वंदे भारत vs शताब्दी: किसके सफर में कितना दम? सीट, फेयर, स्पीड और फैसिलिटी का ये रहा कम्पेरिजन

Vande Bharat vs Shatabdi: एक ट्रेन कभी तेज और आधुनिक सफर की पहचान थी, दूसरी आज नई पीढ़ी की रेल तकनीक का चेहरा है. ऐसे में वंदे भारत और शताब्दी की तुलना सिर्फ इस सवाल पर नहीं हो सकती कि कौन ज्यादा आधुनिक है. दोनों के बीच स्पीड, स्टॉपेज, किराया, सीटिंग, खाना और सुविधाओं की तुलना की जा सकती है.

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शताब्दी अपने जमाने में आधुनिक ट्रेन सफर की पहचान रही है, वहीं वंदे भारत नई पीढ़ी की मॉडर्न ट्रेन है. (Photo: X/@RailMinIndia) शताब्दी अपने जमाने में आधुनिक ट्रेन सफर की पहचान रही है, वहीं वंदे भारत नई पीढ़ी की मॉडर्न ट्रेन है. (Photo: X/@RailMinIndia)

आजतक बिजनेस डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 23 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 8:16 PM IST

एक समय था जब शताब्दी एक्सप्रेस (Shatabdi Express) को ट्रेन यात्रा में आधुनिकता और रफ्तार की पहचान माना जाता था. अब रेलवे के पास वंदे भारत (Vande Bharat) जैसी नई पीढ़ी की ट्रेन है. ऐसे में दोनों ट्रेनों को सीधे इस आधार पर तुलना करना कि कौन ज्यादा आधुनिक है, शायद सही तरीका नहीं होगा.

दोनों अपने-अपने दौर की तकनीक का प्रतिनिधित्व करती हैं. लेकिन यात्री के लिए सवाल आज भी वही है- दोनों ट्रेनों में सफर कितनी देर का होगा, किराया कितना लगेगा और क्या-क्या सुविधाएं मिलेंगी? हम नई दिल्ली-चंडीगढ़ रूट पर शताब्दी एक्सप्रेस और वंदे भारत ट्रेनों के उदाहरण देखते हैं...

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रूट एक, फेयर में ₹1 का फर्क

नई दिल्ली-चंडीगढ़ के बीच दूरी करीब 266 किलोमीटर है. वंदे भारत इस सफर को करीब 2 घंटे 48 मिनट में पूरा करती है, जबकि शताब्दी को करीब 3 घंटे 19 मिनट लगते हैं. यानी दोनों के बीच यात्रा समय का फर्क करीब 31 मिनट का है. लेकिन चेयर कार की बात करें तो किराया लगभग बराबर है.

वंदे भारत में चेयर कार का किराया करीब ₹714 और शताब्दी में ₹715 से शुरू होता है. यानी सिर्फ ₹1 के अंतर में यात्री के सामने दो अलग तकनीकी पीढ़ियों की ट्रेनें हैं. हालांकि किराया ट्रेन, यात्रा की तारीख और लागू शुल्क के हिसाब से बदल सकता है. अंतिम किराया बुकिंग के समय रेलवे की टिकट बुकिंग सिस्टम पर देखना चाहिए.

वंदे भारत नई टेक्नोलॉजी की ट्रेन

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वंदे भारत को पारंपरिक इंजन और कोच वाली ट्रेन की तरह डिजाइन नहीं किया गया है. यह सेल्फ-प्रोपेल्ड ट्रेनसेट है. यानी इसमें अलग लोकोमोटिव ट्रेन को खींचने के बजाय ट्रेन के कोच में ही पावर जनरेशन सिस्टम दिया गया है. इसी डिजाइन की वजह से इसमें तेजी से गति पकड़ने की क्षमता है. भारतीय रेलवे के मुताबिक वंदे भारत की अधिकतम डिजाइन स्पीड 160 किमी प्रति घंटा है.

