अमेरिका में हुए मिड-टर्म चुनाव के रिजल्ट ने पूरा खेल ही पलट दिया है. इस रिजल्ट से अमेरिका में ट्रंप की पार्टी कमजोर हुई और अब संसद में भी उनकी ताकत घटने वाली है. इस नतीजे के बाद वैश्विक बाजारों और निवेशकों को यह उम्मीद जगी कि अब ट्रंप की आक्रामक और मनमानी नीतियों खासकर टैरिफ और आयात शुल्क से जुड़े फैसलों पर लगाम लगेगी.
दरअसल, मिड-टर्म चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को बड़ा झटका लगा है. डेमोक्रेट्स ने कांग्रेस पर नियंत्रण हासिल कर लिया है. इस राजनीतिक बदलाव का असर पूरी दुनिया के शेयर बाजारों पर साफ तौर पर देखने को मिल रहा है. ट्रंप की पार्टी की हार और अमेरिकी नीतियों में नरमी की संभावनाओं के बीच दुनिया के तमाम बड़े देशों के शेयर बाजारों में जबरदस्त तेजी दर्ज की गई. खासकर उन देशों के शेयर बाजारों में जश्न जैसा माहौल है, जो ट्रंप की नीतियों से सबसे ज्यादा परेशान हैं. इनमें मुख्य रूप से चीन, भारत, ऑस्ट्रेलिया, हॉन्ग-कॉन्ग, ब्राजील और स्पेन शामिल हैं.
दुनियाभर के बाजारों में जोरदार तेजी
गुरुवार को भारतीय शेयर बाजार सेंसेक्स में 2.60 फीसदी की दर्ज की गई. इससे पहले बुधवार को भी तगड़ी देखी गई थी. जब कि चीन के मार्केट में बुधवार को करीब 2 फीसदी की तेजी आई थी. इसके अलावा हॉन्ग-कॉन्ग के मार्केट में 3.66 फीसदी की तेजी, ऑस्ट्रेलिया के बाजार में 2.63 फीसदी, स्पेन के बाजार में 1.37 फीसदी, जर्मनी के बाजार में करीब 1 फीसदी और फ्रांस के बाजार में 1.17 फीसदी की तेजी देखी गई. स्पेन के शेयर बाजार समेत यूरोपीय बाजारों में भी इसके बाद तेज उछाल देखा गया, क्योंकि ट्रांस-अटलांटिक व्यापारिक तनाव कम होने की उम्मीद जगी है.
एक तरह से अमेरिका के साथ ट्रेड वॉर और कड़े टैरिफ नियमों से जूझ रहे इनमें से अधिकतर देशों के लिए यह राहत की खबर है, क्योंकि अब अमेरिकी दबाव कम होने की उम्मीद है. डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों का मुख्य आधार 'अमेरिका फर्स्ट' रहा है, जिसके तहत उन्होंने विभिन्न देशों से आने वाले सामानों पर भारी टैरिफ लगाया है. इस वजह से चीन, भारत और यूरोपीय देशों जैसे प्रमुख निर्यातक देशों की कंपनियों पर दबाव बढ़ा है.
अमेरिका और चीन के बीच लंबे समय से ट्रेड वॉर चल रहा है. अमेरिकी टैरिफ के कारण चीन के निर्यात पर बुरा असर पड़ा है, जिससे उसकी मैन्युफैक्चरिंग आधारित अर्थव्यवस्था को झटका लगा है. भारत के लिए भी अमेरिकी बाजार एक बड़ा निर्यातक केंद्र है. कड़े आयात शुल्क और व्यापारिक नियमों के कारण भारतीय उत्पादों को अमेरिकी बाजार में कड़ी प्रतिस्पर्धा और रुकावटों का सामना करना पड़ता है. इससे भारतीय निर्यातकों पर दबाव बढ़ गया है.
अमेरिकी बाजार में भी रिकॉर्ड तेजी
मजेदार बात यह है कि ट्रंप को झटका लगने से सबसे ज्यादा तेजी अमेरिकी शेयर मार्केट में ही देखने को मिल रही है. डाऊ जोन्स (Dow Jones) में रिपब्लिकन पार्टी की हार के बाद पिछले 18 महीनों की सबसे बड़ी तेजी दर्ज की गई. बुधवार को डाउ जोंस में 3 प्रतिशत का उछाल देखने को मिला. अमेरिकी सरकार के बॉन्ड यील्ड (Bond Yields) में गिरावट और कर्ज के बोझ से जुड़ी चिंताओं के कम होने से वॉल स्ट्रीट के निवेशकों ने इसका सकारात्मक स्वागत किया.
ट्रंप की नीतियों और वैश्विक उथल-पुथल के कारण अमेरिका में भी महंगाई लगातार बढ़ रही है. महंगाई को काबू में रखने के लिए फेड रिजर्व को ब्याज दरें बढ़ानी पड़ी हैं, जिससे आम लोगों के लिए होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन महंगे हो गए हैं. अमेरिका में भी डीजल और पेट्रोल की कीमतें बढ़ने से आम जनता का बजट बिगड़ गया है. परिवहन महंगा होने से दैनिक उपयोग की चीजों के दाम भी बढ़ गए हैं, जिससे अमेरिकी कंजूमर मार्केट में असंतोष देखा गया है.
टैरिफ और महंगाई का दबाव कम होना
ट्रंप की नीतियों से परेशान वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं को अब व्यापार समझौतों में अधिक लचीलेपन की उम्मीद है. इसके अलावा चुनाव के नतीजे आते हैं, कच्चे तेल की कीमतों में सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई. कच्चा तेल फिसलकर 93 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया है. जबकि हाल के दिनों में ईरान-अमेरिका तनाव की वजह से कच्चे तेल के दाम आसमान छू रहे थे, जिससे भारत सहित दुनिया भर में डीजल-पेट्रोल और महंगाई बढ़ गई थी. हालांकि, राजनीतिक बदलाव के बाद बाजार में यह उम्मीद भी जगी कि भू-राजनीतिक तनावों को सुलझाने की दिशा में कड़े कदम उठाए जाएंगे, जिससे आम जनता को भी महंगाई से कुछ राहत मिल सके.
अमित कुमार दुबे