देश की कंपनी बनाएगी QRSAM, सुदर्शन चक्र होगा और घातक... जल्द मिलेगी मंजूरी

BEL ने DRDO के QRSAM के लिए उत्पादन तैयारी शुरू कर दी है. 30,000 करोड़ रुपये के सौदे की उम्मीद है. मिसाइल सेना की मोबाइल यूनिट को दुश्मन विमान, ड्रोन से बचाएगी. 30 किमी रेंज, 360 डिग्री रडार.

Advertisement
ये है DRDO का QRSAM मिसाइल जिसे देश के एयर डिफेंस सिस्टम में शामिल किया जाएगा. (File Photo: DRDO) ये है DRDO का QRSAM मिसाइल जिसे देश के एयर डिफेंस सिस्टम में शामिल किया जाएगा. (File Photo: DRDO)

ऋचीक मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 08 नवंबर 2026,
  • अपडेटेड 12:22 PM IST

भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) ने रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) द्वारा विकसित क्विक रिएक्शन सरफेस-टू-एयर मिसाइल यानी QRSAM प्रणाली के उत्पादन की प्रारंभिक तैयारियां शुरू कर दी हैं. कंपनी फर्स्ट ऑफ प्रोडक्शन मॉडल (FOPM) और क्वालिफिकेशन टेस्टिंग पर काम कर रही है. 

यह कदम उस संभावित बड़े रक्षा सौदे से पहले उठाया गया है जिसकी कीमत लगभग 30,000 करोड़ रुपये बताई जा रही है. BEL के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर मनोज जैन के अनुसार कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (सीसीएस) से जल्द मंजूरी मिलने की उम्मीद है. अंतिम डील सरकारी मंजूरी और बातचीत पर निर्भर करेगा.

Advertisement

QRSAM क्या है और इसकी खासियत

QRSAM एक तेज प्रतिक्रिया वाली सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली है. इसे मुख्य रूप से भारतीय सेना की चलती हुई इकाइयों की सुरक्षा के लिए डिजाइन किया गया है. यह सिस्टम लड़ाकू विमानों, हेलीकॉप्टरों, ड्रोन और सटीक निर्देशित हथियारों से बचाव कर सकता है. 

यह भी पढ़ें: अरुणाचल में चीन का गांव? अकड़ दिखाते हुए ड्रैगन बोला- अपने इलाके में जो चाहे कर सकते हैं

इसकी सबसे बड़ी ताकत मोबाइल रडार नेटवर्क है जो 360 डिग्री निगरानी प्रदान करता है. मिसाइल की मारक क्षमता करीब 30 किलोमीटर तक है. यानी दुश्मन के हवाई खतरे को दूर से ही रोकने की क्षमता इसमें है. सेना की इकाइयां युद्ध के मैदान में तेजी से आगे बढ़ती हैं. ऐसे में स्थिर रक्षा व्यवस्था पर्याप्त नहीं होती. QRSAM मोबाइल होने के कारण इन इकाइयों के साथ चल सकता है और जरूरत पड़ने पर तुरंत प्रतिक्रिया दे सकता है.

Advertisement

BEL की अगेती तैयारी का मतलब

आमतौर पर रक्षा सौदों में अंतिम अनुबंध के बाद उत्पादन शुरू होता है. इसमें कई महीने लग जाते हैं. BEL ने इस बार अलग रास्ता चुना है. कंपनी और उसके सप्लाई चेन पार्टनर्स ने अंतिम कॉन्ट्रैक्ट मिलने से पहले ही उत्पादन संबंधी काम शुरू कर दिया है. इसमें फर्स्ट ऑफ प्रोडक्शन मॉडल बनाना और क्वालिफिकेशन टेस्टिंग शामिल है.

मनोज जैन ने स्पष्ट किया कि सीसीएस से मंजूरी जल्द आने की उम्मीद है. इस तैयारी से मंजूरी मिलने के बाद कई महीने बचाए जा सकते हैं. रक्षा उत्पादन में समय बहुत महत्वपूर्ण होता है. देरी से सेना को सिस्टम मिलने में लगने वाला समय बढ़ जाता है. 

BEL का यह कदम आत्मनिर्भर भारत की दिशा में व्यावहारिक प्रयास माना जा सकता है. कंपनी पहले से मशीनरी, टेस्टिंग सुविधाएं और पार्टनर्स के साथ समन्वय तैयार रख रही है ताकि आदेश मिलते ही उत्पादन तेज गति से शुरू हो सके.