नई सीरीज की वंदे भारत ट्रेनों की टॉप डिजाइन स्पीड 180 Kmph है. इन ट्रेनों में ऑटोमैटिक दरवाजे, जीपीएस बेस्ड पैसेंजर इंफॉर्मेशन सिस्टम, बायो-वैक्यूम टॉयलेट और ऑनबोर्ड इन्फोटेनमेंट जैसी सुविधाएं दी गई हैं. हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि हर रूट पर ट्रेन 160 किमी प्रति घंटा की रफ्तार से चलेगी. वास्तविक स्पीड ट्रैक, सिग्नलिंग, रूट और दूसरे कारणों पर निर्भर करती है.

शताब्दी अपने दौर की मॉडर्न ट्रेन

शताब्दी को वंदे भारत के मुकाबले सिर्फ पुरानी ट्रेन कहकर देखना सही नहीं होगा. जब 1988 में शताब्दी एक्सप्रेस शुरू हुई थी, तब यह कम दूरी के तेज एसी सफर के लिए रेलवे का एक नया प्रयोग था. इसमें चेयर कार और एग्जीक्यूटिव क्लास के साथ भोजन (Meal) की सुविधा भी दी गई थी.

आज कई शताब्दी ट्रेनों में एलएचबी कोच इस्तेमाल होते हैं. इसलिए मौजूदा शताब्दी को उसके शुरुआती दौर के कोचों से अलग समझना चाहिए. इसलिए वंदे भारत और शताब्दी की तुलना उनके इतिहास से नहीं, बल्कि आज यात्री को मिलने वाली सुविधाओं के आधार पर करना ज्यादा उपयोगी है.

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वंदे भारत की डिजाइन स्पीड 160 किमी प्रति घंटा है. शताब्दी की कई रूट पर टॉप स्पीड करीब 130 किमी प्रति घंटा तक है.

लेकिन ट्रेन की अधिकतम स्पीड ही पूरे सफर का समय तय नहीं करती. इसमें स्टॉपेज, ट्रैक की स्थिति, सिग्नलिंग और दूसरे ट्रैफिक का भी असर होता है. नई दिल्ली-चंडीगढ़ रूट पर इसका फर्क साफ दिखता है. वंदे भारत के कम स्टॉपेज हैं, जबकि शताब्दी ज्यादा स्टेशनों पर रुकती है. इसलिए इस रूट पर वंदे भारत का कुल यात्रा समय कम है.

सीटिंग में दोनों ट्रेनों में काफी समानता

दोनों ट्रेनों में एसी चेयर कार (CC) और एग्जीक्यूटिव चेयर कार (EC) मिलती है. चेयर कार सामान्य बैठने वाली क्लास है. वहीं एग्जीक्यूटिव क्लास में ज्यादा जगह और बेहतर सीटिंग मिलती है.

वंदे भारत में रिक्लाइनिंग सीट, हर सीट के लिए चार्जिंग प्वाइंट और रीडिंग लाइट जैसी सुविधाएं हैं. एग्जीक्यूटिव क्लास के कुछ कॉन्फिगरेशन में सीटों को 180 डिग्री या 360 डिग्री तक घुमाने की सुविधा भी मिलती है. शताब्दी में भी आरामदायक एसी सीटिंग मिलती है. इसके अलावा कुछ चुनिंदा रूट पर विस्टाडोम कोच भी उपलब्ध हैं.

विस्टाडोम कोच शताब्दी की खासियत

अगर यात्री का फोकस सिर्फ जल्दी अपने डेस्टिनेशन पर पहुंचने पर नहीं है, तो शताब्दी के कुछ रूट पर मिलने वाला विस्टाडोम कोच एक अलग अनुभव देता है. इस कोच में बड़े शीशे, कांच वाली छत और रोटेट होने वाली सीटें मिलती हैं. यानी सफर के दौरान बाहर का नजारा देखने का अनुभव सामान्य चेयर कार से अलग हो जाता है. यह सुविधा हर शताब्दी में नहीं होती. इसलिए टिकट बुक करते समय अपने रूट की ट्रेन और कोच संरचना देखना जरूरी है.

