अंडा भारतीय परिवारों के लिए प्रोटीन का आसान और सस्ता सोर्स माना जाता है. लेकिन अब इसकी कीमत बढ़ने से घर का बजट बिगड़ रहा है. महंगे अंडों का असर सीधे लोगों की थाली पर दिखने लगा है. कई परिवार अब कम अंडे खरीद रहे हैं. कुछ लोग अंडे कम बार खरीद रहे हैं. वहीं कुछ परिवार सस्ते विकल्प तलाश रहे हैं.
लोकलसर्किल्स के एक सर्वे में यह बात सामने आई है. सर्वे में 287 जिलों के परिवारों से 67 हजार से ज्यादा जवाब लिए गए. इनमें 62 फीसदी लोगों ने बताया कि पिछले छह महीने में अंडों की कीमत 10 से 50 फीसदी या उससे ज्यादा बढ़ी है.
वहीं करीब 48 फीसदी लोगों ने कहा कि उन्होंने अंडों की मात्रा या खरीदने की फ्रीक्वेंसी कम कर दी है. वहीं 10 फीसदी लोग सस्ते विकल्प या दूसरी जगह से अंडे खरीदने लगे हैं.
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एक साल में अंडे 35 से 40 फीसदी तक हुए महंगे
सर्वे के मुताबिक अंडों की कीमत में तेजी से उछाल आया है. 21,469 लोगों से कीमत बढ़ने को लेकर सवाल किया गया. इनमें 31 फीसदी ने कहा कि अंडे 10 से 25 फीसदी महंगे हुए हैं. इतने ही लोगों ने 25 से 50 फीसदी की बढ़ोतरी बताई. 22 फीसदी लोगों ने 10 फीसदी तक कीमत बढ़ने की बात कही.
इस तरह 84 फीसदी लोगों ने अंडों की कीमत बढ़ने की जानकारी दी. किसी भी जवाब देने वाले ने यह नहीं कहा कि कीमत में कोई बदलाव नहीं हुआ.
सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक फार्म से निकलने वाले अंडे की कीमत करीब 7 रुपये पहुंच गई है. एक साल पहले यह करीब 4.94 रुपये थी. कई बाजारों में खुदरा कीमत 8.50 से 9 रुपये प्रति अंडा है. कुछ ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर कीमत करीब 14 रुपये तक पहुंच गई है.
मुर्गियों के चारे ने बढ़ाई लागत
अंडे महंगे होने की बड़ी वजह मुर्गियों का चारा भी है. रिपोर्ट के मुताबिक, अंडा उत्पादन की कुल लागत में करीब 65 से 70 फीसदी हिस्सा चारे का होता है. पोल्ट्री फीड में मक्का बड़ी मात्रा में इस्तेमाल होता है. मक्के की कीमत पिछले कुछ सालों में काफी बढ़ी है.
तीन साल पहले मक्का करीब 14 हजार रुपये प्रति टन था. अब इसकी कीमत करीब 26,500 रुपये प्रति टन हो गई है. सोयाबीन मील की कीमत भी करीब 40 हजार से बढ़कर 65 हजार रुपये प्रति टन हो गई है. डी-ऑयल्ड राइस ब्रान की कीमत करीब 12 हजार से बढ़कर 22 हजार रुपये प्रति टन पहुंच गई है. जुलाई 2026 में पोल्ट्री फीड की लागत एक साल पहले की तुलना में करीब 15 फीसदी ज्यादा रही.
मक्का से इथेनॉल बनाने का भी असर
रिपोर्ट में मक्के के बढ़ते इस्तेमाल को भी अंडों की कीमत से जोड़ा गया है. देश में मक्के का इस्तेमाल इथेनॉल बनाने के लिए तेजी से बढ़ा है. 2022-23 में डिस्टिलरी को करीब 8.3 लाख टन मक्का दिया गया था. 2024-25 में यह आंकड़ा बढ़कर 125.75 लाख टन हो गया.
रिपोर्ट के मुताबिक, अब देश में पैदा होने वाले मक्के का करीब 37 फीसदी हिस्सा इथेनॉल उत्पादन में जा रहा है. इससे खाने, पशु चारे और ईंधन के लिए एक ही फसल की मांग बढ़ गई है.
अंडों की सप्लाई पर भी गर्मी का असर पड़ा है. रिपोर्ट के मुताबिक तटीय आंध्र प्रदेश के पोल्ट्री क्षेत्र में गर्मी के कारण 16.35 लाख से ज्यादा पक्षियों की मौत हुई. इससे रोजाना अंडे देने की क्षमता करीब 30 फीसदी तक घट गई.
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सर्दियों में अंडों की मांग आम तौर पर बढ़ जाती है. ऐसे में कीमतों पर दबाव आगे भी बना रह सकता है. ओडिशा में स्कूलों और आंगनबाड़ी केंद्रों में भी इसका असर बताया गया है. वहां एक अंडे के लिए 9 से 10 रुपये तक खर्च हो रहे हैं. जबकि सरकारी तय दर 7 रुपये है.
अंडे की खरीद कम कर रहे परिवार
महंगे अंडों का सीधा असर परिवारों की खरीद पर पड़ा है. 19,638 लोगों के जवाबों में 48 फीसदी ने कहा कि उन्होंने अंडों की मात्रा या खरीदने की फ्रीक्वेंसी कम कर दी है. 10 फीसदी लोग सस्ते विकल्प या दूसरे स्रोतों की तरफ गए हैं.
37 फीसदी लोगों ने कहा कि कीमत बढ़ने के बावजूद वे पहले जितने ही अंडे खरीद रहे हैं. किसी ने यह नहीं कहा कि उन्होंने पूरी तरह अंडे खरीदना बंद कर दिया है.
कीमत बढ़ने के साथ अंडों की क्वालिटी को लेकर भी चिंता सामने आई है. सर्वे में 70 फीसदी लोगों ने अंडों में मिलावट को लेकर बहुत ज्यादा चिंता जताई. 20 फीसदी लोगों ने कुछ हद तक चिंता बताई. यानी 90 फीसदी लोगों को किसी न किसी स्तर पर अंडों की सुरक्षा की चिंता है.
रिपोर्ट में एंटीबायोटिक अवशेष को लेकर हुई जांच का भी जिक्र है. इसके बाद FSSAI ने देशभर में निगरानी और जांच अभियान चलाने का निर्देश दिया था. FSSAI ने बाद में कहा कि अंडे खाने के लिए सुरक्षित हैं. अंडों को कैंसर से जोड़ने वाले दावे वैज्ञानिक आधार पर सही नहीं हैं.
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भारत में बड़ी संख्या में अंडे खुले और बिना ब्रांड के बिकते हैं. ऐसे अंडों पर प्रोडक्शन की तारीख, फार्म और सोर्स जैसी जानकारी नहीं होती. इससे ग्राहकों के लिए अंडे की गुणवत्ता और स्रोत की जानकारी पाना मुश्किल होता है.
रिपोर्ट में सरकार से पोल्ट्री बिजनेस के लिए मक्के की उपलब्धता बढ़ाने की मांग की गई है. साथ ही एथेनॉल के लिए मक्के के इस्तेमाल की समीक्षा करने और जरूरत पड़ने पर मक्का आयात आसान करने का सुझाव दिया गया है. रिपोर्ट में अंडों की ट्रेसबिलिटी बढ़ाने की भी बात कही गई है.
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