30,000 करोड़ रुपये के सौदे का महत्व

प्रस्तावित ऑर्डर करीब 30,000 करोड़ रुपये का है. यह राशि भारतीय रक्षा उद्योग के लिए काफी बड़ी है. इससे BEL की उत्पादन क्षमता और राजस्व दोनों को मजबूती मिलेगी. साथ ही घरेलू सप्लाई चेन में लगे छोटे-मझोले उद्योगों को भी काम मिलेगा.रक्षा क्षेत्र में बड़े ऑर्डर से रोजगार के अवसर बढ़ते हैं और तकनीकी विशेषज्ञता का विकास होता है. 

Advertisement

यह सौदा सिर्फ एक कंपनी का व्यवसाय नहीं बल्कि देश की वायु रक्षा क्षमता को मजबूत करने वाला कदम है. सेना की चलती संरचनाओं को हवाई खतरों से बचाने की क्षमता बढ़ाने से सीमाओं पर सुरक्षा व्यवस्था और प्रभावी बनेगी. ड्रोन और प्रिसिजन गाइडेड हथियारों के बढ़ते इस्तेमाल को देखते हुए ऐसी तेज प्रतिक्रिया वाली प्रणाली की जरूरत और बढ़ गई है.

यह भी पढ़ें: ईरान की सख्ती: पुलिसकर्मियों की हत्या के आरोपी मोहम्मद आरेफ शाहबख्श को फांसी

QRSAM की 360 डिग्री निगरानी क्षमता इसे आधुनिक युद्ध की जरूरतों के अनुरूप बनाती है. दुश्मन किसी भी दिशा से हमला कर सकता है. मोबाइल रडार नेटवर्क लगातार स्कैन करता रहता है और खतरा भांपते ही मिसाइल दागी जा सकती है. 30 किलोमीटर की रेंज सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे सेना की यूनिट्स को सुरक्षित दूरी मिलती है. BEL इलेक्ट्रॉनिक्स और रडार सिस्टम में पहले से मजबूत है. 

DRDO के साथ मिलकर विकसित इस सिस्टम का उत्पादन कंपनी के अनुभव को और बढ़ाएगा. अगेती तैयारी से उत्पादन चक्र छोटा होगा. इससे भविष्य में अन्य मिसाइल सिस्टम के लिए भी यही मॉडल अपनाया जा सकता है. सरकारी मंजूरी और अनुबंध वार्ता अभी बाकी हैं. इन प्रक्रियाओं में समय लग सकता है लेकिन BEL का रुख साफ है कि तैयारियां जारी रहेंगी.

Advertisement

चुनौतियां और आगे की राह

बड़े रक्षा सौदों में तकनीकी परीक्षण, गुणवत्ता नियंत्रण और लागत प्रबंधन चुनौतीपूर्ण होते हैं. क्वालिफिकेशन टेस्टिंग में सिस्टम को कठोर परिस्थितियों में परखा जाएगा. सप्लाई चेन को समय पर पार्ट्स उपलब्ध कराना भी जरूरी है. फिर भी BEL का यह सक्रिय रुख सकारात्मक संकेत है. 

यह भी पढ़ें: अमेरिका सोच भी नहीं सकता, हमारे पास ऐसे हथियार हैं- IRGC के प्रवक्ता का दावा

अगर सीसीएस मंजूरी दे देती है और अनुबंध जल्द अंतिम रूप ले लेता है तो उत्पादन तेजी से आगे बढ़ सकता है. इससे भारतीय सेना को आधुनिक वायु रक्षा प्रणाली समय पर मिल सकेगी. दीर्घकाल में ऐसे कदम देश को रक्षा उपकरणों के मामले में आत्मनिर्भर बनाने में मदद करेंगे. आयात पर निर्भरता घटेगी और घरेलू उद्योग मजबूत होगा.

कुल मिलाकर BEL की यह तैयारी सिर्फ एक कंपनी की व्यावसायिक योजना नहीं बल्कि भारतीय रक्षा तैयारियों को तेज करने वाला महत्वपूर्ण कदम है. QRSAM जैसी प्रणाली सेना की मोबाइल इकाइयों को हवाई खतरों से बचाने में अहम भूमिका निभाएगी. 30,000 करोड़ रुपये के संभावित सौदे से उद्योग और सुरक्षा दोनों क्षेत्रों को फायदा होने की उम्मीद है. अब सबकी नजर सरकारी मंजूरी और अंतिम अनुबंध पर है.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »