स्लीपर बसों में सुरक्षा कितनी पुख्ता? 'आज तक' के रियलिटी चेक में CCTV, SOS और फायर सेफ्टी की खुली पोल

ग्रेटर नोएडा की चलती स्लीपर बस में नाबालिग से गैंग रेप की घटना के बाद 'आज तक' ने दिल्ली-नोएडा की स्लीपर बसों का रियलिटी चेक किया. इस दौरान कहीं CCTV की निगरानी अधूरी मिली तो कहीं SOS और पैनिक बटन ही बेकार थे. पढ़ें पूरी कहानी.

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बसों में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम ना होना, चिंता की बात है (फोटो-ITG) बसों में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम ना होना, चिंता की बात है (फोटो-ITG)

ग्रेटर नोएडा में चलती स्लीपर बस में नाबालिग से दुष्कर्म की वारदात ने लंबी दूरी की बसों में यात्रियों की सुरक्षा पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. खासकर स्लीपर बसों में जहां यात्रियों के लिए अलग-अलग बर्थ और पर्दे लगे होते हैं, वहां निगरानी और इमरजेंसी रिस्पॉन्स कितना मजबूत है, यह जानना जरूरी हो गया है. इसी सवाल का जवाब तलाशने के लिए आज तक की टीम ने दिल्ली, नोएडा और ग्रेटर नोएडा में स्लीपर बसों का रियलिटी चेक किया. टीम दिल्ली के कश्मीरी गेट बस अड्डे से लेकर नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेसवे तक पहुंची और अलग-अलग रूट पर चलने वाली बसों में सुरक्षा इंतजामों को परखा.

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कश्मीरी गेट बस अड्डे पर पड़ताल

दिल्ली के कश्मीरी गेट बस अड्डे से उत्तर भारत के कई शहरों के लिए बड़ी संख्या में स्लीपर बसें चलती हैं. दिल्ली से देश के दूसरे हिस्सों के लिए भी लंबी दूरी की बसें रवाना होती हैं. आज तक की टीम ने ऐसी ही कई बसों में जाकर CCTV कैमरे, GPS सिस्टम, पैनिक बटन, SOS सुविधा, पर्दों और दूसरे सुरक्षा इंतजामों को जांचा. इस पड़ताल का मकसद यह समझना था कि कागजों पर मौजूद सुरक्षा व्यवस्था जमीन पर कितनी प्रभावी है. जांच में अलग-अलग बसों में सुरक्षा इंतजामों की तस्वीर एक जैसी नहीं मिली.

एक बस में टीम को सिर्फ दो CCTV कैमरे दिखाई दिए. इनमें से एक कैमरा ड्राइवर और कंडक्टर के केबिन के पास लगा था, जबकि दूसरा बस के आगे की तरफ था. इसका मतलब यह था कि बस के पीछे का हिस्सा और कई स्लीपर बर्थ सीधे कैमरे की निगरानी में नहीं थे. ऐसी स्थिति में अगर पीछे की किसी बर्थ पर कोई घटना होती है तो उसकी सीधी तस्वीर CCTV में रिकॉर्ड होने की संभावना कम हो जाती है. स्लीपर बस के डिजाइन और बर्थ की स्थिति को देखते हुए यह सुरक्षा व्यवस्था गंभीर सवाल खड़े करती है.

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पैनिक बटन के नाम पर सीट एडजस्ट बटन!

आज तक की टीम ने इसी बस में पैनिक बटन के बारे में भी सवाल किया. शुरुआत में बस के कर्मचारियों ने सीट को एडजस्ट करने वाले बटन को ही पैनिक बटन बताया. हालांकि, जब टीम ने वरिष्ठ कंडक्टर से इस बारे में जानकारी ली तो उन्होंने साफ किया कि बस में अलग से कोई पैनिक बटन मौजूद नहीं है. यानी आपात स्थिति में यात्री जिस सुविधा को मदद के लिए इस्तेमाल कर सकता है, वैसी अलग व्यवस्था इस बस में नहीं मिली. यह स्थिति स्लीपर बसों में यात्रियों की तत्काल सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ाती है.

इसके बाद टीम ने दिल्ली से इंदौर जा रही एक दूसरी स्लीपर बस की भी पड़ताल की. इस बस में CCTV कैमरे तो मौजूद थे, लेकिन यहां भी एक कैमरा केबिन और दूसरा बस के आगे की तरफ लगा था. पीछे की ओर कोई CCTV कैमरा नजर नहीं आया. इस बस में पैनिक बटन जरूर लगाए गए थे, लेकिन जांच में पता चला कि ये GPS सिस्टम से कनेक्टेड नहीं थे. पैनिक बटन दबाने पर अलर्ट केवल बस के आगे बैठे ड्राइवर और कंडक्टर तक पहुंचता था.

