता. यह साफ करता है कि दोनों देशों के बीच सबकुछ ठीक नहीं है. 

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इस तनाव के बीच आज दुनिया के सामने सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न खड़ा हो गया है- क्या अमेरिका के सैन्य, कूटनीतिक और आर्थिक कवच के बिना इजरायल एक राष्ट्र के रूप में सर्वाइव कर सकता है?   

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ट्रंप और नेतन्याहू में टकराव की असली वजह: ईरान शांति समझौता

डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू के रिश्तों में कड़वाहट की मुख्य वजह ईरान के साथ जारी युद्ध को लेकर दोनों देशों की बदलती रणनीतियां हैं. वॉशिंगटन से आ रही रिपोर्टों के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन इजरायल को पूरी तरह दरकिनार कर तेहरान के साथ एक व्यापक शांति समझौते को अंतिम रूप देने में जुटा है.

ट्रंप इस युद्ध की भारी आर्थिक कीमत और घरेलू स्तर पर बढ़ रही तेल की कीमतों से तंग आ चुके हैं. जल्द से जल्द मिडिल-ईस्ट से अमेरिकी पैर खींचना चाहते हैं. दूसरी ओर, नेतन्याहू और उनकी दक्षिणपंथी सरकार ईरान के परमाणु ठिकानों और लेबनान में हिज्बुल्लाह के ठिकानों पर लगातार हमले जारी रखना चाहती है. 

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ट्रंप ने हाल ही में लेबनान और ईरान पर हुए इजरायली हमलों पर तीखी नाराजगी जताते हुए नेतान्याहू से फोन पर कहा कि वे इमारतों को उड़ाना बंद करें क्योंकि ये हमले अमेरिका की शांति वार्ताओं को खटाई में डाल रहे हैं.

ट्रंप का मानना है कि नेतन्याहू अपनी घरेलू राजनीति और भ्रष्टाचार के मामलों से बचने के लिए युद्ध को जानबूझकर लंबा खींच रहे हैं. इसी कूटनीतिक खींचतान ने इजरायल की सुरक्षा निर्भरता को दुनिया के सामने उजागर कर दिया है.

अमेरिकी हथियारों की बैसाखी: ईरान युद्ध में इजरायल को मिली सैन्य मदद

अगर सैन्य आंकड़ों और जमीनी हकीकत पर नजर डालें, तो इजरायल की सुरक्षा पूरी तरह से अमेरिकी हथियारों और रक्षा प्रणालियों के दम पर टिकी हुई है. ईरान और उसके समर्थित गुटों (जैसे हिज्बुल्लाह और हमास) के साथ चले इस भीषण संघर्ष में अमेरिका ने इजरायल को हथियारों की जो खेप दी है, वो इस प्रकार है...

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एयर डिफेंस और इंटरसेप्टर मिसाइलें: इजरायल का प्रसिद्ध आयरन डोम, डेविड्स स्लिंग और एरो एंटी-मिसाइल सिस्टम अमेरिकी फंडिंग और कलपुर्जों के बिना बेकार हो जाएंगे. ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल हमलों के दौरान इजरायल की रक्षा करने वाले इन सिस्टम्स के लिए अमेरिका ने अरबों डॉलर के इंटरसेप्टर (तामिर मिसाइलें) सप्लाई किए हैं.

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एडवांस्ड फाइटर जेट्स: इजरायली वायुसेना की रीढ़ कहे जाने वाले F-35 लाइटनिंग II, F-15 और F-16 लड़ाकू विमान सीधे अमेरिका से आते हैं. युद्ध के दौरान अमेरिका ने न सिर्फ नए विमानों की मंजूरी दी, बल्कि इनके स्पेयर पार्ट्स की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित की.   

भारी गोलाबारी और सटीक बम: युद्ध के दौरान अमेरिका ने इजरायल को हजारों की संख्या में 2000 पाउंड के बंकर-बस्टर बम, गाइडेड म्यूनिशन्स (JDAMs) और 155mm के आर्टिलरी शेल्स उपलब्ध कराए हैं.

ताजा सैन्य सौदे (2026): अमेरिकी रक्षा सुरक्षा सहयोग एजेंसी (DSCA) के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका ने इजरायल के लिए भारी-भरकम सैन्य बिक्री को मंजूरी दी है. इसमें लगभग 3.8 अरब डॉलर मूल्य के AH-64E अपाचे हेलिकॉप्टर, 1.98 अरब डॉलर के जॉइंट लाइट टैक्टिकल व्हीकल (JLTV) और 'नामेर' बख्तरबंद वाहनों के लिए 740 मिलियन डॉलर के पावर पैक्स शामिल हैं.   

