अमेरिकी बाजार गिरता है तो भारतीय बाजार प्रभावित होता है... अगर ना गिरे तो भी भारतीय बाजार में गिरावट रहती है. पिछले 8 महीनों से बाजार की कुछ ऐसी ही कहानी रही है. आलम ये है कि जनवरी के बाद से अभी तक बीएसई बाजार पूंजीकरण 30 लाख करोड़ रुपये तक घट चुका है, जो अपने आप में ये बताता है कि निवेशकों का पैसा किस तरह बर्बाद हुआ है?
भारतीय बाजार के प्रमुख इंडेक्स सेंसेक्स और निफ्टी साल 2026 के दौरान 15 फीसदी तक गिर चुके हैं. खासकर सेंसेक्स में 12000 अंकों से ज्यादा की गिरावट आई है, जबकि निफ्टी 3500 अंकों से ज्यादा गिरा है. वहीं भारतीय बाजार के जानकार इसमें अभी और गिरावट की आशंका जता रहे हैं.
अगर मौजूदा गिरावट की वजह खोजें तो वही रटा-रटाया जवाब मिलता है- अमेरिका में ऊंची बॉन्ड यील्ड, डॉलर की मजबूती, पश्चिम एशिया में तनाव और कच्चे तेल का महंगा होना... वगैरह-वगैरह. लेकिन क्या सच में ऐसा ही है? क्यों हर परिस्थितियों में भारतीय बाजार को ही ये दर्द उठाना पड़ रहा है, क्या सच में हमारे सिस्टम में कमी है, या भारतीय बाजार विदेशी रणनीति का शिकार बन रहा है?
एक तरह का यह भी सवाल घूम रहा है कि जब भारतीय अर्थव्यवस्था 7 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ती दिख रही है और यह दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बनी हुई है. जिसपर IMF ने भी साकारात्मक नजरिया रखा है और FY27 के अपने अनुमान को 6.4 फीसदी से बढ़ाकर 7 फीसदी कर दिया है, तो फिर क्यों भारतीय शेयर बाजार इतना दबाव झेल रहा है, आखिरी इस गिरावट के पीछे असली वजह क्या है?
दरअसल, गिरावट के इन आंकड़ों की गहराई में उतरें, तो यह पता चलता है कि हर बार बाजार गिरने के भले ही अलग-अलग वजह रहे हों, लेकिन एक कारण निरंतर बना रहा है और वह- विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) की बिकवाली है.
विदेशी निवेशकों की बिकवाली
जनवरी में एफआईआई ने 41,000 करोड़ रुपये की बिकवारी की थी. मार्च में यह आंकड़ा 1.22 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया था. वहीं अप्रैल में 70 हजार करोड, मई में 55000 करोड़ से ज्यादा, जून में करीब 50,000 करोड़ रुपये की बिकवाली हुई थी और अभी तक अक्टूबर में विदेशी निवेशकों ने 51,000 करोड़ रुपये की निकासी कर डाली है. कुल मिलाकर साल 2026 में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से 4.50 लाख करोड़ रुपये निकाल लिया है. यह आंकड़ा किसी भी साल में विदेशी निवेशकों की निकासी से बहुत ज्यादा है.
इससे यह तो साफ है कि डॉलर की लगातर निकासी से भारतीय बाजार पर गहरा असर पड़ा है, चाहे घरेलू संस्थागत निवेशकों (डीआईआई) ने कितना भी मार्केट को सपोर्ट दिया हो. अब यहां से एक सवाल यह भी उभरता है कि आखिर विदेशी निवेशक साल 2026 आते ही भारतीय बाजार से अचानक इतना ज्यादा पैसा क्यों निकालने लगे हैं? जो पहले भारतीय बाजार से सालभर में भी इतना पैसा नहीं निकलते थे. हालांकि, अब वे एक ही महीने में इससे ज्यादा की बिकवाली कर दे रहे हैं.
इसका जवाब पाने के लिए हमें थोड़ा पीछे इसी साल फरवरी में जाना होगा, जब भारतीय बाजार थोड़े अच्छे कंडीशन में थे और बाजार के निवेशकों को इंतजार था कि टैक्स में कुछ राहत मिल सकती है, लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ जिसके बाद मार्केट पूरी तरह से हिल गया. इधर, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस के ट्रेड पर सिक्योरिटीज ट्रांजेक्शन टैक्स (STT) बढ़ाने का ऐलान कर रही थीं और उधर, मार्केट में सूनामी आ गई. फिर अगले ही महीने यानी मार्च में विदेशी निवेशकों ने एक महीने के दौरान सबसे ज्यादा निकासी का रिकॉर्ड बना दिया.
क्या टैक्स के कारण नहीं आ रहे विदेशी निवेशक?
मार्केट के जानकारों का कहना है कि विदेशी निवेशकों को भारतीय बाजार में ज्यादा टैक्स चुकाने पड़ रहे हैं, क्योंकि यहां लॉन्गटर्म कैपिटल गेन (LTCG), शॉर्टटर्म कैपिटल गेन (STCG) और सिक्योरिटी ट्रांजेक्शन (STT) जैसे कई तरह के टैक्स देने पड़ते हैं. दूसरी ओर, अमेरिकी और अन्य बाजारों से विदेशी निवेशकों को अच्छे रिटर्न मिले हैं.
इसी महीने ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण भी FII की बिकवाली को लेकर चिंता जता चुकी हैं. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा है कि शेयर बाजार में एक ही तरह के टैक्स रखने को लेकर विचार किया जा रहा है. उन्होंने इसपर लोगों से राय भी मांगी हैं. ऐसे में आगामी बजट में शेयर बाजार के टैक्स संबंधी कुछ सुधार होने की उम्मीद जगी है.
भारतीय बाजार में गिरावट के अन्य कारण
लेकिन अब भारतीय बाजार में गिरावट, सिर्फ विदेशी निवेशकों की बिकवाली तक ही सीमित नहीं रह गई है. बाजार के दिग्गज अब असली कारण उच्च स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों को मान रहे हैं. उनका कहना है कि जबतक तेल की कीमतें ऊपर बनी रहेंगी, भारतीय बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रहेगा और विदेशी निवेशक इस बाजार से पैसा निकालते रहेंगे. स्थिति तब ज्यादा बेहतर होगी जब कच्चे तेल की कीमतें नीचे आएंगी, और तेल की कीमतें तब नीचे आएंगी, जब अमेरिका-ईरान के बीच तनाव कम हो और होर्मुज को पूरी तरह से खोल दिया जाए. इसके अलावा, सऊदी और हूतियों के बीच जंग को भी खत्म कर दिया जाए.
हिमांशु द्विवेदी