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फीचर्स में शताब्दी से आगे वंदे भारत

वंदे भारत को शुरू से ही आधुनिक ट्रेनसेट के रूप में तैयार किया गया है. इसमें ऑटोमैटिक पैसेंजर डोर, जीपीएस आधारित पैसेंजर इंफॉर्मेशन सिस्टम, सीसीटीवी, बायो-वैक्यूम टॉयलेट और ऑनबोर्ड इन्फोटेनमेंट जैसी सुविधाएं शामिल हैं. इसके मुकाबले शताब्दी की मौजूदा सेवाओं में कोच और सुविधाएं ट्रेन के रूट और रेक के हिसाब से अलग हो सकती हैं. इसलिए यहां तुलना का मतलब यह नहीं कि एक ट्रेन की सुविधा है और दूसरी में नहीं. बल्कि अंतर यह है कि वंदे भारत को इन आधुनिक सुविधाओं को ध्यान में रखकर एक ट्रेनसेट के रूप में डिजाइन किया गया है.

दोनों ट्रेनों के फूड में ज्यादा अंतर नहीं

दोनों ट्रेनों में यात्रा के समय के हिसाब से चाय, नाश्ता, खाना या शाम के स्नैक्स जैसी खानपान सेवाएं मिल सकती हैं. वंदे भारत की कुछ सेवाओं में मेन्यू के तहत फल, मफिन या ब्राउनी, ड्राई फ्रूट्स, चिक्की, कैरामेल पॉपकॉर्न और क्षेत्रीय स्नैक्स जैसी चीजें भी शामिल हो सकती हैं. शताब्दी में भी खानपान सेवा रूट और यात्रा के समय के अनुसार होती है. कुछ रूट पर आईआरसीटीसी ई-कैटरिंग के जरिए चुनिंदा स्टेशनों से सीट पर खाना मंगाने का विकल्प भी उपलब्ध होता है.

दोनों ट्रेनों में सबसे बड़ा अंतर क्या है?

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दोनों ट्रेनों के बीच सबसे अहम अंतर उनकी बनावट का है. वंदे भारत सेल्फ-प्रोपेल्ड ट्रेनसेट है. इसमें पावर सिस्टम ट्रेन के कोच के अंदर ही दिया गया है. इससे तेज एक्सेलरेशन में मदद मिलती है और ट्रेन खुलते ही चंद सेकंड में स्पीड पकड़ लेती है. दूसरी ओर शताब्दी लोकोमोटिव-हॉल्ड ट्रेन है. यानी इसमें एक इंजन ट्रेन के कोचों को खींचता है.

वंदे भारत और शताब्दी में क्या चुनेंगे?

यह चुनाव किसी एक ट्रेन को बेहतर साबित करने का सवाल नहीं है. अगर आपके रूट पर वंदे भारत कम स्टॉप के साथ चल रही है, तो यात्रा समय कम हो सकता है. अगर आपको आधुनिक ट्रेनसेट, नई पीढ़ी की यात्री सुविधाएं और तेज एक्सेलरेशन पसंद है, तो ये चीजें वंदे भारत में मिलती हैं. दूसरी तरफ, कुछ रूट पर शताब्दी का किराया, समय और कोच विकल्प अलग हो सकते हैं. विस्टाडोम जैसी सुविधा वाले रूट पर इसका अनुभव भी अलग है.

इसलिए टिकट बुक करने से पहले सिर्फ ट्रेन का नाम न देखें. अपने रूट पर यात्रा समय, स्टॉपेज, चेयर कार/एग्जीक्यूटिव किराया, कोच और उपलब्ध सुविधाएं जरूर देख लें. वंदे भारत और शताब्दी की असली तुलना इसी तरह की जा सकती है- एक नई पीढ़ी की ट्रेनसेट तकनीक है, जबकि दूसरी ने अपने दौर में भारतीय रेलवे के तेज और आधुनिक एसी सफर की तस्वीर बदली थी.

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