यदि अमेरिका इन हथियारों की सप्लाई चेन, गोला-बारूद और सबसे महत्वपूर्ण स्पेयर पार्ट्स पर रोक लगा दे, तो इजरायल की वायुसेना और एयर डिफेंस सिस्टम कुछ ही हफ्तों में पंगु हो जाएंगे.

कूटनीतिक कवच: संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी वीटो की ताकत

इजरायल के वजूद के लिए अमेरिका केवल हथियारों की दुकान नहीं है, बल्कि उसका सबसे बड़ा वैश्विक राजनीतिक ढाल भी है. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में जब भी इजरायल के खिलाफ युद्ध अपराधों, प्रतिबंधों या युद्धविराम के प्रस्ताव लाए जाते हैं, तो अमेरिका अपने वीटो पावर का इस्तेमाल कर अकेले इजरायल को अंतरराष्ट्रीय अलगाव से बचाता आया है.

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अंतरराष्ट्रीय न्यायालय और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय के दबाव के बीच भी वॉशिंगटन ही तेल अवीव के पीछे चट्टान बनकर खड़ा रहा है. यदि ट्रंप प्रशासन इस कूटनीतिक कवच को हटा लेता है या सुरक्षा परिषद में इजरायल के खिलाफ आने वाले प्रस्तावों पर वीटो करने के बजाय न्यूट्रल हो जाता है, तो इजरायल पर वैश्विक प्रतिबंधों की बाढ़ आ जाएगी. इससे इजरायल आर्थिक और राजनीतिक रूप से दुनिया में बिल्कुल अकेला पड़ जाएगा.

क्या बिना अमेरिका के सर्वाइव कर सकता है इजरायल?

इस सवाल का सीधा और सटीक जवाब है- शॉर्ट टर्म में इजरायल का सर्वाइव करना नामुमकिन है, लेकिन लॉन्ग टर्म में उसे अपनी रणनीति बदलनी होगी. इजरायल के पास बेहद एडवांस घरेलू रक्षा इंडस्ट्री (जैसे राफेल और एलबिट सिस्टम्स) है. वह तकनीक के मामले में दुनिया में अग्रणी है. लेकिन सच यह भी है कि इजरायल की आबादी और संसाधन बेहद सीमित हैं. 

वह अपनी जरूरत का 100% गोला-बारूद खुद नहीं बना सकता. युद्ध के दौरान इजरायल के कुल सैन्य आयात में अकेले अमेरिका की हिस्सेदारी 42% रही है, जबकि दूसरे स्थान पर भारत (26%) और कुछ अन्य यूरोपीय देश रहे हैं. लेकिन जर्मनी और कनाडा जैसे देशों द्वारा सैन्य निर्यात पर लगाए जा रहे प्रतिबंधों के बाद इजरायल के पास विकल्पों की भारी कमी हो गई है.

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यदि अमेरिका अपनी सैन्य सहायता और खुफिया जानकारी साझा करना बंद कर देता है, तो इजरायल चारों तरफ से दुश्मन देशों और प्रॉक्सी समूहों से घिर जाएगा. ऐसे में इजरायल को अपने वजूद को बचाने के लिए नए वैश्विक पार्टनर्स की तलाश करनी होगी या फिर मजबूरन अमेरिका की शर्तों पर ईरान के साथ शांति का रास्ता चुनना होगा.

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डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू के बीच जुबानी जंग महज दो नेताओं का अहंकार नहीं है, बल्कि यह बदलते वैश्विक समीकरणों का संकेत है. ट्रंप का यह कहना कि इजरायल को और अधिक जिम्मेदार होना चाहिए, यह साफ करता है कि अमेरिका अब इजरायल को 'ब्लैंक चेक' देने के मूड में नहीं है. 

अमेरिका के बिना इजरायल नक्शे से गायब तो नहीं होगा, क्योंकि उसके पास अपने परमाणु हथियार और अदम्य सैन्य इच्छाशक्ति है, लेकिन एक महाशक्ति के सपोर्ट के बिना उसकी सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और वैश्विक साख बेहद कमजोर हो जाएगी. 

नेतन्याहू को जल्द ही यह एहसास करना होगा कि अमेरिका से दुश्मनी मोल लेकर इजरायल को सुरक्षित रख पाना उनके लिए नामुमकिन साबित हो सकता है.

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