देश के कई बड़े शहरों में घर का किराया लोगों की मासिक आय का बड़ा हिस्सा खा रहा है. मुंबई, कोलकाता और हैदराबाद में किराये का बोझ सबसे अधिक है. अर्बन लैंड इंस्टीट्यूट के 2025 एशिया-पैसिफिक होम अटेनबिलिटी इंडेक्स के मुताबिक मुंबई में किराये के मकान पर लोगों की आय का औसतन 53% हिस्सा खर्च हो रहा है, इसके बाद कोलकाता में 48% और हैदराबाद में 47% आय किराये में जा रही है.
वहीं दिल्ली-NCR में यह आंकड़ा 34% और पुणे में 32% है। बेंगलुरु, अहमदाबाद और चेन्नई में किराये का बोझ 29% दर्ज किया गया है.
किराये का बढ़ता बोझ बना शहरी परिवारों की चिंता
बड़े शहरों में आवास की बढ़ती लागत शहरी परिवारों के लिए एक महत्वपूर्ण वित्तीय दबाव बन रही है. किराये पर आय का बड़ा हिस्सा खर्च होने का सीधा असर परिवार की बचत, दूसरी जरूरतों पर खर्च और भविष्य की वित्तीय योजनाओं पर पड़ सकता है, RentenPe की CEO और Co-founder सारिका शेट्टी ने कहा, “किफायती आवास का मतलब अब सिर्फ यह नहीं रह गया है कि लोगों को घर मिल सकता है या नहीं, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण है कि घर बनाए रखने के लिए उनकी मासिक आय का कितना हिस्सा खर्च हो रहा है.”
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अलग-अलग शहरों में किराये का बोझ
ULI के आंकड़ों के मुताबिक बड़े शहरों में किराये और आय का अनुपात अलग-अलग है.
यह अंतर बताता है कि शहर के हिसाब से आवास की लागत और परिवारों की आय पर उसका दबाव काफी अलग हो सकता है. सरकारी उपभोग संबंधी आंकड़े भी शहरी परिवारों के खर्च में किराये की अहम भूमिका को दिखाते हैं. शहरी भारत में मासिक प्रति व्यक्ति उपभोग व्यय में किराये की हिस्सेदारी करीब 6.58% थी. यह गैर-खाद्य खर्च का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है.
हालांकि, सिर्फ किराये और आय के अनुपात से किसी परिवार की पूरी वित्तीय स्थिति का आकलन नहीं किया जा सकता, इसमें आय, परिवार का आकार, अन्य खर्च और बचत जैसे कई कारक भी महत्वपूर्ण होते हैं.
किराये का भुगतान भी बन सकता है वित्तीय क्षमता का संकेत
आवास की किफायत को समझने के लिए किराये के भुगतान से जुड़े आंकड़े भी उपयोगी हो सकते हैं. इनमें आय के मुकाबले किराये का अनुपात, समय पर किराया भुगतान, भुगतान में देरी और समय के साथ किराये के बोझ में बदलाव जैसे पहलू शामिल हैं. मसलन, अगर कोई व्यक्ति हर महीने ₹40,000-₹50,000 किराया दे रहा है, तो यह उसके ऊपर मौजूद एक नियमित वित्तीय दायित्व है. अगर वह इस दायित्व का लगातार समय पर भुगतान करता है, तो यह उसके वित्तीय व्यवहार का एक अतिरिक्त संकेत हो सकता है. हालांकि, ऐसे संकेतों को पारंपरिक क्रेडिट आकलन के विकल्प के तौर पर देखने के बजाय एक अतिरिक्त जानकारी के रूप में देखा जा सकता है.
किराया देने के बाद कितनी आय बचती है, यह भी जरूरी
NK Realtors के असोसिएट डायरेक्टर समुज्ज्वल घोष के मुताबिक, आवास की किफायत का आकलन इस आधार पर भी होना चाहिए कि घर का खर्च चुकाने के बाद परिवार के पास कितनी आय बचती है. उन्होंने कहा कि जब किराया आय का 30% या उससे अधिक हिस्सा खा जाता है, तो इसका असर परिवार के जीवन स्तर, वित्तीय सुरक्षा और भविष्य की आकांक्षाओं पर पड़ सकता है, उनके मुताबिक, किसी घर को किफायती मानने के लिए सिर्फ किराये को देखना पर्याप्त नहीं है. आय, घर की लोकेशन, आने-जाने का समय, बुनियादी ढांचा और परिवार की प्राथमिकताओं को भी साथ में देखना जरूरी है.
सिर्फ किराये की रकम नहीं, पूरा वित्तीय बोझ समझना जरूरी
शहरी इलाकों में किराये के मकानों की मांग बढ़ने के साथ यह सवाल भी महत्वपूर्ण हो रहा है कि किसी परिवार के लिए घर वास्तव में कितना किफायती है, सिर्फ यह देखना कि किराया कितना है, पर्याप्त नहीं है. किराया चुकाने के बाद बचने वाली आय और परिवार के दूसरे खर्च भी आवास की वास्तविक किफायत तय करते हैं.
ऐसे में किराये का बोझ और किरायेदारों के भुगतान व्यवहार शहरी आवास की किफायत और परिवारों की वित्तीय क्षमता को समझने के लिए एक अतिरिक्त नजरिया दे सकते हैं.
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