पैनिक बटन का GPS से कनेक्शन नहीं

इस व्यवस्था का मतलब यह है कि यात्री के पैनिक बटन दबाने के बाद सूचना बस के अंदर मौजूद स्टाफ तक तो पहुंच सकती है, लेकिन उसका कोई स्पष्ट GPS आधारित अलर्ट सिस्टम जांच में सामने नहीं आया. यानी आपात स्थिति में मदद की सूचना बस के बाहर किसी मॉनिटरिंग सेंटर या कंट्रोल रूम तक पहुंचने की व्यवस्था नहीं दिखी. लंबी दूरी की बसों में जहां यात्री कई घंटों तक सफर करते हैं, ऐसी व्यवस्था की उपयोगिता बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है. खासकर महिलाओं, बच्चों और अकेले सफर करने वाले यात्रियों के मामले में यह सवाल और गंभीर हो जाता है.

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आज तक की टीम ने स्लीपर बसों में लगे पर्दों की व्यवस्था को भी करीब से देखा. यात्रियों की प्राइवेसी के लिए बर्थ के आसपास पर्दे लगाए जाते हैं, लेकिन यही पर्दे बस के अंदर का बड़ा हिस्सा बाहर से छिपा देते हैं. ऐसे में किसी बर्थ के अंदर कोई घटना होने पर ड्राइवर या कंडक्टर को इसकी जानकारी कितनी जल्दी मिल पाएगी, यह बड़ा सवाल है. स्लीपर बसों में प्राइवेसी और सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखना इसलिए बेहद जरूरी है.

नोएडा में बिहार जा रही बसों का रियलिटी चेक

ग्रेटर नोएडा की घटना के बाद आज तक की टीम ने नोएडा में बिहार जाने वाली स्लीपर बसों की भी पड़ताल की. सेक्टर-63 इलाके में दिल्ली से बिहार जा रही एक स्लीपर बस को जांच के लिए देखा गया. इस बस में सुरक्षा से जुड़े कई जरूरी इंतजाम गायब मिले. टीम की पड़ताल में बस के स्टाफ को फायर एग्जिट के इस्तेमाल की पूरी जानकारी भी नहीं थी. इसके अलावा बस में कोई इमरजेंसी हेल्पलाइन नंबर दिखाई नहीं दिया और महिला यात्रियों के लिए SOS बटन की सुविधा भी मौजूद नहीं थी.

हालांकि, इस बस में CCTV कैमरे काम करते हुए मिले. बस में GPS ट्रैकर भी लगा हुआ था. यानी निगरानी और लोकेशन ट्रैकिंग की कुछ व्यवस्था मौजूद थी, लेकिन इमरजेंसी के समय यात्रियों को तत्काल मदद दिलाने वाली सुविधाओं की कमी दिखाई दी. खास तौर पर SOS बटन और हेल्पलाइन नंबर जैसी सुविधाएं यात्रियों को संकट के समय सीधे मदद मांगने का रास्ता देती हैं. इनके नहीं होने से सुरक्षा व्यवस्था का एक अहम हिस्सा कमजोर नजर आता है.

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दूसरी बस में भी मिली कमी

आज तक की टीम ने नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेसवे पर महामाया फ्लाईओवर के नीचे दिल्ली से बिहार जा रही एक दूसरी स्लीपर बस का भी रियलिटी चेक किया. यहां भी महिला यात्रियों की सुरक्षा के लिहाज से जरूरी इंतजाम पर्याप्त नहीं मिले. बस में SOS बटन नहीं था और किसी आपात स्थिति में मदद के लिए कोई हेल्पलाइन नंबर भी प्रदर्शित नहीं किया गया था. यानी यात्री के सामने अचानक कोई खतरा आने पर तत्काल मदद मांगने का साफ माध्यम नजर नहीं आया.

फायर सेफ्टी की स्थिति भी सवालों के घेरे में दिखी. बस में केवल चालक की सीट के पास एक फायर एक्सटिंग्विशर रखा हुआ था. वहीं बस का स्टाफ भी इमरजेंसी की स्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह प्रशिक्षित नजर नहीं आया. चालक को फायर एग्जिट के इस्तेमाल की प्रक्रिया की साफ जानकारी नहीं थी. हालांकि, इस बस में CCTV कैमरा चलता हुआ मिला, लेकिन केवल CCTV का होना पूरी सुरक्षा व्यवस्था के लिए पर्याप्त नहीं माना जा सकता.

तिमारपुर में लक्जरी स्लीपर बस का रियलिटी चेक

आज तक की टीम दिल्ली के तिमारपुर में ऐसी ही एक लक्जरी स्लीपर बस तक पहुंची, जैसी बस में गैंगरेप की वारदात सामने आई थी. यहां टीम ने बस के अंदर जाकर यह जांचने की कोशिश की कि सुरक्षा मानकों का कितना पालन किया जा रहा है. इस बस में CCTV कैमरे, एंट्री-एग्जिट गेट और ड्राइवर की सीट के पास माइक जैसी व्यवस्थाएं मौजूद मिलीं. ड्राइवर के मुताबिक बस में GPS भी लगा हुआ था और कंपनी की ओर से सुरक्षा नियमों का पालन किया जाता है.

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ड्राइवर ने बताया कि बस में करीब पांच से छह CCTV कैमरे लगे हुए हैं. उसके मुताबिक एक कैमरा एक तरफ, एक सामने, एक दरवाजे के लिए और अन्य कैमरे बस के अलग-अलग हिस्सों में लगे हैं. इन कैमरों की फीड कंपनी के हेड ऑफिस में जाती है, जहां मैनेजर और वरिष्ठ अधिकारी इसे देखते हैं. ड्राइवर के अनुसार वहां टीवी स्क्रीन पर बसों की CCTV फीड 24 घंटे देखी जाती है. हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि आज तक की इस पड़ताल के दौरान नहीं की गई.

काले शीशों पर भी उठे सवाल

रियलिटी चेक के दौरान बस के शीशों को लेकर भी सवाल उठे. बस के बाहर से शीशे काफी गहरे दिखाई दे रहे थे, जिसके कारण अंदर का हिस्सा साफ नजर नहीं आ रहा था. स्लीपर बसों में ऐसे शीशे सुरक्षा के लिहाज से चिंता का विषय बन सकते हैं, क्योंकि बाहर से यह पता लगाना मुश्किल हो सकता है कि अंदर क्या हो रहा है. इसी मुद्दे पर आज तक की टीम ने ड्राइवर से सवाल किया कि बस के शीशे काले क्यों हैं.

ड्राइवर ने दावा किया कि ये शीशे ब्लैक नहीं हैं, बल्कि शीशे का रंग ही ऐसा है. उसने कहा कि रात में बस के अंदर लाइट और केबिन लाइट जलने पर अंदर और बाहर दोनों तरफ से काफी कुछ दिखाई देता है. ड्राइवर ने टीम को पास से शीशे दिखाते हुए कहा कि अंदर का हिस्सा साफ नजर आता है. हालांकि, इस व्यवस्था को लेकर सुरक्षा के नजरिए से सवाल अपनी जगह बने हुए हैं कि किसी आपात स्थिति में बाहर से बस के अंदर कितनी आसानी से निगरानी की जा सकती है.

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दो शहर, अलग तस्वीर

दिल्ली, नोएडा और ग्रेटर नोएडा में किए गए इस रियलिटी चेक में स्लीपर बसों की सुरक्षा व्यवस्था में एकरूपता नहीं दिखाई दी. कहीं CCTV कैमरे मौजूद थे लेकिन बस का पिछला हिस्सा निगरानी से बाहर था, तो कहीं पैनिक बटन मौजूद होने के बावजूद वह GPS सिस्टम से जुड़ा नहीं था. कुछ बसों में CCTV और GPS मिले, लेकिन SOS बटन और इमरजेंसी हेल्पलाइन जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं मिलीं. वहीं फायर सेफ्टी और स्टाफ की ट्रेनिंग को लेकर भी सवाल सामने आए.

सबसे बड़ा सवाल यह है कि स्लीपर बसों में यात्रियों की सुरक्षा के लिए बनाए गए नियम जमीन पर कितने प्रभावी ढंग से लागू हो रहे हैं. स्लीपर बसों में पर्दों के कारण यात्रियों की प्राइवेसी बनी रहती है, लेकिन यही व्यवस्था किसी घटना की निगरानी को मुश्किल भी बना सकती है. CCTV का सही कवरेज, काम करने वाला SOS या पैनिक बटन, GPS से जुड़ा अलर्ट सिस्टम, इमरजेंसी हेल्पलाइन, पर्याप्त फायर सेफ्टी उपकरण और प्रशिक्षित स्टाफ जैसी व्यवस्थाएं सिर्फ कागजों पर नहीं, बल्कि वास्तविक रूप से काम करती हुई होनी चाहिए.

ग्रेटर नोएडा की घटना के बाद आज तक की यह पड़ताल लंबी दूरी की स्लीपर बसों में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर कई अहम सवाल सामने रखती है. खासकर महिलाओं और नाबालिग यात्रियों के लिए सफर को सुरक्षित बनाने के लिए निगरानी और इमरजेंसी रिस्पॉन्स सिस्टम मजबूत होना जरूरी है. सवाल सिर्फ यह नहीं कि बस में CCTV, GPS या पैनिक बटन लगा है या नहीं, बल्कि यह है कि जरूरत पड़ने पर ये सभी सिस्टम वास्तव में काम करते हैं या नहीं. यात्रियों की सुरक्षा के लिए अब सिर्फ सुविधाएं दिखाना नहीं, बल्कि उनकी प्रभावी निगरानी और तत्काल मदद सुनिश्चित करना भी जरूरी है.

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